उत्तम मनुष्य श्रीपुर के राजा विष्णुवर्मा सहृदय और जिज्ञासु प्रकृति के व्यक्ति थे । उनकी सभा में एक विदूषक भी था । विदूषक का नाम था गौतम । एक शाम राजा वन - विहार के लिए निकले । विदूषक गौतम भी उनके साथ था । राजा विष्णुवर्मा ने विदूषक से पूछा , " बोलो , गौतम ! तुम्हारी दृष्टि में में कैसा मनुष्य हूँ ।
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| उत्तम मनुष्य की खोज |
महाराज , आप जैसा उत्तम मनुष्य तो पृथ्वी पर होना दुर्लभ हे ! " विदूषक गौतम ने उत्तर दिया । विदूषक की बात में राजा को अतिशयोक्ति प्रतीत हुई । उन्होंने पूछा , " गौतम , क्या तुम सोचते हो कि मेरे अन्दर कोई बुराई है ? " " महाराज , आपके अन्दर भला कौन - सी बुराई है ? यदि आप किसी पर क्रोधित होते हैं तो उस समय आपकी बात कुछ कठोर अवश्य प्रतीत होती है ,
लेकिन सब जानते हैं कि आपका हृदय मक्खन के समान कोमल है । " गौतम ने विनयपूर्वक कहा । विदूषक गौतम की बात से राजा के मन का समाधान नहीं हुआ । वे सोचने लगे , उत्तम मनुष्य कैसा होता है ? उसके लक्षण क्या है ? उसी दिन के बाद से राजा ने चैन की नींद नहीं लगी ।
वे इन्हीं प्रश्नों पर गहराई के साथ विचार करने लगे । राजा को अन्यमनस्क देख रानी ने उनसे पूछा , " महाराज , आपकी चिन्ता का क्या कारण है ? " राजा ने कहा , " मैं उत्तम मनुष्य को देखना चाहता हूँ । " " महाराज , आप इसे एक बड़ी समस्या मानकर विचार में डूबे हुए हैं ! जो लोग अपने किसी वचन से तथा किसी कर्म से दूसरों को दुख एवं नुकसान नहीं पहुँचाते , वे ही लोग वास्तव में उत्तम हैं ।
राजा विष्णुवर्मा की बुद्धिमती रानी रुक्मिणी देवी ने कहा । राजा को रानी की बातों में सच्चाई प्रतीत हुई । उन्होंने अपने राज्य के उत्तम मनुष्य को खोजकर उसे पुरस्कार देने का निर्णय कर लिया । राजा विष्णुवर्मा के निश्चय को सुनकर मंत्री उदयभानु विस्मित हो गया ।
फिर भी , मंत्री उदयभानु यह सोचकर चुप रहा कि उत्तम मनुष्य की खोज में राजा को अपने राज्य के बुरे लोगों का परिचय अवश्य प्राप्त होगा । एक रात राजा विष्णुवर्मा और उदयभानु छद्यमवेश धारण कर निकल पड़े । उन दोनों ने इस बात का परीक्षण करना चाहा कि उत्तम मनुष्य अपनी साधारण दिनचर्या में कैसा होता है ? दोनों ने ही सर्वप्रथम दो व्यक्तियों के परीक्षण का निश्चय किया । पहला व्यक्ति था
राजकवि दिवाकर और दूसरा था राजवैद्य सोमदत्त । सबसे पहले राजा और मंत्री राजकवि दिवाकर के घर पहुँचे । वे घर के पिछवाड़े से गये और खिड़की के पास अँधेरे में खड़े हो गये । कमरे में दीवार के पास कवि दिवाकर की पत्नी रत्ना एक चारपाई पर लेटी हुई थी ।
दिवाकर का शिष्य चंद्राकर अपने गुरु की सेवा में लगा हुआ था । उसने चाँदी की थाली में भोजन परोसा और कवि के सामने रख दिया । कवि दिवाकर ने देखा कि थाली में पानी की बूँद लगी हुई है । दिवाकर ने अपने शिष्य को पानी की वे बूँदें दिखाकर गरजकर कहा , " चंद्राकर , जो लोग कविता का अर्थ नहीं समझते , वे तुम्हें मेरे बराबर का या मुझसे भी श्रेष्ठ कवि कहने लगे हैं ।
