गुरु हरिप्रसाद जी आश्रम के संचालक थे , जिनका बच्चे बहुत सम्मान करते थे । वह आश्रम के परिसर में बने निवास में ही रहते और वहाँ की व्यवस्था का पूरा ध्यान रखते थे । उनकी मधुलता एक विदुषी , पतिव्रता स्त्री थी । उनका इकलौता पुत्र सौरभ बहुत सुशील और होनहार था ।
आश्रम में कुल पच्चीस विद्यार्थी थे , जिनमें उनका पुत्र भी शामिल था । जयंत उन सबका मॉनिटर था । वह एक निर्धन परिवार से था । उसका पिता सेठ शोभाराम की दुकान पर मजदूरी करके अपने परिवार का पेट पाला करता था ।
सेठजी के लड़के विक्रम ने इसी आश्रम में प्रवेश ले रखा था । लेकिन उसमें एक कमी थी कि वह जवंत को सदा तिरस्कार की दृष्टि से देखा करता था । एक रोज विक्रम ने गुरुजी से कहा कि उसकी जेब से किसी ने चाँदी का सिक्का चुरा लिया । पूछने पर उसने बताया कि उसका शक जयंत पर है ।
गुरुजी जयंत पर बहुत स्नेह रखते थे । यही नहीं , उसे वह अपना सबसे अधिक विश्वासपात्र शिष्य भी समझते थे । उसका नाम सुनकर गुरुजी को बहुत पीड़ा हुई जो उन्हें अन्दर ही अन्दर सालने लगी ।
जब इस बारे में जवंत समेत सभी बालकों से पूछा गया तो उन्होंने कहा कि उन्हें कुछ पता नहीं है । गुरुजी इसके कारण बहुत परेशान रहने लगे । आज तक उनके आश्रम में ऐसी दुखद घटना पहले कभी नहीं हुई थी । आखिर उन्हें एक तरकीब सूझी । शाम को भोजन के बाद उन्होंने सभी को बुलाकर कहा- " देखो बच्चो , विक्रम की जेब से इस तरह सिक्के की चोरी हो जाना इस आश्रम की प्रतिष्ठा पर गहरी चोट है ।
यह तो मानना ही पड़ेगा कि जिसने यह हरकत की है , वह कोई बाहर का नहीं है , बल्कि हम में से ही कोई है । खेर , जाने - अनजाने में जिससे भी यह गलती हुई है , उससे मेरा यही कहना है कि वह तुरन्त अपनी गलती सुधारे और सुबह होने से पहले - पहले उस सिक्के को आश्रम की पत्र मंजूषा में डाल दे ।
यदि ऐसा नहीं हुआ तो मुझे बहुत कष्ट होगा । इस स्थिति में सिक्के की कीमत मुझे अपनी ओर से अदा करनी होगी । " गुरुजी के इस कथन पर एकदम सन्नाटा छा गया । सोने से पहले बालकों में काफी देर तक इसी बात की चर्चा होती रही ।
उनका हृदय बार - बार कचोट रहा था कि गुरुजी ने इस घटना से दुखी होकर यदि आश्रम छोड़ दिया , तो उन सबके लिए वह डूब मरने जैसी बात होगी । गुरुजी भी देर रात तक सो नहीं पाए । दूसरी ओर चारपाई पर लेटे सौरभ की नजरें पिता पर लगी हुई थीं । वह भी बहुत दुखी था ।
कुछ देर के बाद जब सौरभ ने देखा कि पिताजी सो रहे हैं , तो वह चुपके से उठा और बिना किसी आहट के धीरे से बाहर निकल गया । गुरुजी सचमुच सोए नहीं थे , बल्कि आँखें मींचकर लेटे हुए थे । बेटे का इस तरह बाहर जाना उन्हें कुछ अजीब लगा । पर उस समय वह कुछ बोले नहीं । सुबह जब पत्र - मंजूषा खोली गई , तो उसमें वह सिक्का मिल गया ।
गुरुजी समझ गए कि चोरी का यह घिनौना कार्य उनके ही लाड़ले सौरभ ने किया है । सुबह दुखी होकर उन्होंने विद्यार्थियों से कहा कि उन्हें इस बात की खुशी है कि विक्रम का सिक्का उसे मिल गया , किन्तु ऐसी ओछी हरकत करने वाला उनसे छिपा नहीं रह सका । वह उसे अच्छी तरह जान गए हैं ।
फिर भी चूँकि उसने अपनी गलती स्वीकार कर ली है , इसलिए आश्रम से निकालने के बजाए , वह केवल उसे तीन दिन लगातार निराहार रहने की सजा सुनाते हैं । सभी बालक एक - दूसरे का मुँह ताकने लगे । विक्रम पीछे की ओर शान्त खड़ा था । जयंत के चेहरे पर उदासी छाई हुई थी ।
सौरभ का सिर नीचे की ओर झुका था । गुरुजी कुछ देर रुककर फिर बोले- " अब आप सभी यह जानना चाहेंगे कि इस दंड का भागी कौन है ? तो सुनिए ! इसका दोषी खुदका बेटवा सौरभ ही है । "
यह सुनते ही विक्रम जोर से चिल्लाया- " नहीं नहीं वह पाप सौरभ से नहीं , मुझसे हुआ है । " दौड़कर वह गुरुजी के चरणों में गिर गया और गिड़गिड़ाते हुए बोला- " मुझे माफ कर दो गुरुजी , मुझे माफ कर दो । सौरभ का इसमें कोई दोष नहीं है ।
वह सिक्का किसी ने नहीं चुराया । इसे मैंने ही सौरभ को रखने के लिए दिया था । मैंने इसे कसम दिलाई थी कि इस बारे में वह किसी को कुछ नहीं बताएगा । इसीलिए वह इतने दिन चुप रहा । " " तो फिर जयंत पर चोरी का झूठा इल्जाम क्यों लगाया ? इसके पीछे तेरा क्या मकसद था ? गुरुजी ने पूछा । " जयंत से मन ही मन मुझे ईर्ष्या होने लगी थी , क्योंकि वह मेरी बराबरी कर रहा है ।
इसलिए मै इसे अपमानित करके किसी तरह आश्रम से निकलवा देना चाहता था । सौरभ ने इस बात के लिए मुझे कोसा भी , लेकिन मैं अपने अहंकार में अकड़ा रहा । आज मुझे मालूम हुआ कि किसी की पहचान उसके पैसों से नहीं , गुणों से होती है । " कहता हुआ वह फूट - फूटकर रोने लगा ।
गुरुजी को लगा , विक्रम ने अपनी भूल स्वीकार करके आश्रम को अपवित्र होने से बचा लिया है । उन्होंने उसे प्यार से गले लगा लिया ।
