दीपा और उसकी सगी बहनों की कहानी | छूना है आकाश

 

Deepa-Kee-Kahaanee

मुझे अपनी कक्षा की सभी छात्राओं से प्यार है । मैं इन्हें पूरा समय देती हूँ । केवल कक्षा में ही नहीं , कक्षा के बाद इनके घरों में जाकर भी । मेरे दोनों बच्चों के विवाह हो गये हैं । वे दोनों यहाँ से बहुत दूर समुद्र पार रहते हैं । मेरे पति पिछले वर्ष सरकारी नौकरी से रिटायर हो चुके हैं । 

एक सप्ताह पहले मुझे सूचना मिली कि दीपा बहुत बीमार है । मैं उसे देखने उसके घर गई । पता चला कि दीपा की माँ का पिछले वर्ष स्वर्गवास हो गया था । दीपा अपनी दो बड़ी बहनों के साथ रहती है । दीपा के पिता रेलवे में चपरासी हैं । रेलवे से मिले एक कमरे के क्वार्टर में ये चारों रहते हैं । दीपा मेरी कक्षा की होनहार छात्रा है । दीपा की बड़ी बहन ने मुझे बताया कि पिता को बहुत चिंता है । दीपा का बुखार नहीं उतर रहा है ।

 उसने घर की दूसरी कठिनाइयों के बारे में भी - बताया । दीपा से मिलकर मैं लौट आई । एक महीना बीत जाता है दीपा स्कूल नहीं आ पाई । मैं फिर उसके घर पहुंच गई । फिर वहा से पता  चला कि दीपा को अस्पताल में भर्ती किया जा चुका है । इस वक्त दीपा की बड़ी बहन कहीं छोटी सी कही नैकरी कर ली थी । दीपा की बीमारी  दिमागी बुखार बताया गया था । मैं भी उसे देखने अस्पताल पहुँच गयी  । 

दीपा ने कहा “ मैडम , अब मैं कभी स्कूल नहीं आऊँगी । मुझे पता है , मैं मरने वाली दीपा की बात सुनकर हमारा तो दिल पसीज गया रहा । मैंने जब डाक्टरो से पूछा तो उन्होंने बताया की दीपा को काफी दिमागी बुखार है कोई ऐसी शक्ति है जो इसे जीवित रखे हुए है । मैं दो दिन बाद दीपा से फिर मिलने गई तो मैंने कहा- तुम मेरी बेटी बनोगी मैं तुमको पढ़ाऊँगी और चाहो तो तुम्हें अपने घर ले चलूँगी तब दीपा चुप हो गई । उसने फिर एक डायरी दिखाई । जिसमे कुछ कविताएँ लिखी गई थीं 

आशा की कविताएँ । मैंने डायरी पढ़ी , तो दीपा को चूमे बिना न रह सकी । उसने अपनी कविताओं में आकाश की बुलंदियों को छूने की बातें लिखी थीं । मैं समझ गई , दीपा की यह रचना - शक्ति ही उसे जीवित रखे हुयी थी । मैंने दीपा के पिता से उसे अपनाने की बात की । पहले उन्होंने साफ मना कर दिया कि लोग इसे गलत समझेंगे । दीपा के पिता का कहना था कि लोग कहेंगे पिता अपनी बेटियों की देखभाल नहीं कर पाया । 

मैंने उन्हें समझा - बुझाकर मनाने का प्रयास किया , लेकिन वह न माने । आखिर मैंने उन्हें इस बात पर राजी कर लिया कि दीपा उनके पास ही रहेगी , लेकिन मैं उसे अपना लूँगी । उसका सारा खर्च मैं उठाऊँगी । दीपा के पिता ने जब यह बात दीपा को बताई , तो वह बहुत खुश हुई । धीरे - धीरे दीपा का बुखार उतर गया । कुछ दिन बाद वह स्कूल आने लगी । बुखार के कारण अब वह उतने अंक नहीं ले पाती थी । 

जब हमने उससे पूछा तब उसने जवाब दिया- की मैडम आपके कारण हम आज ज़िंदा हूँ । क्या इतना भी काफी नहीं  मुझे उसके बातो को सुनकर बड़ी खुशी हुई और हैरानी भी । हमें  दीपा का वह मुरझाया हुआ चेहरा याद आ जाता जब सभी डाक्टरों ने उसे जवाब दे डाला था । वही बात दीपा आज सोच रही है कि मैंने उसे अपनाकर नया जीवन दिया है । सच तो यह था कि जीवन उसके भीतर था - कविता के रूप में । बताया गया था की मुझे हमारे पापा एवं दीदी एक दिन दीपा ने मुझसे बताया था-पर उस पर बहुत दया आती थी । मुझे लगने लगा था की मुझे भी अपनी माँ के साथ मर जाना था । 

मैं खुदज को एक फालतू चीज समझती थी , लेकिन आपने मुझे सहारा दिया । अब मेरे दिमाग से सारा बोझ दूर हो गया है । धीरे - धीरे दीपा बिलकुल सामान्य हो गई । समय बीतता चला जा रहा । था हम  दीपा के लिए जितना कर सकते थे उतना किया करते थे। एक दिन ऐसा भी हुआ जब दीपा अचानक मेरे घर के अंदर आ गई और बोल पडी मैडम रानी आज से हम  आपकी सेवा में तत्त पर रहूँगी ।  रानी उससे पूछा- क्या तू मुझे माँ या फिर आंटी नहीं बोल सकती इस बात पर वह बोली हमारे पिता आपको मैडम रानी कहा करते हैं ।

वह कहते हैं कि तुम्हारी मैडम का दिल रानियों वाला है । इसलिए मैं आपको रानी आंटी या फिर रानी जी बोल सकती हूँ । दीपा अभी बारहवीं कक्षा की विद्यार्थी रहती है । अभी हम रिटायर हो गयी हूँ । अब वह खुद के पिता का घर बार छोड़कर मेरे साथ में रहने आ गई थी । वह बहुत जतन से हमारी सेवा  देखभाल करती है । समुद्र पार गए बेटों की कभी - कभार चिट्ठी आ जाती है । पिछले छह वर्षों में दोनों बेटे एक बार मिलने आए थे । पैसा नियमित भेज रहे हैं , हम तीनों का अच्छा गुजारा हो जाता है ।









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