क्या इसीलिए तुम अहंकार में प्रमत्त हो गये हो ? क्या तुम इतने अंधे हो गये हो कि तुम्हें थाली में पड़ी पानी की बूँदें भी न दिखाई दीं ? " यह बोलकर दिवाकर ने चंद्राकर को मारने की धमकी देते हुए अपना हाथ उठाया तो । चंद्राकर डर के मारे काँप उठता है। उसने उस थाली को दुबारा से साफ कर दिया फिर भोजन परोस दिया ।
इस बीच कवि दिवाकर की पत्नी रत्ना पीड़ा के कारण कराह उठी । फिर क्या था , कवि दिवाकर ने अपनी क्रोधधरी दृष्टि पत्नी की तरफ़ डाली और चीखकर कहा , " रत्ना , चार दिन के बुखार में इतनी भयानक पीड़ा होती है ? तुम इतना कराहती क्यों हो ? न मुझे खाने देती हो न सोने देती हो ! न मालूम मैंने पिछले जन्म में कौनसे पाप किये थे कि तुम जैसी विभूति मुझे पत्नी के रूप में मिली है ? "
दरबार में सौम्य और मधुर बने रहने वाले राजकवि दिवाकर का यह वास्तविक रूप देख राजा विष्णुवर्मा स्तम्भित हो गये । मंत्री उदयभानु को भी कम आश्चर्य नहीं हुआ । इसके बाद वे दोनों राजवैद्य सोमदत्त के यहाँ पहुँचे ।
सोमदत्त जिस कुटी में दवाइयाँ बना रहा था ,वहाँ से कुछ ध्वनियाँ निकल रही थीं । राजा और मंत्री कुटी की दीवार से सटकर खड़े हो गये और खिड़की के अन्दर से भीतर की ओर झाँक कर देखने लगे । वैद्य सोमदत्त का पुत्र रविदत्त खरल में तरह - तरह की जड़ी बूटियाँ डालकर उन्हें पीस रहा था । उसके चेहरे पर खीज के चिन्ह स्पष्ट दिखाई दे रहे थे ।
वैद्य सोमदत्त बड़ी तीक्ष्ण दृष्टि से अपने की तरफ़ देख रहा था । पुत्र " बेटा कुछ क्षण इसी तरह बीत गये । अचानक सोमदत्त ने कहा , रवि , तुम्हें मेरे कहे अनुसार ही करना होगा । " रवि बूटियाँ पीसते हुए बोला , " पिताजी , आप जो करने को कह रहे हैं , वह मुझे बिलकुल पसन्द नहीं है ।
यह उत्तर सुनकर राजवैद्य सोमदत्त ने दाँत पीसकर कहा , " रवि , मैं जानता हूँ कि वैद्य शास्त्र में तुम मुझसे आगे निकल गये हो । लेकिन , तुम धन का मूल्य न समझने वाले एक मूर्ख हो ! दमे की बीमारी के लिए हमने जिस दवा का आविष्कार किया है , उसका परिचय राजा को देने से हमारा कौन - सा कायदा होने वाला है ?
वे हमें यह आदेश देंगे कि इस दवा को हम रोगियों में मुफ़्त बाँट दें । अगर हम अपनी इस खोज को गुप्त रखें और इस नुस्खे को पड़ोसी राज्य से आये हुए व्यापारी के हाथ गुप्त रूप से बेच दें तो हमें सहज ही दस हजार स्वर्ण मुद्राओं की प्राप्ति हो जायेगी । समझे ! "
यह जवाब सुनकर राजा विष्णुवर्मा यह विचार करते हुए आगे बढ़े कि राजभक्ति दिखलाने वाला मेरा राजवैद्य क्या समुच इतने नीच स्वभाव का है ? मंत्री उदयभानु ने चुपचाप राजा का अनुसरण किया । चलते चलते दोनों नगर के बाहर पहुँचकर एक खेत की मेंड़ पर बैठ गये ।
पास में ही एक झोंपड़ी थी । उसके भीतर से किसी नारी के रोने की आवाज़ आ रही थी । राजा और मंत्री उठ खड़े हुए और झोंपड़ी के पास पहुँचे । झोंपड़ी के पीछे का दरवाज़ा खुला हुआ था । उन्होंने देखा कि एक खाट पर एक औरत लेटी हुई है ।
वे दोनों सोच ही रहे थे कि उस औरत की पीड़ा और उसके रोने का कारण पूछें कि इस बीच झोंपड़ी के सामने वाले द्वार को खोलकर एक आदमी झोंपड़ी के अन्दर आया । उस आदमी को देखते ही वह औरत कराह कर बोली , आहे , मेरा पैर बड़ी ज़ोर से दर्द कर रहा है !
