श्रीराम ने लंका अधिपति राक्षसराज को समाप्त कर विभीषण को लंका का राजा बना दिया । वे खुद सीता और लक्ष्मण को लेकर पुष्पक विमान से अयोध्या आ गए । अयोध्यावासियों ने उनके आने की खुशी में घर - घर में दीपक जलाए । अगले दिन भरत जी ने श्रीराम को उनका राज्य सौंप दिया ।
राज्याभिषेक के बाद श्रीराम अपनी प्रजा के हर सुख - दुख का ध्यान रखने लगे । एक बार दरबार का सारा काम - काज समेट वे अपने शयनकक्ष में आए । विश्राम करने के लिए जैसे ही वे लेटे , सीताजी उनके पैर दबाने लगीं । लेटे - लेटे श्रीराम सोचने लगे- " मैं रावण , कुम्भकर्ण और ब्राह्मणों की हत्या की है , यद्यपि एक औरत को उठाने जैसा घृणित कार्य उन्होंने किया था तो भी ब्रह्महत्या का पाप तो मुझे लगेगा ही । "
सीताजी ने देखा , श्रीराम के माथे पर चिंता की लकीरें उभर आई हैं वे बोलीं- " प्रभो क्षमा करें । आप किस सोच में डूबे हुए हैं ? "
श्रीराम अपनी पत्नी सीता से कुछ भी नहीं छिपाते थे । बोले " प्रिये , हमने - कुम्भकर्ण आदि ब्राह्मणों का वध किया था । हमें यह चिन्ता सता रही है कि हम कहीं ब्रह्म हत्या के भागी तो नहीं बन गए ? " सीताजी बोलीं , " प्रभो , आप व्यर्थ की चिन्ता कर रहे हैं ।
महर्षि अगस्त्य से बढ़कर कौन ज्ञानी होगा , आप उनके आश्रम में जाकर अपनी चिन्ता का निराकरण कर सकते हैं । जब आपका राज्याभिषेक हुआ था उन्होंने आपको अपने आश्रम में आने का निमंत्रण भी दिया था । " सीताजी की सलाह सुनकर प्रभु राम की चिन्ता कुछ दूर हुई और वे गहरी निद्रा में सो गए ।
अगले दिन प्रातः वे महर्षि अगस्त्य के आश्रम की ओर चल पड़े । आश्रम पहुँचने पर उन्होंने महर्षि अगस्त्य को दण्डवत् प्रणाम किया । अपने आश्रम में श्रीराम को अचानक पाकर महर्षि अगस्त्य बहुत प्रसन्न हुए । जलपान के बाद उन्होंने श्रीराम से अचानक आश्रम में पधारने का कारण पूछा । श्रीराम बोले- " महर्षि आप तो परम ज्ञानी हैं ।
आपने तपस्या से और देश - देशान्तर घूम - घूमकर ज्ञान प्राप्त किया है । केवल आप ही मेरी चिन्ता दूर कर सकते हैं और मुझे ब्रह्महत्या के पाप से बचा सकते हैं । कृपया आप मुझे रास्ता दिखाइए । " " चिन्ता ? ब्रह्महत्या ? " ये आप क्या कह रहे हैं मर्यादा पुरुषोत्तम राम ? आप किस विषय में बात कर रहे हैं । जरा मुझे विस्तार से बताइए । "
महर्षि , रावण जैसे महापण्डित का वध कर मै ब्रह्महत्या का भागीदार बन गया हूँ । मैं उसी पाप के निराकरण की बात कर रहा हूँ । " श्रीराम बोले । अगस्त्य मुनि हँसते हुए बोले , " आपने कोई पाप कर्म नहीं किया है । यदि कोई ब्राह्मण आचारहीन और पतित हो जाए तो उसका वध करके , उसे शाप से मुक्त कर , उसे बैकुण्ठधाम में स्थान दिलाया है । इसमें आप बेकार में ही चिन्ता कर रहे हैं । "
