राजा प्रजा और महात्मा की कहानी | अपनी खोज

भगवान का सच्चा भक्त


 एक राजा थे दुलारसिंह जी। नाम के अनुरूप प्रजा से बड़ा स्नेह करने वाले थे। उनकी प्रजा भी अपने राजा को बहुत चाह रही थी । एक बार उनके जीवन में ऐसा भी हुआ जब एक महात्मा जी अपने शिष्य मंडली के साथ राजधानी में पधारे । दुलारसिंह ने सबके रहने की उचित व्यवस्था करवा दी । एक दिन पुरे मंडली सहित महात्मा जी को राजमहल में आमंत्रित किया । महात्माजी पहुचे । दुलारसिंह ने परिवार सहित महात्माजी की चरण की धूलि ली । फिर उन्होंने राज - परिवार को आशीर्वाद दिया । 

दुलारसिंह ने कहा- " महात्मा जी , मेरे मन में एक प्रश्न बार - बार उठता है । मैं उसका समाधान चाहता हूँ । " महात्माजी के पूछने पर राजा ने कहा- " राजधानी में एक भव्य मंदिर है । मैं सपरिवार वहाँ रोज दर्शन - पूजन के लिए जाता हूँ । हमारे राज्य की प्रजा में भी भाव है । फिर भी मैं यह नहीं जान पाया कि भगवान का सच्चा भक्त भरपूर भक्ति कौन है ? 

 दुलारसिंह की बात सुन महात्मा जी हँसकर बोले- " यह जानना कठिन नहीं है । मेरे पास पवित्र हवन सामग्री है । वह तुरन्त प्रज्वलित हो उठती है , लेकिन ऐसा उसी स्थिति में होता है जब कोई सच्चा व्यक्ति उसे हाथ में ले । तुम एक यज्ञ का आयोजन करवाओ । ” महात्माजी की बात सुन , राजा कुछ सोच में पड़ गये । महात्माजी ने कहा- " शायद तुम यह सोच रहे हो , इस तरह तो किसी का हाथ सकता है । 

तो इसका उपाय यही है कि लोग लोहे के छोटे - छोटे पात्र लेकर आएँ । मैं हर पात्र में अपने हाथ से थोड़ी - सी पवित्र हवन सामग्री डाल दूँगा । बस जो भगवान का सच्चा भक्त होगा  उसी के पात्र में हवन की सभी सामग्री खुद बखुद प्रज्वलित हो जाती है  । दुलारसिंह ने डुग्गी मुरदी करा दी । सम्पूर्ण प्रजाजन हाथ में छोटे - छोटे पात्र लेकर राजभावन के सामने की मैदान में इकट्ठा बटूर जाते है । 

महात्माजी एक व्यक्ति को बुलाते और उसके पात्र में चुटकी भर हवन सामग्री डाल देते । काफी समय तक यही क्रम चलता रहा । दुलारसिंह तथा राजपरिवार के अन्य सदस्य भी महात्माजी के इस प्रयोग में शामिल हुए । कुछ देर बाद महात्माजी ने कहा- “ दुलारसिंह , अभी तक प्रयोग सफल नहीं हुआ है । सच्चा भक्त सामने नहीं आया है । " यह देखकर दुलारसिंह का मन अशांत हो गया । उसने कहा " महात्माजी , इसका अर्थ तो यही हुआ कि मैं और मेरे परिवार के सदस्य भी सच्चे भक्त नहीं हैं । " महात्माजी ने कहा- " अभी बहुत से लोग रह । आओ , हम उनके पास चलें । 

इसके बाद महात्माजी के साथ दुलारसिंह एक रथ में बैठे । रथ चलने लगा । जहाँ रथ रुकता , भीड़ जमा हो जाती । महात्माजी हर व्यक्ति के पात्र में वही हवन सामग्री डाल देते । गए इसी समय एक बूढ़ा महात्माजी के पास आया । महात्माजी ने उसके पात्र में जैसे ही हवन सामग्री डाली , वह एकदम प्रज्वलित हो उठी । दुलारसिंह ने देखो , बूढ़ा दीन - हीन वेश में था । ' तो क्या यह सच्चा भक्त है ? ' - राजा के मन में आया । वह चकित थे ।

 उन्हें विचारमग्न देख , महात्माजी हँस पड़े । उन्होंने बूढ़े से उसके परिवार के बारे में पूछा बूढ़े ने कहा- " हम तो साधारण आदमी है । हम कुटिया में बैठकर सूत कातता रहता हूँ । मै , इसी के साथ भगवान का नाम जाप किया करता हूँ । हमारे अलावा इस घर में और कोई नहीं रहता है । पत्नी बहुत दिन हुए स्वर्ग सिधार गई । बेटी का विवाह हो गया है । सूत बेचने से जो कुछ मिलता है , उसी से गुजारा चलता है । मैं नहीं जानता कि भक्ति किसे कहते हैं , सच्चा भक्त कौन होता है महात्मा और राजा दुलारसिंह उस जगह से यज्ञ - स्थल की तरफ गए । उनके  साथ में वह बूढ़ा भी वहा था जिसके पात्र में डालते ही हवन सभी सामग्री खुद-बखुद प्रज्वलित हो गई थी । 

वह बेचारा हैरान था । उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि सब उसे इतने सम्मान से क्यों देख रहे हैं । यज्ञ में दूर - दूर से संत - महात्मा आए थे । यज्ञ समाप्त होने के बाद दुलारसिंह ने एक बहुत बड़ा भोज दिया । वह महात्माजी के आदेश का पालन करता जा रहा था , पर मन में उलझन थी-- ' मैं राजा हूँ , फिर भी सबसे बड़ा भक्त नहीं बन सका । ' आयोजन संपन्न हुआ तो महात्माजी ने जाने की इच्छा प्रकट की । दुलारसिंह ने कहा- " मेरी शंका का समाधान नहीं हुआ । मैं चाहता हूँ , यह बूढ़े बाबा कुछ दिन राजमहल में रहें । 

मेरा भी मन करता है इनसे सच्ची भक्ति का रहस्य जान पाउ  । राजा जी की बात सुनकर महात्मा जी हस पड़े । उन्होंने बूढ़े बाबा जी की तरफ देखा । और वह बोला मैं जिस कुटिया में रहा करता हु वहीं पर ठीक ठाक हूँ । आखिर में राजमहल मै क्यों रहने जाऊ ? मुझे किसी से कुछ नहीं चाहिए । " महात्माजी के कहने पर राजा ने बूढ़े बाबा को जाने की अनुमति दे दी ।

महात्माजी ने कहा- ' - " दुलारसिंह , यह चिंता छोड़ो कि सबसे बड़ा भक्त कौन है ? बस अपना कर्म करते रहो । न्याय से शासन चलाओ , सच्चे मन से ईश्वर का नाम लो । तुमने देखा , सच्चा भक्त ढूँढ़ने की चिंता में कितना समय व्यर्थ हो गया । " " आप ठीक कह रहे हैं !  दुलारसिंह ने बोला वह महात्मा की बात का मर्म समझ लिया था ।





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