रेबेका ने जागीरदार की पत्नी के पास नौकरी की थी । बड़े घर में नौकरी करने से रेबेका के मन में अहंकार समा गया । वह दूसरे लोगों को अपने से छोटा समझने लगी थी । दोनों बच्चों से भी कठोर व्यवहार करती थी । पीटर और सांता का मन दुखी रहता था , पर ये और किसके पास जाते ? कोई भी तो था नहीं उनका अपना । रेबेका का अपना कोई बच्चा नहीं था ।
जागीरदार की बीबी मरते वक्त रेबेका के लिए थोड़ा बहुत धन छोड़ गई थी , इस नाते जैसे - तैसे रेबेका और दोनों बच्चों का जीवन कट रहा होता है । दोनों उम्र के कच्चे और बच्चे थे , पर दूसरे बच्चों जैसा जीवन नहीं था उनका । जब - जब वे दूसरे बच्चों को हँसते - खिलखिलाते देखते , तो उनका मन रो उठता । फिर एक दिन ऐसा हुआ की च्चटे पट में रेबेका चाची भी परलोक सिधार गयी ।
अब तो पीटर और सांता बिल्कुल ही अकेले रह गए थे , इतनी बड़ी दुनिया में । हाँ , रेबेका के कुछ मित्र अवश्य थे , जिन्होंने तय किया कि पीटर और सांता के लिए अनाथालय ही सबसे अच्छी जगह है । लेकिन दोनों को अलग - अलग अनाथालय में जाना था । क्योंकि लड़के - लड़कियों अलग - अलग रहते थे ।
जब पीटर और सांता को यह बताया गया , तो बहुत परेशान हो उठे । उन्होंने सोचा , चाहे जो हो , ये साथ - साथ रहेंगे । कभी अलग नहीं होंगे । तभी पीटर को याद आया , चाची रेबेका के एक रिश्तेदार सर्कस में काम करते हैं । नाम था गस । पीटर को उनका कार्ड मिल गया था ।
" हम उनके पास जायेंगे । शायद वहाँ हमें रहने की जगह मिल जाए । " “ पर हम उनसे कभी नहीं मिले हैं । अगर उन्होंने मना कर दिया तो क्या होगा ? " -सांता ने कहा । पीटर बोला- " तो फिर हमें अलग - अलग अनाथालय में रहना । " होगा “ नहीं , नहीं , मैं तुमसे अलग होकर कहीं नहीं रहूँगी ।
सांता की आवाज में डर झांक रहा था । और फिर एक रात दोनों भाई - बहन अनजान सफर पर चल दिए । वे कुछ नहीं जानते थे कि कहाँ जाना है , और जिसके पास जा रहे हैं , वह कैसा आदमी है ! पर छोटी - सी आशा की किरण भी थी - हो सकता है कोई रास्ता मिल जाए ।
यह गस नामक व्यक्ति उन्हें अपना ले । तब तो उन्हें अनाथालय में नहीं जाना पड़ेगा । इस तरह अंधेरी सड़कों पर नहीं भटकना पड़ेगा । रात बीतने लगी । दोनों भाई - बहन चले जा रहे थे । सड़क दोनों ओर मकानों में लोग आराम की नींद में डूबे थे । पर अभागे पीटर के और सांता आश्रय की खोज में भटक रहे थे ।
नींद सताने लगी , तो दोनों एक मकान की सीढ़ियों पर लेट गए । फिर न जाने कब नींद आ गई । खड़ा उसे एकाएक पीटर की नींद खुली । एक आदमी पास झकझोर रहा था । वह उस मकान में रहता था । अब तक सांता की नींद भी टूट गई थी ।
