चेले ने किया गुरु का उद्धार | मनमौजी का जादू



किसी गांव में एक अहीर रहता था । उसका नाम था मनमौजी जैसा नाम वैसा काम । नाम भी मनमौजी और काम भी मनमौजी । एक बार की बात है , उस लड़के से गांव वालों ने पूछा कि तुम क्या काम करना पसन्द करोगे ? मनमौजी सोच - विचारकर कहा कि मैं गांव के जानवरों को चराने का काम पसन्द करता हूँ । 

एक दिन एक नदी के किनारे मनमौजी पांच गायें चरा रहा था । वे सभी गायें जमींदारों की थी । रोटी - कपड़ा और दो रुपये महावारी तनख्वाह पर मनमौजी काम करता था । कारण न बाप न मां । यानी लोटवे और नहीं पेटवे । बेचारा मनमौजी ठहरा ठोपा छाप । मनमौजी . जिद्दी टाइप का था । उसके मन में जो बात साबित हो जाती थी , वह हमेशा के लिए ब्रह्मा का लकीर बन जाता था । 

सत्य के काम में मनमौजी तन - मन से शामिल हो जाता था । परन्तु उसमें एक कमी थी सत्य और असत्य को पहचान करना मनमौजी के उस की बात नहीं थी । इसका मुख्य कारण था कि मनमौजी सत्संगहीन व्यक्ति था । संगत से गुनआत है , संगत से गुनजात । सत्संगतहीन सदा मूर्ख ही रहता है 

फिर चाहे वह डबल एम ० ए ० ही क्यों न हो । सज्जन व्यक्तियों की संगति से ही असल और नकल की पहचान शक्ति बढ़ती है । आम के पेड़ के नीचे बैठा मनमौजी एक भजन गुनगुना रहा था । मन भजले हरि का प्यारा नाम है । गोपाला हरि का प्यारा नाम है । मन भजले हरि का प्यारा नाम है । भजन का मुखरा समाप्त भी नहीं हो पाया था 

कि उधर से एक पंडित जी आ टपके । कंधे पर जजमानी झोला हाथ में डण्डा और मस्तक पर लम्बा तिलक । वैशाख की मौसम था । दोपहरी वाली धूप थी । उसी आम के पेड़ की छाया में पंडित जी भी ठहर गये कुछ देर बाद पंडितजी झोले में से धोती निकाली और जाकर स्नान किया । 

इसके बाद पलथी मारकर बैठ गये और दो आँख बंद कर ली । फिर दाहिने हाथ से नाक दबा ली और बस , बड़ी देर तक बैठे रहे । इसके बाद उन्होंने दो मूंगवा लड्डू निकाले और खा - पीकर चलने को तैयार हुए । इन सभी खेल - क्रिया को देखने के बाद मनमौजी से रहा ना गया । 

तब मनमौजी बोला- ' पांव लागी हो पंडित जी महाराज । ' पंडित जी- सदा अवाद रहो , फलो - फूलो , ऐश - मौज करो- ऐसा आर्शीवचन बोले । मनमौजी- पंडित जी महाराज , आप कहां रहते हैं ? पंडित- कसमपुर । मनमौजी- आप इधर कहां जा रहे हैं ? पंडित- फरीदाबाद । वहां मेरे चेले लोग रहते हैं ।

मनमौजी- पंडित जी , अगर आप गुस्सा न करे तो एक बात कहूँ । पंडित- हां हां जरूर कहो । मनमोजी- पंडित जी । अभी आप नाक बंद करके क्या कर रहे थे ? पंडित- भक्त ! मैं नाक बंद करके भगवान का दर्शन कर रहा था । मनमौजी- अब समझा । नाक बंद करके भगवान का नाम लेने से भगवान मिल जाते हैं । अच्छा , अब मैं चलता हूँ । इतना कहकर पंडित जी दूसरे तरफ   बढ़  चले । 

अब मनमौजी की कहानी सुनिये । मनमौजी के पास दूसरी धोती नहीं थी । वह सोच रहा था कि पंडितजी की तरह स्नान कैसे करूं ? जब कोई उपाय नहीं सूझा तो वह नंगा होकर नदी में कूद पड़ा और नहाकर बाहर निकला । उसने उतारी धोती को ही पहनी और पंडित जी की तरह पलथी मारकर बैठ गया । तब उसने आंखें बंद की और फिर नाक भी पकड़ ली । जब आंखें बंद किया । तब स्वभाविक रूप से कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था । ' पंडित जी तो बोल रहा था कि आंख बंद कर नाक को पकड़ने से भगवान का दर्शन कर रहा हूँ 

परन्तु भगवान मुझे क्यों नहीं दर्शन दे रहे हैं । ' ऐसा मनमौजी ने अपने मन में सोचा । जब भगवान ने दर्शन नहीं दिया तब मनमौजी ने नाक को और जोर से दबाया। मनमौजी के दिल में इस बातो का जिक्र घर कर गया कि हो सकता है की नाक को कम दाबने के कारण से भगवान जी दर्शन नहीं दिए । मनमौजी ने प्रमण किया कि जब तक भगवान दर्शन नहीं देंगे , तब तक नाक को दाबना नहीं छोडूंगा । थोड़ी देर बाद मनमौजी की सांस घूटने लगी । 

