उस समय जयपुर रियासत के राजा थे माधोसिंह । एक बार वह घूमने के लिए इंग्लैण्ड गए । महाराजा अपने नौकर - चाकरों सहित एक भव्य आलीशान बंगले में ठहरे । सुबह का समय था । महाराजा बंगले में बैठे अपना काम - काज कर रहे थे । बाहर नौकर आपस में बतिया रहे थे ।
इसी समय महाराजा से मिलने उनका एक अंग्रेज दोस्त आया । अंग्रेज के आते ही सारे नौकर उसकी ओर देखने लगे । अंग्रेज टूटी फूटी मामूली हिंदी जानता था । उसने महाराजा से मिलना चाहा । वह बंगले की सीढ़ियों की ओर बढ़ ही रहा था , तभी मोटे ताजे , हृष्ट - पुष्ट चौथमल चखणा को देखकर थोड़ा ठिठका ।
चखणा के अधनंगे खुले बदन को देख , अंग्रेज़ ने मुसकराते हुए कहा- " क्या कुश्ती लड़ोगे ? " " लड़ लो ! " - चखणा ने उत्तर दिया और उसने अंग्रेज की कलाई पकड़ ली । अंग्रेज कलाई छुड़ाने का प्रयास करता रहा । चखणा उसे कुछ ही देर में खुले मैदान में खींच लाया । मैदान में लाकर उसने अंग्रेज को एक पटखनी मारी अंग्रेज संभल नहीं पाया ।
वह धूल चाटने लगा । बिना समय खोए वह खड़ा हुआ । अपने कपड़ों की धूल झाड़ता हुआ , वह चखणा को बुरा - भला कहने लगा । इस घटना से चखणा और उसके साथी घबराए । उन्होंने भी चखणा को बुरा - भला कहा , पर अब वह करता भी तो क्या ! तुरंत बंगले में घुसा । रसोई में आकर आटा छानने लगा ।
अंग्रेज महाराज से मिला । उसने आप बीती सुनाई । मित्र के साथ हुए दुर्व्यवहार से महाराजा को गुस्सा आना स्वाभाविक था । अपराधी को पकड़ने के लिए उतावले हो उठे । तुरंत नौकरों को बुला भेजा । महाराजा के हुक्म से सारे नोकर एक जगह इकट्ठे हुए ।
अंग्रेज मित्र को वहाँ लाया गया । उन्हें अपराधी को पहचानने को कहा गया । चखणा भी लाइन में था , किन्तु उसके हाथ - पाँव आटे से बुरी तरह सने थे । उसका चेहरा एकदम बदल - सा गया था । अंग्रेज अपराधी की शिनाख्त नहीं कर सका । उसने बताया कि यहाँ के किसी आदमी ने उससे कुश्ती नहीं लड़ी ।
चौथमल ने जब यह सुना , तो उसकी जान में जान आई । उसने भगवान् को धन्यवाद दिया । दोपहर हुई । महाराजा भोजन करने बैठे । चखणा महाराजा के पास आया । आते ही वह महाराजा के चरणों में गिर पड़ा । फूट फूटकर रोने लगा । महाराजा ने जब रोने का कारण पूछा , तो उसने कहा- " अन्नदाता , माफ करो । मैं कसूरवार हूँ ।
महाराजा चखणा की बात सुनकर बहुत खुश हुए । उन्होंने चखणा को माफ कर दिया । गोपालजी के भोग के चार लड्डू उसे देते हुए महाराजा ने हँसते हुए कहा- " हमारे मेहमानों से लड़ना है । " चखणा इतना सुनकर बहुत खुश हुआ । वह महाराजा के गुणगान करता , नहीं अघा रहा था ।