झोंपड़ी के भीतर आया हुआ व्यक्ति उस औरत का पति था । उसका नाम रामदीन था । वह एक किसान था और दिन भर खेत पर काम करके थक गया था । पत्नी की कराह सुनकर वह अपनी थकान भूल गया और व्यथित होकर बोला , " अरी लक्ष्मी , क्या हुआ तुझं ? " कुए पर पानी भरने गयी हुयी थी वहा से भरकर ला रही थी । रास्ते में मेड से पैर फिसल गया फिर गिर गयी , वही घड़ा भी फुट गया । मेरे एक पैर में मोच आ गया काफी दर्द हो रहा है ।
इसलिए अभी तक मैंने चूल्हा भी नहीं जलाया है । " लक्ष्मी ने जवाब दिया रामदीन सब सुनकर दुखी हो उठा और बड़े प्रेम से अपनी पत्नी से बोला , " लक्ष्मी , तू चिन्ता मत कर ! चूल्हा भी मैं जला लूंगा और रसोई भी बना लूँगा । तू हिल - डुल भी मत और चुपचाप लेटी रह । मैं गरम पानी लाता हूँ । मोच पर सेंक देने से आराम मिलेगा और तुम सुबह तक चलने - फिरने लायक हो जाओगी ।
यह कहकर रामदीन ने रसोई में जाकर चूल्हा जलाया और पानी गरम करने रखा है इसके बाद रामदीन ने सबसे पहले अपनी पत्नी के पैर की सिकाई की । इसके बाद उसने रोटी बनाकर पहले लक्ष्मी को खाना खिलाया , फिर खुद खाया । लक्ष्मी ने पूछा , " आज तो रात हो गयी ! तुम इतनी देर करके घर क्यों लौटे ? "
हमारा जो अनाज बचा था , उसे मैं बेचना चाहता था । पर सौदा जल्दी नहीं पाया । बाहर शहर से एक साहूकार आया था । वह एक बोरे पर पाँच सिक्के ज्यादा देने के लिए कह रहा था । पर मैंने काफ़ी सोच - विचार किया और अपने नगर के ही व्यापारी के हाथ सारा अनाज बेच दिया । रामदीन ने कहा । " ऐसा क्यों किया ? हम एक बोरे पर पाँच सिक्के कम क्यों लें ?
इससे हमारा नुकसान होता है ? " लक्ष्मी ने कुछ रुष्ट होकर कहा । रामदीन धीरे से हँस पड़ा , फिर बोला , “ अगर मैं पाँच सिक्कों के लालच में आकर बाहर के व्यापारी के हाथ अपना अनाज बेच देता तो पता है क्या होता ? अभी जो नुक़सान मैंने उठाया , उससे कहीं अधिक नुकसान हमारे चारों तरफ के गाँवों के लोग उठाते ।
इस वर्ष फ़सल बहुत कम हुई है । अगर मैं बाहर के उस व्यापारी को अनाज बेच देता , तो जानती हो , वह क्या करता ? वह सारा अनाज थोड़े से मुनाफ़े के लिए हमारे शत्रु बने पड़ोसी राज्यों को बेच डालता । मैंने कम लाभ पर ही अभी जिस व्यापारी को अनाज बेचा है ,
वह अपने देश के साथ ऐसी दुष्टता कभी नहीं करेगा । वह ज़रूरतमन्द लोगों को उचित मूल्य पर अनाज़ बेचेगा । " पति का जवाब सुनकर लक्ष्मी को संतोष हो गया । उसने स्वीकृति में अपना सिर हिलाया । इसके बाद राजा विष्णुवर्मा और मंत्री उदयभानु वहाँ से निकल पड़े ।
रास्ते में राजा ने कहा , " अब मैं समझ गया कि उत्तम मनुष्य कैसा होता है ? यह किसान वचन और कर्म तथा विचार से भी उत्तम मनुष्य है । " " और महाराज , आपने राजकवि दिवाकर और राजवैद्य सोमदत्त के बारे में क्या सोचा है ? "
मंत्री ने पूछा । मेरा यह निर्णय है कि राजकवि दिवाकर के शिष्य चंद्राकर को राजकवि का पद दिया जाये और राजवैद्य सोमदत्त के पुत्र रविदत्त को राजवैद्य का । दोनों में ही इस किसान की भाँति दया , धर्म और देशभक्ति है । में किसान का राजकीय सम्मान करके उसे ' उत्तम मनुष्य ' का पुरस्कार देना चाहता हूँ । "
राजा विष्णुवर्मा ने कहा । एक सप्ताह बाद राजा विष्णुवर्मा ने अपने निर्णय के अनुसार चंद्राकार और रविदत्त को क्रमशः राजकवि और राजवैद्य के पद पर नियुक्त किया एवं सभा में किसान रामदीन का राजकीय अभिनन्दन किया ।