उस आदमी को दो बच्चों को इस तरह खुले में सोते देखकर हैरानी हो रही थी । उसने पूछा , तो पीटर ने सारी बात कह सुनाई । बता दिया कि उनके यस अंकल काब्स सर्कस में काम करते हैं । उस आदमी ने बता दिया कि काब्स सर्कस ब्राइडलिंटन में खेल दिखा रहा है । उसने कहा- " बच्चो , रात को मेरे घर में आराम करो । सुबह चले जाना । "
बाकी रात दोनों ने नरम बिस्तर पर आराम से बिताई । सुबह अंकल गस की खोज में चल दिये । वे पूछ - ताछकर बढ़ते रहे । जब पीटर और सांता ब्राइडलिंटन में पहुँचे , तो काब्स सर्कस अभी वहाँ नहीं पहुँचा था । कुछ देर बाद सर्कस की गाड़ियाँ एक मैदान में आकर खड़ी होने लगीं । उनमें हाथी , घोड़े और सींखचेदार बड़े - बड़े पिंजरों में शेर भी थे ।
वे वहाँ खड़े - खड़े देखते और रोमांचित होते रहे । किसी सर्कस को इतने निकट से देखने का दोनों भाई - बहनों के लिए यह पहला मौका था । उन्होंने गस के बारे में पूछा , तो एक आदमी दोनों को अपने साथ ले गया । गस अधेड़ उम्र का , गम्भीर चेहरे वाला आदमी था ।
जब उसे पता चला कि उसके भतीजा - भतीजी आए हैं , तो वह हैरान हुआ । अपने से बाहर आ गया । तम्बू पीटर और सांता ने उसे नमस्कार किया । चाची रेबेका के बारे में बताया । कहा- " अब हमारे पास कोई स्थान नहीं है रहने के लिए । इसीलिए हम आपके पास आए हैं ।
हम अलग - अलग अनाथालय में जाकर नहीं रहना चाहते । " गस अकेला रहता था । उसे दोनों बच्चों का आना अच्छा नहीं लगा । वह रेबेका का दूर का रिश्तेदार था । उसे यह कल्पना नहीं थी कि इस तरह दो अनाथ बच्चे ढूँढ़ते हुए यहाँ तक आ जायेंगे ।
पर पीटर और सांता को एकदम दुत्कार भी नहीं सकता था , क्योंकि सारे सर्कस में गस के रिश्तेदारों की चर्चा होने लगी थी । गस ने कठोर स्वर में कहा- “ तुम दोनों मेरे पास क्यों आए ? अनाथालय में चले जाते , तो अच्छा रहता । खैर , जब तक सर्कस खेल दिखा रहा है ,
तब तक में तुम लोगों को साथ रखूँगा । उसके बाद तुम जानो , तुम्हारा काम ! पीटर और सांता गस के रूखे व्यवहार से सहम गए । वे जाते भी तो कहाँ ? वे जानना चाहते थे कि सर्कस कब तक खेल दिखाएगा , पर कुछ भी पूछने की हिम्मत न हुई ।
इस तरह सांता और पीटर काब्स सर्कस के साथ रहने लगे । वहाँ की दुनिया उनके लिए अनोखी थी । दिन में सर्कस के कलाकारों को अभ्यास करते देखते , तो विचित्र लगता । सर्कस जिस कसबे में जाता - कलाकारों के बच्चे वहाँ के में पढ़ने के लिए जाते ।
हर कस्बे में सर्कस चार - पाँच दिन तक रुकता था । पीटर सोचता था - ' विचित्र है यह पढ़ाई ! ऐसे हालात में कोई क्या पढ़ेगा भला ! " उसके बाद वे दोनों तो एक बार भी पढ़ने विद्यालय नहीं गए । गस के मानाने के बाद वे बच्चों के साथ शहर के एक स्कूल में गए । वहाँ के सभी छात्रों ने उन दोनों का खूब जोरदार स्वागत किया ।
छात्रों ने पीटर और सांता का परिचय पूछा , तो पीटर ने संकोच से कहा- " हम सर्कस वाले नहीं हैं । हम तो थोड़े समय के लिए आए हैं । फिर भी वे इस प्रश्न का उत्तर नहीं दे सके कि कहाँ से आए हैं ? सर्कस कलाकारों के बच्चे स्कूल में करतब दिखाने लगे , पर सांता और पीटर के पास दिखाने के लिए कुछ नहीं था ।
