रावण का वध कैसे हुआ था | How did Ravana get killed

रावण का वध


 इंद्रजीत , रावण का परम प्रतापी पुत्र था । वह महान शिव भक्त था , जिसने अपनी घोर साधना से अनेक दिव्य अस्त्र प्राप्त कर रखे थे । युद्ध कला में तो उसका कोई सानी न था । उसके हारने की तो रावण ने कभी कल्पना तक नहीं की थी । तभी जब युद्ध क्षेत्र से आये दूत ने उसे इंद्रजीत की मृत्यु का दुखद समाचार दिया तो उसे विश्वास न हुआ । 

इंद्रजीत और लक्ष्मण के हाथों मारा जाय ! असम्भव ! पर दूत का बुझा चेहरा , झुकी हुई आँखें बता रही थीं कि असम्भव आज सम्भव बन चुका है । इंद्रजीत सबको छोड़कर जा चुका पुत्र के लिए दुःख की पीड़ा को वह परम प्रतापी भी सहसा दबा नहीं सका । 

उसका लाल - लाल आँखों से आंसू टपक पड़े । उसकी साँसें तेजी से चलने लगीं , तूफान की तरह । रह - रहकर उसका मन पुत्र के लिए चीत्कार कर उठा था , वो हमारे प्यारे बेटे हे दुर्लभ योद्धा ! तुम तो देवेन्द्र तक को हरा चुके थे , तुमसे यह कैसे जीत गया ?  पुरे लंका को मनो की साप सूंघ गया हो । 

रावण मानो अपने आप में बातें कर रहा हो , " नहीं , तुम हमें छोड़कर कैसे जा सकते हो ? मैं तुम्हारी माँ को क्या कहूँगा ? तुम्हारी प्यारी पत्नी को कैसे समझाऊँगा ? " इसी तरह कुछ देर तक रावण बिल्क-बिल्क कर रोता रहा । 

फिर उसका ध्यान वास्तविक स्थिति की ओर मुड़ा । उसने अपने आप पर नियंत्रण करने की कोशिश की , " नहीं , मुझे रोना नहीं चाहिए । यह तो कायरता के लक्षण हैं । मेरा बेटा शूरवीर था । वह वीरों की तरह लड़ा और वीर गति को प्राप्त हो गया । मेरे रोने से तो उसका अपमान होगा । " 

फिर शोक के साथ - साथ क्रोध भी उपजा । सबसे पहले लक्ष्मण पर , जिसके हाथों इंद्रजीत मारा गया था । फिर राम पर , जिसने लंका पर आक्रमण करके इतना विनाश करवाया था । और फिर सीता पर , जिसके कारण ऐसी स्थितियाँ बनीं । सीता का ध्यान आते ही रावण का सारा गुस्सा उसी पर केन्द्रित हो गया ।  यही वह कारण का जड़ जिसके नाते ये सब हुआ है । " 

वह दाँत पीसता हुआ बोला । “ मैं उसे अभी इसी समय मार डालूँगा । " यह कह कर वह तलवार लिये अशोक वाटिका की ओर तेज कदमों से चल पड़ा । यह देख कर सुपार्श्व नामक एक राक्षस उसे शान्त करने दौड़ा । उसने समझाया कि असहाय सीता को मारने से क्या मिलेगा , सिवाय कलंक के । उसकी शत्रुता तो राम से है । उसी से उसे युद्ध करना चाहिये । 

एक स्त्री का वध करना महाबली रावण को शोभा नहीं देगा । रावण उसकी बात मान गया । रावण ने एक बार फिर अपनी विशाल सेना राम को मारने के लिए भेजी । दोनों सेनाओं में भयंकर युद्ध हुआ , पर राक्षस सेना टिक न सकी । अब तो रावण की एक इच्छा राम पर विजय पाने की थी । 

उसने अपनी साधना से अनेक दिव्य शक्तियाँ प्राप्त कर रखी थीं । उसे पूरा विश्वास था कि वह राम को आसानी से हरा देगा । पितामह का दिया हुआ कवच पहन कर , रथ पर सवार होकर , वह अपनी सेना के साथ युद्ध के लिए निकल पड़ा । निकलते समय अनेक पक्षी अपशकुन वाली बोलियाँ बोल रहे थे । पर दृढ़निश्चयी रावण ने उनकी कोई परवाह न की । पूरे आत्मविश्वास के साथ वह नगर के उत्तरी द्वार से बाहर निकला । 

साथ में दिसपाक्ष , महोदर , महापार्श्व आदि राक्षस वीर भी थे । युद्ध शुरू हुआ । रावण के अनेक वीर , सुग्रीव तथा अंगद के हाथों मारे गये । लक्ष्मण रावण से युद्ध करने लगा पर वह आसानी से उसके वाणों को काटता हुआ अपने लक्ष्य राम के सामने जा पहुँचा । पहले उसने राम को अपने साधारण अस्त्रों से ही मारना चाहा , पर वे बेकार रहे । फिर ने और शक्तिशाली वाणों का प्रयोग किया । 

राम ने उन्हें भी रोक लिया । उधर राम भी रावण को मारने के लिए पूरा प्रयास कर रहे थे । वे भी एक के बाद एक घातक वाण मंत्र पढ़ - पढ़कर चला रहे थे । पर रावण के दिव्य कवच के कारण उनका उस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ रहा था । युद्ध बराबर बढ़ता ही जा रहा था । दोनों ही योद्धा एक - दूसरे के दिव्य शक्ति वाले अस्त्रों को देख कर चकित थे । 

