राजा की दो पुतलियाँ कल्याणी और रूपानी कहानी | Who was King Virbhadra

भारतीय राजाओं की कहानी


प्राचीन काल में वीरपुर नाम का एक नगर था । वहाँ के राजा थे वीरभद्र । वीरभद्र अपने पूर्वजों की तरह न्यायप्रिय , बुद्धिमान एवं प्रजापालक थे । उनके राजसिंहासन में दो पुतलियाँ लगी हुई थीं । एक का नाम था रूपानी और दूसरी का कल्याणी । रूपानी राजा से हमेशा सौन्दर्य का बखान करती और कल्याणी प्रजा के हित की बात राजा को बताया करती थी । 

दोनों पुतलियों की आपस में बिल्कुल नहीं निभती थी । वे एक - दूसरे की काट में लगी रहती थीं । रूपानी हमेशा राजा को समझाने की कोशिश करती - ' रूप और सौंदर्य ही दुनिया में सबसे अच्छे हैं । एक राजा को इन्हीं में ज्यादा समय लगाना चाहिए । ' 

कल्याणी गुणों का बखान करती । वह गुणों को रूप से श्रेष्ठ बतलाती । राजा दोनों की बातें सुनकर , निर्णय अपनी बुद्धि और विवेक से लिया करते थे । वह कभी भी  बुद्धिमान सभासदों की परामर्श लिया करते थे । 

जान , कुछ समय बाद वीरभद्र बहुत बीमार पड़े । अपना आखिरी समय उन्होंने अपने बेटे छविप्रिय को बुलाकर कहा- " बेटा , यह मेरा आखिरी समय है । अब सिंहासन पर तुम्हें बैठना है । तुम्हें एक जरूरी बात बता रहा हूँ । 

तुम इन दोनों पुतलियों में से कभी किसी का अनादर मत करना । इन दोनों में हमेशा संतुलन बनाए रखना । " कुछ दिन बाद राजा वीरभद्र स्वर्ग सिधार गए । वीरभद्र के राजसिंहासन पर छविप्रिय आसीन हुए । वह बड़े ही निरंकुश और विलासी थे । 

हमेशा राग - रंग में डूबे रहते थे । काफी दिनों बाद छविप्रिय पहली बार राज दरबार में आए । वह सिंहासन पर बैठे , तो कल्याणी बोली- “ राजन् , खुद आप  काफी  अधिक निखट्टू होते चले जा रहे हैं । 

राग - रंग और नृत्य - संगीत से ही राजकार्य नहीं चलता । आप अपने चतुर सभासदों की भी सलाह नहीं मान रहे हैं । गुणों का सम्मान करना सीखिए । अपने पिता की बातें याद रखें । " 

राजा को उसकी यह बात अच्छी न लगी । वह कुछ बोलना चाहते थे , तभी रूपानी बोल पड़ी- " राजन् , आप कल्याणी की बातों में न आइए । यह हमेशा गुणों का ही बखान करती रहती है । इसे यह नहीं मालूम कि सौंदर्य का जीवन में कितना महत्व है । 

सुंदर चीजें ही तो आनन्दे और सुख प्रदान करती है । बिना इनके जीवन नीरस हो जाता राजा बोला- " तुम ठीक कहती हो । सौन्दर्य के बिना जीवन बिल्कुल उजाड़ लगता है । मैं राजमहल को सुंदर ढंग से सजाऊँगा । 

राज वाटिका के कंटीले पौधों को उखाड़ , सुंदर - सुंदर पौधे लगवाऊँगा । " कुछ दिनों बाद जब राजा फिर दरबार में आए , तो दरबार की रौनक ही बदल गई थी । बड़े खुश थे राजा । वह ज्योंही सिंहासन पर बैठे , कल्याणी बोली- " राजन् , आपका एक ओर ही झुकाव ठीक नहीं । 

सौंदर्य के साथ - साथ गुणों का भी सम्मान होना चाहिए । वर्ना राज्य पर विपत्ति घिर आएगी । " कल्याणी की बात राजा को फिर अच्छी न लगी । 

वे कुछ बोल पाते , उसके आगे राजवैद्य बोल दिए- " हाँ , महाराज , कल्याणी बिलकुल ठीक बोल रही है । आपको  उसके जबाबो पर भी सोचने की जरूरत है । " राजा भड़क गए उन्होंने गुस्से में आकर बोला - " आपसे कौन बुद्धि माँग रहा है ? ऐसे वक्त में बिच में बोलकर तुमने बहुत बड़ी अपराध कर दिया है । इसका तुम्हें सजा मिलेगा इसलिए तुमको देश निकाला जाता है । " 

