| सहेली की कहानी |
शाम का समय था । मौसम बहुत ही प्यारा था । मौसम अच्छा था । किन्तु सीमा बहुत उदास थी घर में बैठी थी । उदासी के आलम में घर बैठे - बैठे उसकी तबियत बहुत ही घबड़ाने लगा और वह चाहकर भी घर में बैठी न रह सकी उसने अपने कपड़े ठीक किए और घर से बाहर सड़क पर निकल आई ।
सड़क पर निरूद्देश्य की घूमते - घूमते उसके कदम अपने आप ही पास में एक पार्क की ओर उठ गए । एक पेड़ के नीचे बैठकर वह अपने जीवन के विषय में सोचने लगी । अपने विचारों में इतनी लीन थी कि उसे पता नहीं चला कि कब उसकी प्रिय सहेली प्रभा धीमे कदमों से चलती हुई उसके बिल्कुल पीछे आ खड़ी हुई । वह चौंक गई जब प्रभा ने उसको पुकारा । प्रभा ने पूछा- यहां अकेली बैठी क्या कर रही हो । सीमा के पास इस प्रश्न के सिवाय उस निर्जीव मुस्कुराहट के कोई उत्तर नहीं था ।
प्रभा ने बैठते हुए . कहा , क्या बात है सीमा , बड़ी उदास दिखाई दे रही हो । सीमा चुप रही । प्रभा ने फिर से पूछा नीता कहां है ? मैं देख रही हूँ कि आज कल तुम दोनों बहनें बड़ी अलग - सी रहने लगी हो । इससे पहले तुम दोनों में बड़ा प्रेम था , एक - दूसरे के बिना तुम लोग न कहीं जाती थी , न अलग ही रहती थी । अब क्या हो गया है । ऐसा लगा मानो प्रभा ने सीमा को किसी दुसरी रंग पर हाथ दिया हो । उसने एक लम्बी सांस ली । आंखों में आंसू उमड़ आये किन्तु उसने फिर भी कोई उत्तर न दिया पर प्रभा समझ अवश्य गई उसकी सहेली के दिल में जरूर कोई बात है जिसने उसे उदास कर रखा है ।
उसने सीमा के कंधे पर हाथ रखते हुए बड़े प्यार से कहा , इस तरह की उदासी अच्छी नहीं लगती अपना दुःख मुझे बताओं मैंने कभी तुम्हें अपने से अलग नहीं समझा । कोशिश करूंगी कि तुम्हारी मदद कर सकूं !
सीमा को हिम्मत मिली , उसने प्रभा का हाथ पकड़ लिया और बोली , हां प्रभा मैं नीता को बहुत प्यार करती थी और एक क्षण भी उससे अलग रहना नहीं चाहती थी । हम दोनों ने पिछले साल एक साथ ही यीशु को ग्रहण किया था । पर ... आज देखती हूँ कि मम्मी डैडी पूरे समय नीता की तारीफ करते हैं । हर समय कहते रहते हैं नीता ने यह किया , नीता ने वह किया . नीता बड़ी अच्छी लड़की है ।
प्रभा मैं भी तो घर का काम करती हूँ , अपना कमरा उससे ज्यादा सजाकर रखती हूँ । काम में मां का हाथ , बटाती हूँ । परन्तु मेरी कभी प्रशंसा नहीं करते । प्रभा मुझे बताते हुए संकोच होता है कि इन सब बातों ने मेरे ईर्ष्या को जन्म दिया है । मेरे और उसके बीच की दूरी बढ़ती जा रही है ।
यहां तक कि मैंने उसके परमेश्वर से भी नाता तोड़ दिया है । मुझे अब उसकी हर चीज हर बात बुरी लगने लगी है । यह सब बताते हुए सीमा बहुत उत्तेजित हो गई और उसकी आवाज भर्रा गई । प्रभा ने यह सब बातें बिल्कुल चुपचाप सुनी । वह प्रभु का विश्वासिनी थी और उसको प्रेम करती थी ।
सीमा को वह बहुत चाहती थी और उसकी इस प्रकार की बातों को सुनकर बहुत दुःख हुआ । उसे वह सोचती रही फिर बहुत ही प्रेम से उसने सीमा को समझानें की कोशिश की कि यह गलत सोच रही है । अवश्य ही उसकी कहीं - न - कहीं गलतफहमी है । वहीं बैठकर उसने सीमा के साथ बिनती की । बातों ही बातों में काफी समय बीत गया , अंधेरा हो आया और दोनों उठकर चली गई ।
उसके बाद से प्रभा बराबर के लिए प्रभु से प्रर्थना करती रही । सीमा भी अपने का दिल भेद प्रभा को बताकर अपने अन्दर काफी हल्कापन - सा महसूस करने लगी थी । किन्तु नीता के प्रति जो ईर्ष्या उसके दिल में थी वह दिन - प्रतिदिन बढ़ती ही जा रही थी । वह सदा यही सोचती रहती थी कि किस प्रकार अपनी बहन को नीचा दिखाए । सदा ही वह ऐसी बाते ढूंढ़ती थी कि जिनमें वह नीता से आगे बढ़ जाए ।