श्रीराम कहे - " हे मुनिवर , अनजान रूप से किया गया पाप तो क्षमा करने के लायक होता है परन्तु हमने तो कुम्हकर्ण आदि का ब्राह्मणत्व जानने के बाद भी उन सभी का वध करके मौत के घाट उतार दिया है और मुझे यह भी भली - भाँति मालूम है कि ब्राह्मण वध पाप कर्म होता है । मुझे आप जब तक इस पाप कर्म का प्रायश्चित नहीं बतायेंगे , मुझे शान्ति नहीं मिलेगी । "
श्रीराम की चिन्ता निवारण हेतु महर्षि अगस्त्य बोले , " आप यदि अपने आपको दोषी मानते ही हैं तो अश्वमेध यज्ञ करवा लें जिससे आपको ब्रह्महत्या का पाप नहीं लगेगा । " उपाय सुनते ही श्रीराम का मनस्ताप जाता रहा । वे बोले , " महर्षि मैं आपका बहुत आभारी हूँ । अब आप मुझे जाने की आज्ञा दीजिए ताकि मैं जाकर अश्वमेध यज्ञ करवाने का प्रबन्ध कर सकूँ । ”
अगस्त्य मुनि कहे , " इस्वर आपकी सभी मनोकामना पूर्ण करे । राम आप हमारे आश्रम में आये हुए हो , इस इस वक्त हमारे पास में आपको देने के लिए और कुछ भी नहीं है । हाँ , हमारे पास कुछ दिव्य आभूषण मेरे पास पड़े हैं । इन्हें आप स्वीकार कीजिए । " श्रीराम बोले , " नहीं , नहीं महर्षि । क्षत्रियों का काम तो ऋषि मुनियों को देना होता है न कि लेना । आप कृपया इन्हें अपने पास ही रहने दीजिए । ”
अगस्त्य मुनि बोले , " आप इसे मेरी तरफ से उपहार मानकर रख लें । " श्रीराम बोले- " उपहार को तो कभी भी मना नहीं करना चाहिए । मै इन्हें स्वीकार करता हूँ । लेकिन महर्षि यदि आप बुरा न मानें तो मैं एक बात पूछना चाहता हूँ । " "
हाँ , हाँ पूछो । संकोच मत करो । " - अगस्त्य बोले । " महर्षि आप एक यायावर मुनि हैं , आपके पास ये आभूषण " कहाँ से आए ? " - श्रीराम ने पूछा महर्षि हँसने लगे और हँसते - हँसते बोले , “ आपका यह प्रश्न पूछना स्वाभाविक है । ये आभूषण कोई साधारण आभूषण नहीं हैं । क्या आप इनके प्राप्त होने की कहानी सुनना चाहोगे ? " जी मुनिवर श्रीराम कहे ।
महर्षि अगस्त्य कहे , " एक दिन की बात है जब मैं टहलते - घूमते सरोवर के नजदीक गया । रात्रि हो चुकी थी । हम वही मूल - कन्द खाया वही जल पीया सरोवर किनारे सो गया । अर्धरात्रि में अचानक मेरी आँख खुल गई । मैंने देखा कि एक दिव्य पुरुष आकाश से विमान में उतरा , उसके साथ कई गन्धर्व पुरुष और अप्सराएँ थीं ।
वह दिव्य पुरुष सरोवर में स्नान करने के पश्चात् वहाँ पड़े एक शव को खाने लगा । उसे शव को खाते देखकर मुझे बहुत आश्चर्य हुआ मैंने उससे पूछा हे दिव्य मानव । तुम्हरा सुन्दर और तेजस्वी चेहरा मोहरा है और तुम ऐसा निकृष्ट काम क्यों कर रहे हो ! "
फिर वह बोल पड़ा , " मुनिवर , दरअसल हम वासुदेव हमारे पिता थे वे एक राजा थे हमारा नाम श्वेत था । पिता जी के मृत्यु हो जाने के बाद हमारा राज्याभिषेक हुआ हमारा सांसारिक कार्यों से मै नफ़रत करता था इसलिए मैंने राज्यभार अपने छोटे भाई को सौंपकर सन्यास ले लिया । कई वर्षों तक तप करने के बाद भी मुझे भूख और प्यास बहुत लगती थी ।