राजा के हुक्म पर सिपाहियों ने राजवैद्य को देश की सीमा से बाहर कर दिया । संयोग की बात , दूसरे ही दिन राजवाटिका में टहलते हुए राजकुमार को एक साँप ने डस लिया । बहुत उपचार हुआ , किन्तु उसे कोई बचा न सका । पुत्रशोक से दुखी राजा दरबार में पहुँचे । 

राज सिंहासन पर बैठने जा रहे थे , उसी वक्त कल्याणी बोल पडी- “ राजन् , आपने देख लिया , हमारे बातो को न मानने का परिणाम क्या हुआ । अगर पुष्पवाटिका से पुरे कंटीले पेड़ो को न हटवाया गया होता , तो कोई भी  साँप वाटिका में प्रवेश ही न कर पाता , क्योंकि उनमें बहुत से ऐसे पौधे भी थे , जिनकी महक से साँप दूर भागता है । 

साँप के डसने के बाद राजकुमार को मृत्यु से बचाया जा सकता था , मगर आपने तो , राजवैद्य को देश से निकाल दिया था । राजवैद्य के पास विषधर में बचाने की अचूक औषधियाँ थीं । मै बराबर आपसे कहती रही हूँ , गुणी को महत्व दीजिए । मगर आप सुनते ही नहीं । " कहकर पुतली मौन हो गई । 

ठीक मौका देखकर , दूसरीवाली पुतली रूपानी बोल पडी - " कल्याणी , ऐसे  मातम में तुम राजन का तिरस्कार  करने पर तुली हो । यह ठीक नहीं । " राजा पहले से ही झुंझलाए हुए थे । रूपानी की बातों ने आग में . घी का काम किया । गुस्से में उन्होंने कल्याणी से कहा- “ आज के बाद तुम मुझसे बात न करना । " 

राजन के फ़ैसला से पुरे सभासद हैरान सा रह गए । उन सभी में से कुछ ने राजा को यह अपना फ़ैसला वापस लेने को कह दी , परन्तु राजन किसी के सुनने वाले नहीं थे । कल्याणी बिलकुल चुप हो जाती है । अब राजा के ऊपर रूपानी का एकाधिकार था । राजा दिन - रात राग - रंग में डूबे रहने लगे । 

बूढ़े सभासदों को दरबार से निकाल , उनकी जगह नौजवान एवं रूपवान सभासदों की भर्ती की गई । यहाँ तक कि राजमहल के पुराने और विश्वासपात्र दास - दासियों की भी छुट्टी कर दी गई । इन सारी बातों की सूचना पड़ोसी राजा को मिली । वह बड़ा खुश हुआ । 

उसकी वीरपुर से पुरानी दुश्मनी थी । कई बार दोनों में युद्ध हो चुका था । बदला लेने का अच्छा अवसर देख , पड़ोसी राजा ने वीरपुर पर हमला कर दिया । वीरपुर के राजा तो रंगरेलियों में डूबे थे । सेना में भी ज्यादातर अनुभवहीन और नए सिपाही ही थे । 

पुराने योग्य एवं लड़ाकू सैनिकों की छुट्टी कर दी गई थी । इसके अतिरिक्त वीरपुर से निकाले गए ,बहुत - से दास - दासियों से भी बहुत सारी गुप्त जानकारियाँ शत्रु ने प्राप्त कर ली थी । हमने की खबर सुन , राजा छविप्रिय घबरा गए । क्या करें ! वह सोचने पर मजबूर हो गए - ' लगता है कल्याणी पुतली के खफा हो जाने से ही यह विपदा आ गयी है । ' 

भागे - भागे सिंहासन के पास गए । क्षमा माँगकर कल्याणी से उपाय पूछा । पुतली बोली- " राजन् , राग - रंग में डूबे राजा का यही हाल होता है । अब भी भला चाहो , तो अपने पुराने सभासदों , अनुभवी मंत्रियों और भूतपूर्व सेनापति से सलाह लो । मेरी मानो , आधी रात होने पर शत्रु पर जोरदार हमला करो । 

शत्रु आपसे कम ताकतवर है साहस से काम लो । " राजा ने वही किया । रात में अचानक हमले से शत्रु घबरा गए । सेना के पैर उखड़ गए । इस तरह आई विपत्ति टल गई । अब राजा की समझ में आ गया कि अनुभवी सभासदों से सलाह लेना क्यों जरूरी है ?

बस , उसी दिन से राजा , प्रजा के कल्याण और राज को सुदृढ़ करने में जुट गए । पुतलियाँ अब भी उनसे अपनी बातें कहतीं , मगर राजा उनकी बातें सुनकर अब अपने विवेक से काम लेते थे ।

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