वह हमेशा उससे अच्छा काम करने का प्रयत्न करती थी । नीता भी अपने बहन के अन्दर आए हुए इस परिवर्तन को महसूस कर रही थी । किन्तु वह नहीं समझ पा रही थी यह सब क्यों हैं । क्यों उसकी बहन का व्यवहार उसके प्रति इतना रूखा- सा होता जा रहा है ।
एक दिन अपने कमरे में बैठकर सीमा इन्हीं सब बातों में सोच रही थी कि उसके पिताजी उसके पास आये और बोले , सीमा हमें अपना घर बदलना है , तुम घर का सामान बंधवाने में मां की मदद यह सुनते ही सीमा एकदम अनी जह से उठ खड़ी हुई और काम करने में व्यस्त हो गई । नीता भी घर का सामान बंधवा रही थी किन्तु नीता जिस काम को भी हाथ लगाती सीमा एकदम उसे हटाकर स्वयं उस काम को करने लगती ।
नीता भौंचक्की - सी उसका व्यवहार देख रही थी और मन ही - मन समझने की कोशिश कर रही थी कि सीमा को क्या हो गया । सीमा भारी - भारी चीजें अपने आप उठा इधर से उधर रख रही थी , पसीने से तर काम करते - करते वह बिल्कुल पस्त हो चुकी थी
परन्तु मन ही मन जलन बराबर बढ़ती जा रही थी । वह काम करते हुए अपने मन में सोच रही थी कि यही अच्छा मौका है नीता को नीचा दिखाने का । काम करते - करते वह एक अलमारी पर से सामान उतारने के लिए एक कुर्सी पर कूदकर चढ़ी , परन्तु संभल नहीं पाई , कुर्सी उलट गई । गिरने से संभलने के लिए जैसे ही सीमा ने अलमारी को पकड़ना चाहा , आलमारी का सामान भी उस पर गिरने लगा , कुछ भारी - भारी सामान भी उस पर गिर पड़ा । सीमा को बहुत चोट आई सिर पर एक जिससे खून बह रहा था । बड़ा - सा घाव हो गया ,
नीता ने जैसे ही अपनी बहन को देखा , वह एकदम घबरा गई , फौरन ही उसने अपना सारा काम छोड़ा और उसकी सहायता के लिये दोड़ी । जल्दी - जल्दी उस पर से सारी चीज हटाई मुंह पर से गर्दा साफ की । सीमा दर्द से करह रही थी , नीता बड़े प्यार से उसके सिर पर हाथ फेरती रही , उसकी सेवा करती रही ।
डैडी ने उसे उठाकर पलंग पर लिटाया नीता एक क्षण के लिए भी उससे दूर न हुई उसके पास बराबर बैठी रही उसकी देख - रेख करती रही । नीता के इस सुन्दर व्यवहार को देखकर सीमा को बहुत शर्म आई , वह अपने मन में सोचने लगी । वास्तव में नीता में और मुझसे बहुत अंतर है । नीता सच्चे हृदय से प्रभु परमेश्वर से प्रेम करती है । जिससे इसके मन में नम्रता , धीरज और प्रेम भरा है ।
उसने अपनी आंखों को बंद कर लिया और सोचने लगी- प्रभु यीशु का प्रेम कितना अजीब है उसने हमारी खातिर कितना दुःख उठाया , कुर्सी पर चढ़कर अपना लहू बहाया । अपनी जान दी है । ताकि हम बच जाएं और उस भयंकर पाप को न उठाए और मैं अपनी बहन से प्रेम करना तो दूर की बात , उसकी प्रशंसा तक मुझे सहन नहीं कर पाई और अब उससे ईर्ष्या करने लगी जबकि मुझे यह सब सुनकर प्रसन्न होना चाहिए था ।
उसकी आंखों में आसूं भर आए । वह फूट - फूटकर रोने लगी । अपनी प्यारी नीता का अपने हाथ में लेकर बोली नीता मुझे क्षमा कर दो । मैं अपनी सही राह से भटककर बहुत दूर चली गई थी । ईर्ष्या का विषय मेरे मन में जन्म ले रहा था । नीता जानती हो इतना ही नहीं परन्तु मैंने यह फैसला कर लिया था कि जिस प्रभु परमेश्वर पर तुम विश्वास करती हो , मैं उसे नहीं मानूंगी । पर प्रभु का धन्यवाद हो उसने ठीक समय मेरी आंखों खोल दी है ।
मैं जानती हूँ क मेरी सहेली प्रभा की प्रार्थना की उत्तर है । नीता ने झुककर सीमा के माथे पर प्यार कर लिया , उसने दिल से प्रभु को धन्यवाद दिया । यदि किसी को किसी पर दोष देने का कोई वजह ही तो एक दूसरे को सहलाना सीखो, और दूसरे पर अपराध क्षमा करो सीखो । जैसे की प्रभु ने तुम्हारे अपराध क्षमा कर देते है वैसे ही तुम भी करो ।