राजपुर के ठाकुर ने सौ - सौ रुपए की तीस ढेरियाँ लगाईं , यानी तीन हजार रुपए । उन दिनों आज की तरह नोट नहीं चलते थे । लोग थैलियों तथा बोरियों में भरकर रुपए लाते , ले जाते थे । ठाकुर ने मियां फुसकी से कहा- " सुबह जल्दी आ जाइएगा । तीन हजार रुपए लेकर गोंडल गाँव जाना है । वहाँ जयराम पटेल के बेटे अशोक पटेल को रुपए देने हैं ।
मैं तभा भट्ट को भी सुबह जल्दी आने के लिए कह दिया है । दूसरे दिन तभा भट्ट ठाकुर की बैठक में आकर बैठ गए । मियाँ फुसकी को आने में कुछ देरी हुई । भट्ट जी ने हँसते हुए पूछा- " इतनी देर क्यों कर दी ? " मियां जी ने कमर में लटकी तलवार की तरफ इशारा किया । भट्ट जी चिढ़ गए । मियां फुसकी ने हँसकर कहा- " हमें तीन हजार रुपए लेकर जाना है । रास्ते में कोई चोर - लुटेरा मिल गया , तो आपको दो थप्पड़ लगाएगा और रुपयों की थैली लेकर भाग जाएगा ।
लेकिन मेरी तलवार देखते ही वह डर जाएगा । फिर तो पाँच पैसे भी लेने के लिए मेरी तरफ नहीं बढ़ेगा । मैं यह तलवार उसकी गर्दन पर रख दूँगा । " वे दोनों बातें कर ही रहे थे कि ठाकुर तीन हजार रुपयों की थैली लेकर आ गए । मियाँ फुसकी ने ठाकुर से कहा- " यह थैली भट्ट जी को दे दीजिए । भट्ट जी थैली संभालेंगे और मैं उनके पीछे - पीछे तलवार लेकर चलूँगा । मेरी तलवार देखकर कोई भी पास नहीं झपटेगा । ठाकुर ने भट्ट जी को रुपयों की थैली सौंप दी । दोनों चल पड़े ।
आगे - आगे तभा भट्ट और पीछे - पीछे मियाँ फुसकी चल रहे थे । भट्ट जी के कंधे पर रुपयों की थैली थी । मियाँ फुसकी तेजी से चलने के कारण आगे निकल गए थे । मियाँ फुसकी तलवार की मूंठ पर हाथ रखकर खांसते - खांसते बढ़ रहे थे । लगभग दो घंटे लगातार चलने के बाद मियां फुसकी को थोड़ी थकावट लगी । तभी उन्हें एक तालाब दिखाई पड़ा । तालाब के किनारे एक वट का पेड़ था । गर्मी के दिन थे । मियाँ जी वहाँ ठहर गए । पीछे देखा , तो भट्ट जी दिखाई नहीं दिये । मियाँ जी ने सोचा- " जब तक भट्ट जी यहाँ आयेंगे , तब तक मैं थोड़ा विश्राम कर लूँ
मियाँ फुसकी ने पलटकर देखा , तो काँप उठे - सामने एक आदमी हाथ में कुल्हाड़ी लिये खड़ा था । वह लुटेरा था । वह बोला- “ मियां जी , इस कुल्हाड़ी की एक चोट से आपके सिर के दो टुकड़े हो जायेंगे । सारे रुपये मेरे हवाले कर दो । इसी में तुम्हारी खैर है । " यह सुन , मियाँ फुसकी हँस पड़े । लुटेरा गुस्से से बोला- “ लाओ , रुपए मुझे दे दो । अब देर लगाओगे , तो मैं कुल्हाड़ी से तुम्हारा काम तमाम कर दूँगा ।
दे दो तीन हजार रुपए ! मियाँ फुसकी हँसकर बोले- “ मुझे हँसी इसलिए आ रही है कि तुम से कोई भूल हो गई है । " लुटेरे ने पूछा- " क्या मतलब मियाँ फुसकी ने बोला इसका मतलब यह है कि तुम्हारी तीन-चार हजार रुपए वाली बात तो बिलकुल सही है, किन्तु वह पैसे गोंडल गाँव से हमें लाना हैं । इस वक्त मै बिलकुल खाली हाथ हूँ । " तब लुटेरे ने बोला- " तो क्या उस ठाकुर के आदमी ने मुझे जो समाचार दिया था , वह क्या झूठा था ?
मियाँ फुसकी ने मुसकरा कर कहा- " समाचार तो सच . था , लेकिन तीन हजार रुपए लेकर जाने की बात नहीं थी , बल्कि गोंडल गाँव जाकर रुपए लाने की बात थी । इसलिए यह गड़बड़ी हो गई । हम तो रुपए लेने जा रहे हैं , देने नहीं । " यह सुन लुटेरा लौट पड़ा । तभी उसने तभा भट्ट को आते देखा ।उसने फिर मियाँ जी की तरफ देखा । मियाँ जी ने सोचा - ' यह लुटेरा भट्ट जी से रुपए छीन लेगा । मार - पिटाई भी करेगा । ' इतने में भट्ट जी वहाँ आ पहुॅचे ।
उन्होंने मियों से पूछा- " क्यों खड़े हैं ? " लुटेरे ने तभी भट्ट की तरफ देखते हुए कहा- " लाओ , रुपयों की थैली मुझे दे दो । " यह सुनकर भट्ट जी ने आश्चर्य से कहा- " कौन से रुपयों की थैली लुटेरे ने भट्ट जी की तलाशी ली । उनकरे पास कोई थैली थी ही , नहीं मियाँ फुसकी बोले- " अरे मेरे भाई , रुपए लेकर हम जाते होते , तब तो हमारे पास रुपए होते ! हम तो रुपए लेने जा रहे हैं । तथा भट्ट रुपयों का बोझ ढोने का काम नहीं करते । "
अब लुटेरे ने मियाँ फुसकी की तलाशी ली । मियाँ फुसकी की जेब में एक रुपया पड़ा था । मियाँ फुसकी ने कहा- “ मेरे भाई , यह रुपया आप इनाम समझकर रख लीजिए । " लुटेरे ने वह रुपया नीचे फेंक दिया और चला गया । भट्ट जी ने मियाँ फुसकी से पूछा- " इस आदमी को कैसे पता चला कि हम तीन हजार रुपए लेकर जा रहे हैं मियाँ फुसकी ने बताया ऐसे लोगों को रुपए - पैसों की भनक लग ही जाती है
लेकिन रुपयों की थैली आपके पास थी , वह कहाँ गई ? " तथा भट्ट ने कहा- " मैं दूर से आपको देख रहा था । मैं समझ गया कि किसी चोर - उचक्के ने आपको रोक लिया है । मामला गड़बड़ देख , मैंने रुपयों की थैली गड्ढे में छिपा दी थी । " मियाँ फुसकी बहुत खुश थे । उन्होंने भट्ट जी को गले से लगा लिया ।
भट्ट जी ने कहा- " मियाँ , तुम अपने को बहुत चतुर समझते हो , पर इस बार तो बुद्धिमानी का काम मैंने किया है । " मैंने भी कम बुद्धि नहीं लगाई । मैंने उसे बहका दिया था कि हम रुपए लेकर नहीं बल्कि , रुपए लेने जा रहे हैं । " चलो , हम दोनों ने ही बुद्धि का काम किया है और उस लुटेरे को खाली हाथ लौट जाना पड़ा । " - इस प्रकार की बातें करते वे गड्ढे के पास पहुँचे । रुपयों की थैली लेकर वे गोंडल गाँव की ओर बढ़ गए ।