लेकिन मनमौजी ने सोचा जान जाए पर , वचन न जाए । जब हमने प्रण कर लिया कि भगवान का दर्शन हर हालत में करेंगे । उसने अपने नाक को और कस ली । अब मनमौजी की सांस और घुटने लगी । भगवान के प्रति सहानुभूति भक्त के गले में अटकी प्राण की थैली स्वर्गलोक को सिंहासन को डगमगा दिया । 

साथियों ! आप जानते हैं कि भक्त के प्राण की डोरी भगवान की सिंहासन में बंधी होती है । अब भगवान अपनी दिव्य - दृष्टि की डोर मृत्यु लोक में डाली । अरे ! ये क्या ? मेरे भक्त मनमौजी मेरे दर्शन के खातिर प्राण तक गंवाने को तैयार है । वाह ! भक्त ! जब तूने याद किया है , तब तो आना ही पड़ेगा । अभी अपने भक्त के बारे में सोचे थे कि , ' नाथ , आप किस लोक की चिन्ता में डूबे हैं ? 

लक्ष्मी बोली । तीनों लोकों की देवी महासती लक्ष्मी की मुख से निकली ये बातें हमें अच्छी नहीं लगी । सर्वव्यापी भगवान विष्णु मृत्यु लोक के अलावे किस लोक की चिन्ता करेंगे । ' नारद जी मानो बीच में ही टपक पड़े । यानी लक्ष्मी की बात का भगवान कोई उत्तर देते इससे पहले ही नारद जी उनकी बातों को चट कर गए । लगे अपने बातों की जाल बिछाने ! प्रभु ! माता लक्ष्मी का सवाल- जवाब भरी बातों में ना पड़े , वर्ना आपके प्यारे भक्तों की जान संकट में पड़ सकती हैं । ' हां , नारद ' तुम ठीक कहते हो ? हमें अपने भक्तों की पुकार अति शीघ्र सुननी चाहिए । 

चलिए देवर्षि । भगवान विष्णु अपने भक्त के पास चल पड़ते हैं । अब लक्ष्मी के ललाट पर का गुस्सा नाक पर । नारद , जरा इधर आना । नारद जी लौट आए । लक्ष्मी बोली- ' खबरदार जो आइन्दा बिना - बूझे समझे मेरी बात में दखल दिया । न जाने तुम्हारा कैसा दैहिक लक्षण है कि जब भी आपस में कोई बात करूं , बीच में टपक पड़े हो । ' माता ! आप मेरी बात को बुरा मान गई । ' चुपचाप चले जाओ । ' जो आज्ञा , नारायण ! नारायण !! 

आंख खोलो भक्त । भगवान विष्णु बोले । मनमौजी को ऐसा लगा मानो मेरा जीवन धन्य हो गया । ऐसी सुमधुर वाणी उसने पहली बार सुनी । आवाज सुनकर मनमौजी ने अपनी आंखो  खोलकर देखा फिर नाक भी छोड़ दिया उसके बाद लम्बी- लम्बी सांसो भरते हुए वह बोल पड़ा की आप कौन हो ? मैं भगवान हूँ । प्रमाण बतावें कि आप भगवान हैं । तुम जैसा चाहे प्रमाण ले लो । मनमौजी- एक मिनट । एक मिनट रूकिए । मैं उन पंडितजी को बुलाये लाता हूँ 

अभी वे कुछ दूर ही गए होंगे । अगर पंडितजी कह देंगे कि तुम्हीं भगवान हो तो मैं मान लूँगा , क्योंकि उन्होंने ही भगवान को देखा है , मैंने तो कभी देखा नहीं । भगवान- अच्छी बात है । मनमौजी- लेकिन जब तक मैं पंडित जी को बुलाने जाऊं तब तक कहीं अगर आप खिसक गए तो ? भगवान- नहीं , मैं यहीं खड़ा रहूंगा । मनमौजी- नहीं भाई , अनजाने आदमी का क्या भरोशा ? 

मैं आपको रस्सी से कसकर इस आम के वृक्ष से बांध दूंगा तभी जाऊंगा । भगवान मुस्कुराकर बोले- ' अच्छा भाई ! बांध दो । मनमौजी झटपट गायों की रस्सियां खोली और भगवान को कसकर वृक्ष में बांध दिया । भगवान आम के वृक्ष से कसकर बंधे गए । 

कुछ दूर जाने के बाद अब मनमौजी को पंडित जी दिखलाई पड़े । ' - उसने चिल्लाकर कहा- ओ पंडितजी महाराज ! सुनिये !! तुम्हारे वाले भगवान को हमने बांध रखा है , फिर भी देख लो कहीं कोई दूसरा तो नहीं है । पंडितजी आवाज सुनकर रूके और मुड़कर देख ही रहे थे । मनमौजी दौड़ता चला जा रहा है । मगर उसका मतलब कुछ भी न समझ सके । पंडित जी ने सोचा कि यह युवक है और मैं बूढ़ा हूँ । 

