क्या है व्यावहारिक ज्ञान | Story of Vishwambhar and Anantram

विश्वम्भर और अनन्तराम की कहानी


एक बार इंद्रपुर गाँव में एक विद्वान पंडित का आगमन हुआ , नाम था विश्वम्भर । विश्वम्भर धर्मशास्त्रों में पारंगत और प्रवचन में कुशल थे । गाँव के बुजुगों ने विश्वम्भर से शास्त्रों पर प्रवचन करने का अनुरोध किया । विश्वम्भर ने स्वीकार कर लिया । 

गाँव के शिवालय में सभा का उचित प्रबन्ध किया गया । पहले दिन विश्वम्भर ने शास्त्रों के अनुसार धर्म की व्याख्या की और अनेक उदाहरणों से अपने भाषण में प्राण भर दिये । अन्त में उन्होंने कहा , " पाप केवल पापाचरण को ही नहीं कहते , उसमें सहयोग देने को भी कहते हैं ।

 उदाहरण के लिए जिस तरह से मदिरापान करना पाप मना जाता है , ठीक वैसे ही मदिरापान करने वाले का साथ देना भी पाप होता है , उनका सहयोग देना या किसी तरह का बढ़ावा देना भी पाप ही मानने होंगे । " दूसरे दिन विश्वम्भर ने अपने प्रवचन में कहा , " मनुष्य को कैसी भी स्थिति में असत्य नहीं बोलना चाहिए । " 

उन्होंने इस प्रसंग में राजा हरिश्वर की कहानी सुनाकर सबके हृदव को द्रवित कर दिया । विश्वम्भर अपना प्रवचन समाप्त करके अपने अतिथेय गाँव के मुखिया गौरीनाथ के घर की तरफ बढ़ने लगे । रास्ते में अनन्तराम नाम के एक युवक ने उन्हें प्रणाम करके कहा , " पंडितजी , अपने धर्म की अनेक सूक्ष्म बातों को मर्मस्पर्शी शैली में स्पष्ट किया है । हम अपने जीवन-काल को उन्ही के जैसे  ढालने का प्रयास करूँगा ! " यह बक कर अनन्तराम चला जाता है। 

युवक अनन्तराम की बात सुनकर पं . विश्वम्भर को अत्यधिक प्रसन्नता हुई । वे साथ आ रहे मुखिया गौरीनाथ से बोले , ' आज के ज़माने में किसी आदर्श का पालन करने वाले युवकों का नितान्त अभाव हो गया है । ऐसी स्थिति में अनन्तराम की प्रशंसा करनी होगी , जो सुने हुए को अमल में लाने का इच्छुक है । " 

मुखिया गौरीनाथ ने मुस्कराकर कहा , " आपने अनन्तराम की बात पर एकदम विश्वास कर लिया ! यह एक शरारती युवक है और गाँव के बड़े - बूढ़ों के प्रति बिलकुल श्रद्धा नहीं रखता । मुझे तो पूरा सन्देह है कि यह कोई अवसर ढूँढ़कर आपकी मज़ाक उड़ाना चाहता है

विश्वम्भर दास जी  कुछ पल चुप रहकर बोले , " ब्यक्ति  का यह चरित्र होता है कि वह दूसरो की वास्तविकता पर यकीन नहीं करना चाहता । पर हमारा भरोसा है कि अनन्तराम ने जो कुछ बोला है , वह बिलकुल सच है और उसने हमारे उपदेश को सही तरह से दिल से सूना है । " 

दूसरे दिन प्रातःकाल विश्वम्भर गोरीनाथ के चबूतरे पर बैठकर किसी से बात कर रहे थे कि अनन्तराम ने प्रवेश करके उन्हें प्रणाम किया । फिर वह बोला , " पंडितजी , मैं आज बड़े धर्मसंकट में फँस गया हूँ । इस संकट से बाहर निकलने का उपाय भी आपको ही बताना होगा । " 