किसी के वाण से अग्नि की ज्वाला निकलती थी तो कोई वर्षा द्वारा उसे बुझा देता था । किसी का वाण हजारों वाणों में बँट जाता था तो दूसरा भी वैसा ही वाण चलाकर उन्हें बेकार कर देता था । राम की सहायता के लिए लक्ष्मण और विभीषण भी आ गये । विभीषण को देख कर रावण क्रोध से आग बबूला हो उठा । 

उसने एक शक्तिशाली वाण उस पर फेंका । पर लक्ष्मण ने उसे चकनाचूर कर दिया । इस प्रकार लक्ष्मण भी रावण के हर वार का जवाब देते रहे । अन्त में रावण ने एक अत्यन्त घातक वाण चला दिया , जिसे लक्ष्मण संभाल नहीं पाये और बेहोश हो गये । 

उन्हें तुरन्त युद्ध क्षेत्र से बाहर ले जाया गया । हनुमान जी द्वारा संजीवनी बूटी लाने पर उन्हें होश आया । उधर राम जब काफी देर तक पैदल युद्ध करते रहे और कोई परिणाम न निकला तो देवराज इन्द्र ने उनके लिए अपना रथ और सारथी मातलि को भेजा । राम ने उन्हें स्वीकार किया और रथ पर सवार होकर युद्ध करने लगे । 

युद्ध की थकान से रावण कुछ देर के लिए बेहोश हो गया । उसका सारथी उसे बचाकर युद्ध - भूमि से बाहर ले गया । होश आने पर वह फिर से आकर भयंकर युद्ध करने लगा । राम और रावण दोनों ही अद्वितीय योद्धा थे । अस्त्र - शस्त्रों का ऐसा प्रयोग तो किसी ने कभी देखा था । सभी ठहर कर आश्चर्य से उनका युद्ध देखने लगे । 

अन्त में सारथी मातलि ने धीरे से कहा , " हे राम ! पापी रावण का अन्त समय आ गया है । अब देर करने से लाभ नहीं । तुरन्त ब्रह्मास्त्र क्यों नहीं चला देते ? " राम भी देख रहे थे कि वे , हर बार रावण के शीश काटते थे और हर बार अमरत्व के वरदान के कारण उसके नये सिर आ जाते थे । इस पर विभीषण ने श्रीराम को बताया कि रावण की नाभि पर तीर मारने से उसका अन्त हो सकता है । 

श्रीराम ने दिव्य ब्रह्मास्त्र को , मंत्र पढ़कर , रावण की ओर चला दिया । धनुष से छूटते ही प्रचण्ड ब्रह्मास्त्र तीव्र ज्वालाओं के समान उमड़ा और सीधा रावण के शक्ति कवच को भेदता हुआ उसकी नाभि में जा घुसा । उसके हाथ से धनुष छूट गया । अगले ही क्षण अपराजेय रावण पराजित होकर धरती पर गिर पड़ा और उसके प्राण निकल गये । 

रावण के मरते ही देवताओं ने दुंदुभी बजाकर जयघोष किया । आकाश से फूलों की वर्षा होने लगे । रावण की मृत्यु का समाचार फैलते ही युद्ध - क्षेत्र में सभी राम की जय - जयकार करने लगे । उधर सारी लंका में शोक की लहर दौड़ गयी । रावण के मृत शरीर को देखकर विभीषण के हृदय में करुणा जाग उठी । उसका भ्रातृ -प्रेम एक बार उमड़ पड़ा । 

वह स्वयं को रोक न सका और रो - रोकर करुण विलाप करने लगा कि महापंडित और महाप्रतापी होते हुये भी आज उसका भाई किस प्रकार धरती पर पड़ा है । क्यों उसने सब कुछ होते हुए भी पाप का मार्ग पकड़ा और इतना समझाने पर भी उसी पर अड़ा रहा उसके घमंड के कारण ही आज यह दिन देखना पड़ रहा है । 

राम ने विभीषण को धीरज बंधाया और सांत्वना देते हुए कहा कि उसका भाई एक परमवीर के समान लड़ा और वीरों की मौत मरा । यह गर्व की बात है । मृत्यु के बाद सब कुछ समाप्त हो जाता है , शत्रुता भी । अब राज्य की जिम्मेदारी उसी के कंधों पर आ पड़ी है । 

उसे अपने आप पर नियंत्रण रख कर आगे के कार्य करने हैं । सबसे पहले रावण की पूरे सम्मान के साथ अंत्योष्टि की व्यवस्था होनी चाहिए । रावण की मृत्यु का समाचार पाकर शोक संतप्त रानियाँ भी वहाँ आ गयीं । वे बिलख - बिलख कर भीषण विलाप कर रही थीं । मंदोदरी कह रही थी कि किस प्रकार उसने रावण को बार - बार समझाने की कोशिश की कि पराई स्त्री पर बुरी दृष्टि डालना पाप है ।

 वह सीता को वापिस लौटा दे । पर उसने एक न सुनी । सीता के रूप में वह अपने काल को घर ले आया था । लोगों ने उसे किसी प्रकार शान्त करने का प्रयास किया । वह तड़प कर बोली- “ हे नाथ , राम और सीता तो अब आपस में मिल गये , पर मैं आपसे बिछुड़ गयी । हरे इस्वर अब हम क्या करे क्या ना करे ? " उसकी करुण दशा देखकर सभी का हृदय विचलित हो उठा । 

वह मानो अपने आपसे ही बोल रही थी , " मुझे तो यह गर्व था कि मैं महाबली रावण की पत्नी हूँ , इन्द्र को हराने वाले इंद्रजीत की माता हूँ । पर आज सब कुछ मिट्टी में मिल गया । मैं लुट गयी । तुम कैसे रक्त से सने कीचड़ में पड़े हो रोरोकर उसके बुरे हाल हो चुके थे वह अचेत होकर रावण के मरे हुए शरीर पर गिर पड़ी ।

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