सच तो यह था कि रेबेका चाची ने उन्हें कुछ भी नहीं सिखाया था । दोनों भाई - बहन सर्कस वाले बच्चों से अलग खड़े थे । सांता ने कहा- " मैं सर्कस के करतब तो नहीं जानती , पर बहुत अच्छा वायलिन बजा सकती हूँ । " " और में लैटिन जानता हूँ । " - पीटर में गर्व से कहा । वे दोनों झूठ बोल रहे थे ।
गस ने यह कहि यह सुना , तो उसने सांता से बोला- " हमने सुना , तुम काफी अच्छा वायलिन बजा देती हो । इन सभी को कोई ठीक सा धुन सुनाओ उस वक्त । गस के अगल बगल में कईओ लोग बैठे हुए थे । अब तो सांता के काटो तो खून वायलिन लाया गया , पर सांता ठीक से न बजा सकी । सब उसकी हँसी उड़ाने लगे ।
पीटर डर रहा था कि कहीं उसके लैटिन ज्ञान की परीक्षा न लेने लगें । एक रात पीटर और सांता को नींद नहीं आ रही थी । सर्कस का शोर शांत हो चुका था । कलाकार दर्शकों की भीड़ के सामने अपना कोशल दिखाकर आराम से सो रहे थे ।
पशुओं के बाड़ों में भी शांति थी । तभी सांता ने कहा- " पीटर , हम यहाँ रहते हुए भी , यहाँ के नहीं हैं । ' - " हाँ , सांता ! यहाँ हमें कोई नहीं चाहता । गस अंकल तो जरा भी पसंद नहीं करते । आखिर हम क्या करें । " " हमको गस अंकल का दिल जीतना है । " सांता ने पीटर से बोली - " तब हम यहाँ पर रह पाएंगे । "
वे गस अंकल को कैसे खुश कर सकते हैं , इसी पर सोचते - सोचते सो गए । सुबह हुई तो सांता ने डेरे की सफाई करके नाश्ता बनाना शुरू कर दिया । उसे आशा थी , नाश्ता करके गस उसकी तारीफ करेगा । पर उसे निराश होना पड़ा । गस ने कहा- " सांता , तुम्हें नाश्ता बनाना नहीं आता । आगे कभी मत बनाना । " दुःख और अपमान के कारण सांता रो पड़ी ।
उधर पीटर गस की कार को चमकाने में लगा था । उसे लग रहा था , गस अंकल उसकी मेहनत से प्रसन्न होकर उसे शाबासी देंगे , पर यस ने देखकर मुँह चढ़ा लिया । कहा- " यह सब तुम्हारा काम नहीं । जाकर बच्चों के साथ खेलो । " पीटर और सांता का मन से उठा । उन्हें लगा कि वे गंस का मन कभी नहीं जीत सकेंगे ।
पीटर ने सांता से कहा- " बहन , मैं सोचता हूँ ,हमें कोई और रास्ता अपनाना होगा । " “ हाँ , मेरा भी यही ख्याल है । " सांता बोली । उस दिन से उन्होंने यस को प्रसन्न करने की कोशिश छोड़ दी । सांता लड़कियों को सर्कस के करतब सिखाने वाली महिला के पास गई । उससे सीखने की इच्छा प्रकट की । पीटर बेन नामक व्यक्ति के पास गया ।
बेन घुड़सवारी का प्रशिक्षण देता था वह पीटर को प्रशिक्षण देने के लिए तैयार हो गया । पीटर और सांता चुपचाप सीखने लगे । यह सब वे गस से छिपकर कर रहे थे । वे उसे चौका देना चाहते थे । पीटर सुबह मुँह अँधेरे सीखने के लिए निकल जाता ।