विश्वम्भर ने पूछने लगे , " बताओ तो सही, वह कौन - सी  असमंजस-धर्मसंकट है ? " " पंडितजी , आज सुबह जब में खेत से लौट रहा था तो रास्ते में मुझे दो शराबी मिले । वे इस गाँव के नहीं थे । वे मुझे तंग करने लगे कि मैं उन्हें इस गाँव के शराबखाने का रास्ता बताऊँ । मैंने आपके मुँह से सुना था कि शराब पीने की तरह ही शराबियों की मदद करना भी पाप है । 

इसलिए मैंने उन्हें बताया कि मैं शराबख़ाने का रास्ता नहीं जानता हूँ । पर पंडितजी , मैं तो जानता हूँ कि शराबख़ाना कहाँ पर है । बाद में जब मैंने इस घटना पर विचार किया तो मुझे लगा कि मैंने झूठ का सहारा लिया है । वे शराबी भी अभी तक सड़कों पर भटक रहे हैं । "

अनन्तराम ने कहा । विश्वम्भर ने कुछ हँसकर कहा , " इसमें धर्मसंकट की कोई बात नहीं है । तुमने जो कुछ किया , ठीक किया । बुरे काम करने वाले को रोकने के लिए बोला गया वचन या किया कर्म धर्मसंगत ही कहलाता है । " विश्वम्भर का उत्तर सुनकर अनन्तराम ज़ोर से बोलने लगा , " अरे , आप भी कैसे पंडित हैं ? 

शराब ठेके का पता हम बता दे तो यह कर्म बेव्ड़ो को बढ़ावा देने में आ जाता है , परन्तु पता जानकारी में होने पर भी ' मालूम नहीं  है ' ऐसा बोल देना तो वह झूठ बोलना हो जायेगा । ऐसे समय क्या करना चाहिए , क्या यह बात शास्त्रों में नहीं बतायी गयी है ? "

मुखिया गौरीनाथ को पहले ही सन्देह था । अब बाहर शोर सुना तो वह समझ गया कि अनन्तराम ने विश्वभर के सामने अवश्य ही कोई बखेड़ा खड़ा किया है । इस बीच कुछ लोग बाहर जमा हो गये थे । अनन्तराम ने गौरीनाथ को अपना हाल बताकर कहा , " मुखिया जी , ये कैसे पंडित हैं जो ऐसे मामूली से धर्मसंकट से मुक्ति पाने का उपाय भी नहीं बता सकते ? 

ये इतने सामान्य से सलाह में असमर्थ हैं , उसके बाद  , हम सभी हर दिन इनका उपदेश सुनते हैं और भेड़ी बकरे  की जैसा सिर झुकाए हिलाते रहते हैं तभी। " गौरीनाथ ने शांतिदायक स्वर में बोला , " जो भी कुछ होया , उसके नाते पंडितजी का बुराई क्यों कर रहे हो ? तुम जिसे धर्मसंकट कहते हो , उससे उबरने का रास्ता भी तुम्हारे हाथों में है ।

 अच्छा , ऐसी बात है ! क्या वह रास्ता आप मुझे बतायेंगे ? " अनन्तराम ने विस्मित होकर प्रश्न किया । " तुम इसी समय जाओ और उन शराबियों से मिलकर कहो - ' मैं शराबखाने का रास्ता जानता हूँ , लेकिन मैं तुम्हें बताना नहीं चाहता । 

उन्हें यह जवाब देकर तुम अपने घर जाओ , तुम्हारा धर्मसंकट स्वयं ही दूर हो जायेगा । " वहाँ जो लोग एकत्रित हो गये थे , वे गौरीनाथ की बातों का समर्थन करते हुए तालियाँ बजाने लगे । उनकी हँसी से अनन्तराम का सिर शर्म से झुक गया और वह वहाँ से चला गया । " 

उस वक्त विश्वम्भर ने बोला , " धर्म संकट की स्थिति खड़ा कर देने वाले अनन्तराम जैसे ब्यक्तिओ से निपटारा पाने  के लिए हमारा पांडित्य काफी कम पड़ गया था । वास्तविक रूप में ऐसी उलझनो के हल में पांडित्य की नहीं व्यावहारिक ज्ञान की जरूरत है । इस क्षेत्र में मुखिया गौरीनाथ जैसे व्यक्ति ही सफल हो सकते है 

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