कहीं मेरा झोला छीनने तो दौड़ा नहीं आ रहा । ऐसा सोचकर पंडित जी आगे बढ़ने लगे । मगर मनमौजी कदम पर कदम बढ़ाते - बढ़ाते अन्ततः पंडित जी को पकड़ ही लिया । पंडितजी महाराज आप हमसे नाखुश हैं ? मनमौजी हांफते हुए बोला । चलिए आपके भगवान को हमने बांधकर रखा है । अब पंडितजी का हाथ पकड़कर वहां ले गया जहां भगवान को आम के वृक्ष में बांध रखा था ।

मनमौजी- देखो पंडित जी ! यही भगवान है न ? पंडितजी ने आम के पेड़ को घूर - घूरकर देखा परन्तु लिपटे रस्सी के अलावा कुछ दिखाई न दिया । पंडितजी- कहां है भगवान ? मनमौजी- ओ पंडितजी , दिन में भी नहीं सूझता क्या ? पंडितजी समझ गए कि यह युवक हमें मूर्ख बनाता है 

इसलिए इससे पिंड छुड़ाने में ही भलाई है चाहे इसके लिए हां कहना ही पड़ेगा । मनमौजी- पंडितजी , नजदीक जाकर देख लो । पंडित जी- हां हां यही हैं । अब पंडित जी को छुट्टी मिल गई । वे चल दिए । मनमौजी ने रस्सी खोला । भगवान के चरण छूए । 

तब भगवान- बोले वह पंडित मेरा भक्त नहीं है , वह तो पाखण्डी है । मनमौजी- तो फिर आप पाखण्डी को दर्शन क्यों देते हैं । भगवान- मैंने उसे कभी दर्शन नहीं दिया । मनमौजी- वह कहता था कि मैं रोज दर्शन किया करता हूँ और अभी मेरे सामने वह आपको देख गया है । मनमौजी- लेकिन उसके झूठ ने मुझे सच से मिला दिया । वे मेरे पाखण्डी ही सही , परन्तु हैं । गुरु भगवान- तुम क्या चाहते हो ? मेरा दर्शन व्यर्थ नहीं होता । 

मनमौजी- मैं यह चाहता हूँ कि जब मैं नहाकर नाक बंद किया करूं , तब आपका दर्शन हुआ करे । भगवान- ऐसा ही होगा । - मनमौजी- एक बात आपने अपनी खुशी से दी । एक बात मेरे मांगने से दीजिए । भगवान- मांगो । मनमौजी- जब पंडितजी नाक बंद किया करे , तब उनको भी दर्शन दिया करें ।

भगवान- तब तो वह सुधर जाएगा , क्यों मेरा दर्शन पाने वाले व्यभिचारी नहीं रह सकते मनमौजी । तुम धन्य हो ! तुमने अपने गुरु का उद्धार किया और अपना उद्धार किया । गुरु ही चेले का उद्धार किया करते हैं । पर आज चेले ने गुरु का उद्धार किया । 

करीब एक साल के बाद पंडितजी फिर उसी मार्ग से निकले । मनमौजी पूर्ववत् गाय चरा रहा था जब दोनों ने दोनों को देखा तब मनमौजी बोला- गुरुजी ! प्रणाम । पंडितजी- गुरुजी ! प्रणाम । मनमौजी- आप मेरे गुरु हैं , क्योंकि आपने मुझे भगवान से मिलाया । पंडितजी- आप मेरे गुरु हैं । क्योंकि आपने मुझे भगवान से मिलाया । 

मनमौजी- मैं अहीर हूँ और आप ब्राह्मण हैं । मनमौजी- मैं मूर्ख था आपने पंडित बनाया । पंडित- मैं पाखण्डी था , आपने भक्त बनाया । मनमौजी- जो हुआ सो हुआ । हम दोनों के गुरु हुए और दोनों के चेला हुए । पंडित- मैंने यजमानी का पेशा छोड़ दिया । तुम भी गाय चराने का पेशा छोड़ दो । मनमौजी- फिर क्या करोगे ? 

पंडित- द्वार - द्वार पर राम नाम का प्रचार करेंगे । तुम बजाया करना खंजड़ी और मैं बजाया करूंगा मजीरा । मनमौजी- दोनों मिलकर भक्ति के भजन गाया करेंगे । में पंडित- हां ! राम नाम के पवित्र जल भी नहाया करेंगे । खुद मनमौजी- नाम क्या रखोगे ? पंडित- तुम्हारा नाम रहेगा- पंडितदास और मेरा नाम रहेगा

अहीरदास । मनमौजी- क्योंकि मेरा गुरु एक पंडित है और आपका एक अहीर है । पंडित- हाँ । गौहाटी जिले में दो साधु घूम - घूमकर भजन गाते हुए देखे जाने लगे । जब वे भजन गाते तो स्वयं मस्त हो जाते हैं और सुनने वाले भी मस्त हो जाते । भगवान की लीला विचित्र है । भगवान धन्य है और उनके भक्तों को भी धन्य है ।


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