जब मैं मृत्यु को प्राप्त हुआ तो मुझे तप करने के कारण ब्रह्मलोक में स्थान मिला लेकिन ब्रह्माजी ने मेरी भूख प्यास मिटाने के लिए मुझे अपनी ही शव देह को खाने के लिए कहा । कई वर्ष बीत गए हैं । मैं रोज अपनी ही देह खाकर अपनी भूख मिटाता हूँ । " वत्स , क्या इसका कोई अन्य उपाय नहीं है ? " -अगस्त्य बोले । "
मुझे ब्रह्मा जी ने बताया था कि जब महर्षि अगस्त्य इस वन में तपस्या करने आयेंगे तो उनके दर्शनों से तुम्हरा यह आहार छूटेगा और मेरा शव - देह को मुक्ति मिलेगी । मैं बस अब आपकी ही प्रतीक्षा में हूँ । " -दिव्य पुरुष बोला । तब महर्षि अगस्त्य बोले , " वत्स , मैं अगस्त्य ही तो तुम्हारे सामने खड़ा हूँ । ”
दिव्य पुरुष अगस्त्य मुनि के चरणों पर गिर पड़ा और उनके प्रति अपना आभार प्रकट करने लगा । बोला- “ महर्षि , आपके दर्शनों से मेरी भूख - प्यास मिट गई । अब मेरी देह को भी मुक्ति मिल जाएगी । आप कृपया ये कुछ दिव्य आभूषण मेरी तरफ से स्वीकार कीजिए । "
श्रीराम को पूरी कहानी सुनाकर महर्षि अगस्त्य बोले- " वे वही दिव्य आभूषण हैं जो मैं तुम्हें सौंप रहा हूँ । " श्रीराम उपहार लेकर और महर्षि अगस्त्य को नमस्कार करके कहे , " भगवन , आपके हुए दर्शनों से जरूर ही फायदा होती है । हमारा मन में जो दुबिधा थी वह आपका दर्शन पाकर दूर भाग चुका है । आप हमें जाने की अनुमति दीजिए ताकि मैं जाकर अतिशीघ्र अश्वमेध यज्ञ करवाऊँ । ”
महर्षि अगस्त्य से विदा लेकर श्रीराम अयोध्या लौट गए और अश्वमेध यज्ञ करवाकर ब्रह्महत्या के पाप से मुक्त हो गए । भगवान राम की विवेकशीलता लंकापति रावण पर विजय प्राप्त करने के लिए श्रीराम ने विजय यज्ञ का प्रबन्ध किया । पूर्णाहुति के लिए देवों के गुरु बृहस्पति को आना था , परन्तु उन्होंने समय से पहले ही अपनी असमर्थता भेज दी ।
अब तो रामेश्वरम के तट पर भारी कोलाहल आरम्भ हो गया । सभी सोच में पड़ गये कि बृहस्पति के बराबर का पण्डित कौन है ? कौन उस यज्ञ को सम्पन्न करा सकता है ? सभी ने प्रयत्न किया परन्तु कोई भी नाम उनकी समझ में नहीं आ रहा था । पण्डित की समस्या श्रीराम के सम्मुख प्रस्तुत की गई ।
राम ने कुछ क्षण सोचा और बृहस्पति के न आने के कारणों पर विचार किया । तभी वे धीरे से मुस्करा दिये । यह देखकर सारी सेना को बड़ा आश्चर्य हुआ । इससे भी बड़ा आश्चर्य उन्हें तब हुआ जब राम ने सहज लवाणी में सुग्रीव को संकेत करते हुए कहा , “ चिन्ता मत करो , सब ठीक हो जायेगा ।
आप किसी को लंकापति के पास भेजिये । " " परन्तु भगवन् । " सुग्रीव अपना मत पूरी तरह स्पष्ट भी नहीं कर पाया था कि राम ने उसकी बात काटते हुए कहा , " मैं तुम्हारे भ्रम को समझाता हूँ । फिर भी इस समय हमें यही करना होगा । संदेशवाहक वहाँ जाकर कहेगा - हे दशानन ! लंकापति से युद्ध में विजय प्राप्त करने के उद्देश्य से राम ने रामेश्वर के तट पर यज्ञ का आयोजन किया है ।