इसी तरह दिन बीत रहे थे । गस को पीटर और सांता के बारे में सचमुच कुछ पता नहीं था । वह उन्हें अपने पर बोझ मान रहा था । चाहता था कि सर्कस का सीजन खत्म हो , तो वह दोनों से छुट्टी पा ले । एक सुबह सर्कस में हड़कम्प मच गया ।
सब इधर - उधर भाग दौड़ कर रहे थे । पीटर भी बाहर आकर देखने लगा । सब हाथियों के बाड़े की तरफ दौड़े जा रहे थे । पता चला - रानी नामक हथिनी गुस्से में है । उसने महावत को उठाकर परे फेंक दिया था । न जाने क्या कर बैठे । पीटर जाकर बाड़े के बाहर खड़ा हो गया ।
रानी बार - बार सूंड उठाती और इधर से उधर हिलाती । सब कह रहे थे- “ परे रहो । दूर रहो । " पर पीटर न जाने कब रानी के पास जा पहुँचा । वह हथेली से रानी की सूंड थपथपाने लगा । वहाँ खड़े लोगों में सत्राटा छा गया है सब सांस रोके देख रहे थे । वे पीटर के लिए चिंतित थे । सोच रहे थे - ' रानी अब उसे पैरों से कुचल देगी । '
पर ऐसा कुछ न हुआ । पीटर द्वारा इस तरह सूंड थपथपाने से रानी की उत्तेजना शांत होती गई । पीटर की जेब में गाजरें थीं । उसने गाजरें दीं , तो रानी खाने लगी । कुछ देर में वह सामान्य हो गई । पीटर बहुत देर तक रानी के पास खड़ा दुलारता रहा । पूरे सर्कस में पीटर के साहस की चर्चा थी । लोग कह रहे थे- " अगर पीटर न होता , तो रानी न जाने क्या कर डालती । "
पीटर सोच में डूबा हुआ था - ' कही गस चाचा ने भी यह बात जान चुके होंगे ? " वह सर्कस का आखिरी दिन था । गस ने पीटर और सांता से कहा- " अब मैं तुमसे विदा लूँगा । मैंने तुम दोनों के लिए एक स्कूल में व्यवस्था कर दी है । तुम्हारी रेबेका चाची के मित्र तुम्हारी देखभाल रेबेका चाची के मित्रों के पास जाने की बात सुन , दोनों परेशान हो उठे ।
उन्हीं के पास से भागकर तो पीटर और सांता यहाँ आए थे । अब वे सर्कस की जिंदगी स्वीकर कर चुके थे , तो उन्हें फिर से निकालने की तैयारी हो रही थी । उसी रात सर्कस के तम्बू में आग लग गई । घोड़े उसमें फँस गए । पीटर ने देखा , तो फिर दौड़ता हुआ तम्बू में घुस गया । घोड़ों के बन्धन खोलकर बाहर ले आया ।
इस काम में उसे कुछ चोट भी आई , पर उसने परवाह नहीं की । उसे खुशी थी कि उसने घोड़ों को जलने से बचा लिया था । अगली सुबह सब विदा हो रहे थे । सर्कस का सामान गाड़ियों में लादा जा रहा था । पीटर और सांता एक तरफ खड़े थे । वे किसी के नहीं थे , कोई नहीं था उनका । सभी सर्कस के मालिक ने गस से कहा- " मैंने सुना है ,
तुम दोनों बच्चों को दूर के स्कूल में भेज रहे हो । यह तो ठीक नहीं है । अब ये हमारे हैं । ये कहीं नहीं जायेंगे । हमारे साथ रहेंगे । " पीटर और सांता ने गस अंकल को पहली बार ऐसे देखा " बच्चे जैसा चाहें । " अब दोनों भाई - बहन अनाथ नहीं रह गए थे । उन्हें अपना सर्कस का परिवार मिल गया था । वे मुसकरा रहे थे ।
