एक राजा था । उसे ईश्वर पर विश्वास न था । जो लोग ईश्वर स्तुति करते , ईश्वर पर विश्वास रखते , वह उन्हें अंधविश्वास कहता । राजा ने मंदिरों के प्रबंध के लिए राजकोष से जाने वाले धन को बंद कर दिया ।
मंदिरों में कुव्यवस्था फैल गई । साफ - सफाई और मरम्मत के अभाव में धीरे - धीरे मंदिर टूटते - फूटने लगे । राजा के दो पुत्र थे । छोटा प्रिंस अपने पिता के विरोध एवं बिपरीत था । वह हर एक दिन सुबह - शाम ईश्वर के भजन में मस्त रहता।
राजा ने उसे बहुत समझाया , पर उसने ईश - वंदना नहीं छोड़ी एक दिन राजा सपरिवार भोजन के लिए बैठा । भोजन से पूर्व छोटे राजकुमार ने भोजन के लिए ईश्वर का उपकार माना और आँखें चन्द कर ईश्वर को धन्यवाद दिया ।
उसे भोजन के लिए ईश्वर का धन्यवाद करते देख , राजा ने कहा" इस भोजन के लिए तुम्हें मेरा आभारी होना चाहिए , ईश्वर का नहीं । मैं चाहूँ तो तुम्हें भोजन मिलना बंद हो जाए । मेरे एक आदेश पर तुम भूखे मर सकते हो । ” " मैं जानता हूँ कि आपके आदेश पर मेरा भोजन बंद हो सकता है ।
यदि मुझे ईश्वर भोजन देना चाहेगा , तब वह किसी न किसी तरीके से उसे मेरे पास पहुँचा देगा और मुझे भूखा नहीं रहने देगा । ईश्वरीय आदेश के बिना दुनिया का एक भी पत्ता नहीं डोल सकता । उन्ही के आदेश से संसार के सारे कर्म होते हैं । "
राजकुमार ने परमात्मा का गुणगान करते हुए उत्तर दे दिया । इस पर राजा क्रोधित हो उठे । उन्होंने बोला- " ठीक है , मै देखता हूँ तुमको कल भोजन कौन खिलता है ? " दूसरे दिन राजा छोटे राजकुमार को लेकर वन में चला गया । उसके साथ सेनापति और कई सैनिक अधिकारी भी थे ।
जंगल में पहुंचकर राजा के आदेश से राजकुमार को एक पेड़ के ऊपर बिठा रस्सी से बांध दिया गया । राजा ने कहा- " अब देखता हूँ , आज तेरा ईश्वर तुझे भोजन कैसे देता है ? " ऐ कहते हुए राजन , सेनापति और दूसरे ख़ास अधिकारी आगे चलकर कुछ दूर जंगल में छिपकर बैठ जाते है।
दोपहर में एक राहगीर उधर से गुजरा । जिस पेड़ पर राजकुमार बंधा था , वह उसी पेड़ के नीचे बैठकर आराम करने लगा । थोड़ी देर बाद उसने एक पोटली निकाली और भोजन करने लगा । अभी वह भोजन कर ही रहा था कि लुटेरों का एक दल उधर आ निकला ।
लुटेरों की आवाज सुनकर वह राहगीर भोजन छोड़कर भाग गया । बन में पेड़ के नीचे भोजन देखकर लुटेरे रुक गए । उन्हें आश्चर्य हुआ कि इस घने जंगल में भोजन कौन छोड़ गया ? उन्होंने इधर - उधर देखा , वहाँ कोई न था ।
अचानक एक लुटेरे की निगाह राजकुमार पर पड़ी । लुटेरों ने आपस में कहा- " हो न हो , इसने जरूर इस भोजन में जहर मिलाकर यहाँ रख दिया है , ताकि हम सभी इसको खा कर परलोक सिधार जाएँ । " खाने में Poison की बात सोच , लुटेरे गुस्से से आग बबूला हो गए ।
उन्होंने राजकुमार को नीचे उतारा । कहा- " तुम हम लोगों को यह जहरीला भोजन खिलाना चाहते थे । अब तुम ही इसे खाओगे और हम लोगों की जगह तुम मरोगे । " यह कहते हुए लुटेरों ने उसे जबरन भोजन कराया और चले गए ।
राजा और दूसरे अधिकारी झाड़ी में छिपकर यह सब देख रहे थे । राजा की समझ में आ गया कि राजकुमार को भोजन ईश्वर की इच्छा से प्राप्त हुआ है । उन्होंने छोटे राजकुमार को प्यार से गले लगा लिया फिर उन्हें अपने महल ले आए ।
उसी दिन से राजा को ईश्वर की महिमा और शक्ति पर विश्वास हो गया । राजा के आदेश से सारे मंदिरों का जीर्णोद्धार हुआ । राजमहल के प्रांगण में भी एक भव्य मंदिर का निर्माण हुआ । राजा परिवार सहित नियमित रूप से पूजा - अर्जना के लिए जाने लगे ।