इसे सम्पन्न कराने के लिए देवगुरु बृहस्पति को आना था , परन्तु वे किसी कारण नहीं आ सके । इसलिए आप से सानुरोध निवेदन है कि आप स्वयं पधारकर यज्ञ को सम्पन्न कराने की कृपा करें । " सन्देशवाहक ने जब रावण को सन्देश सुना दिया तो सुनकर लंकेश गम्भीर हो उठें और कुछ विचार करने के पश्चात् मन्द - मन्द मुस्कराते हुए बोले , " बृहस्पति नहीं आये , यह तो ठीक है । ऐसा करके उन्होंने अपनी बुद्धि का परिचय दिया है , पर भी काम दूरदर्शी नहीं है ।
वह जानता है कि मेरे अतिरिक कोई दूसरा इस यज्ञ को पूरा नहीं करा सकता । निश्चय ही राम की सूझ अपूर्व है । खैर , तुम अपने राजा से जाकर कहो कि मैं समय पर पहुँच जाऊंगा । लेकिन उससे पहले सब सामग्री समेत पूरी तैयारी व्यवस्थित मिलनी चाहिए । "
लंकापति रावण श्रीराम द्वारा रचाये गये विजय यज्ञ सम्पन्न कराने जायेंगे , यह सुनकर रावण के मंत्रीमण्डल में खलबली मच गई । महामंत्री ने कारण पूछने का साहस किया तो रावण ने उन्हें डांटते हुए कहा , " महामंत्री । यह प्रश्न पूछकर अपनी अयोग्यता का प्रमाण मत दो । जाओ मेरे प्रस्थान का प्रबन्ध करो और हाँ , राम - पत्नी सीता हमारे साथ ही जायेंगी । इसका भी उचित प्रबन्ध होना चाहिये । ”
निश्चित समय पर रावण का विमान रामेश्वर के तट पर उतरा । श्रीराम ने स्वयं आकर उनका अभिनन्दन किया । उस समय लंकापति अति गंभीर दिखाई दे रहे थे । विमान से उतरते ही वे सीधे आसन की ओर बढ़ गये । सीताजी भी उनके साथ उतरी और महापण्डित रावण का संकेत पाकर श्रीराम के साथ आसन पर बैठ गई । दशानन ने यज्ञ का कार्यक्रम पूरा करने के पश्चात् पूर्णाहुति देते हुए कहा , " राम की जय और लंकापति का क्षय । ”
यज्ञ सम्पन्न होते ही रावण ने संकेत किया । सीताजी को विमान की ओर ले जाया गया । रावण भी तेजी से विमान की ओर बढ़ गया । विमान उड़ने से पहले रावण ने देखा कि सारा जन समूह विस्मय में पड़ा हुआ है । तब उन्होंने अपने चेहरे पर मन्द मुस्कान बिखेरते हुए कहा , “ आप लोगों को अचम्भा होना स्वाभाविक ही है क्योंकि में स्वयं अपने ही विरुद्ध होने वाले युद्ध में विजय प्राप्ति के उद्देश्य से रचे गये यज्ञ को कराने आया ।
इतना ही नहीं उसे सम्पन्न कराने के लिए सीता को भी साथ लाया । यह तो मैंने अपने व्यण्डित होने का कर्तव्य निभाया है । इस समय मैं लंकापति नहीं , अपितु महापण्डित के रूप में उपस्थित हूँ । वास्तव में यह राम की दूरदर्शिता ही है जो मुझे इस यज्ञ की पूर्णाहुति के लिए आमंत्रित किया ।
राम जानते थे कि पत्नी के बिना यज्ञ पूर्ण नहीं होगा । बृहस्पति भी यह सत्य जानते थे और चूँकि वे सीता को ला नहीं सकते थे , इसीलिये वे नहीं आए । परन्तु राम अच्छी तरह समझते थे कि यदि मुझे बुलाया तो सीता को लाने का प्रबन्ध भी मुझे करना पड़ेगा । "
अगले ही क्षण महापण्डित रावण का विमान सीताजी को लेकर आकाश की ओर उड़ गया । तट पर खड़ी सेना राम की दूरदर्शिता पर और रावण की कर्त्तव्यबुद्धि पर वाह - वाह करने लगी ।
