चंदनदास संगीतकार थे । एक छोटी - सी रियासत कीरतपुर में रहते थे , पर उनकी प्रसिद्धि दूर - दूर तक फैली हुई थी । कीरतपुर के राजा ने चंदनदास को रहने के लिए बड़ी हवेली दे रखी थी । चंदनदास ने उसी में संगीत विद्यालय भी खोल लिया था । जंदनदास सारा दिन शिष्यों को गायन - वादन सिखाने में लगे रहते थे ।
जब राजा बुलाते तो दरबार में जा पहुँचते । शेष सारा समय संगीत की साधना में बीतता । रहन - सहन साधारण ही था । उन्होंने अपना जीवन संगीत को समर्पित कर दिया था । एक दिन की बात , बरसात का मौसम था । ठण्डी - ठण्डी हवा चल रही थी । हवेली के बड़े कक्ष में चंदनदास अपने तीन शिष्यों के साथ बैठे थे । चंदनदास और उनके तीनों शिष्य तन्मय होकर गा रहे थे ।
एकाएक चंदनदास का ध्यान भंग हुआ । उन्हें लगा जैसे किसी ने जोर से धक्का दिया हो । नेत्र खोलकर सामने देखा , तो दीवार हिलती नजर आई । फिर तो पूरा कक्ष डोल उठा । जमीन थरथराने लगी । अजीब डरावनी आवाज उठ रही थी । " बाहर भागो , भूकम्प ! चंदनदास बस इतना ही बोल पाते है । उसी वक्त कक्ष का फर्श फट जाते है दीवारें झुक कर गिरने लगते है । छत में से पत्थर के टुकड़े गिरने लगते है । सब जगह धूल ही धूल हो गई । कीरतपुर तथा आस - पास के क्षेत्र में भूकम्प आया था । अनेक भवन गिर गए थे । अनेक लोग घायल हुए थे ।
चंदनदास की हवेली पूरी तरह ढह गई थी । चंदनदास तथा उनके तीनों शिष्य हवेली के मलबे में दब गए थे । किसी ने राजा को खबर दी , तो वह स्वयं चंदनदास की हवेली पर पहुँचे । शानदार हवेली एक डरावने खंडहर में बदल गई थी । राजा का आदेश था , चंदनदास की हवेली का मलबा हटाने का काम तेजी से शुरू हुआ । तभी धरती फिर डोल उठी ।
भूकंप का एक नया झटका कीरतपुर को हिला गया । फिर तेज बारिश शुरू हो गई । कीरतपुर की जनता बुरी तरह डर गई । बहुत सारे लोग तो पहले ही नगर छोड़कर चले गए थे । दूसरे भूकंप के बाद बचे - खुचे लोग भी भागने लगे । मलबे में दबे चंदनदास को होश आया , तो वह टटोलते हुए उठने लगे । सब तरफ घुप्प अंधेरा था ।
वह एक - एक करके शिष्यों को पुकारते लगे- " अजय , दीपक , राजसिंह , कहाँ हो तुम ? कुछ पल सन्नाटा रहा , फिर उन्हें सुनाई दिया- " गुरुदेव , हम तीनों जीवित हैं । अँधेरे के कारण कुछ दिखाई नहीं दे रहा है । खड़े होने का प्रयास करते हैं , तो सिर पत्थरों से टकराता है । " " ईश्वर को धन्यवाद है । " - चंदनदास ने प्रसन्न स्वर में कहा " हम लोग मलबे के नीचे दबे हुए हैं । घबराना मत , शायद मलबा हटाया जा रहा होगा । हम जल्दी ही बाहर आ जायेंगे ।
तभी उनके शिष्य अजय की आवाज आई- " गुरुदेव , दीपक की तबीयत खराब हो रही है । वह बोल नहीं रहा है । जोर - जोर से साँस ले रहा है । " चंदनदास मन ही मन प्रार्थना करने लगे - ' ईश्वर मेरे शिष्य की रक्षा करो । बचा लो उसे । चाहे मेरे प्राण ले लो । ' एकाएक थोड़ी दूर पर एक चमक दिखाई दी , जो तेज होती जा रही थी । चंदनदास उसी तरफ टकटकी लगाए देखते रहे । उन्होंने देखा कि वे चारों मलबे के नीचे फँसे हैं , सामने ही दीपक बेहोश पड़ा दिखाई दिया ।
यह प्रकाश कैसा है ? चंदनदास के होठों से निकला । फिर उन्हें कहीं से पानी की टप - टप सुनाई दी । तभी एक आवाज आई- “ चंदनदास , तुम्हारा शिष्य घबराहट के कारण बेहोश हो गया है । लेकिन तुम मत घबराना । पानी की जो बूँद टपक रही हैं , उन्हें इसके मुँह में डाल दो । " " लेकिन आप हैं कौन ? यह प्रकाश कैसा है ? " - चंदनदास ने डरे स्वर में पूछा । - " पहले अपने शिष्य के प्राण बचाओ । बाकी सब बाद में पूछना । " चंदनदास ने देखा , जहाँ से प्रकाश आ रहा था वहीं से पानी की बूँदें टपक रही थीं ।
अब अधिक सोच - विचार का समय नहीं था । चंदनदास ने बूँदों के नीचे अपनी हथेली फैला दी । कुछ पानी इकट्ठा हुआ तो उसे दीपक के मुँह में डाल दिया । ऐसा उन्होंने कई बार किया । यह करते हुए वह लगातार सोच रहे थे - ' यह प्रकाश कहाँ से आ रहा है ? और पानी की बूँदें ... कहीं कुछ गड़बड़ न हो । ' पर ज्यादा सोचना नहीं पड़ा । कुछ पल बाद दीपक का शरीर काँपा और उसने आँखें खोल दीं ।
चंदनदास की आँखों में आँसू बहने लगे । उनके काँपते होठों से निकला- " आप कौन हैं ? आपने दीपक के प्राण बचाए हैं । कृपा करके अब तो बताइए ? " कुछ देर के मौन के बाद फिर आवाज आई- " अभी उसका समय नहीं आया है । ईश्वर का भजन करो , उसे धन्यवाद दो । इतना ही बहुत है ।
चंदनदास ने फिर कुछ नहीं पूछा । उन्होंने शिष्यों को इशारा किया और भजन गाने लगे । तीनों शिष्यों ने भी उनका साथ दिया । धरती के अन्दर उनका स्वर गूंजने लगा । चारों तन्मय होकर भजन गाते रहे । ऊपर बारिश थम गई थी । गिरी इमारतों का मलबा हटाने का काम शुरू कर दिया गया था । हवेली का मलबा हटाते मजदूरों के कानों से गाने की आवाज टकराईं , तो वे चौंक उठे । ' शायद नीचे कुछ लोग अभी जिंदा हैं । ' उन्होंने आपस में कहा । और मलबा तेजी से हटाने लगे । गाने की आवाज अब और भी तेज हो गई थी । कुछ देर बाद चंदनदास और उनके तीनों शिष्य सही - सलामत बाहर निकाल लिए गए ।
चंदनदास ने देखा , सूरज डूब रहा था । दूर दूर तक टूटी - फूटी इमारतें नजर आ रही थीं । यह दृश्य देखकर चंदनदास का मन काँप गया । वह सिर थामकर वहीं बैठ गए । तब तक राजा को भी चंदनदास के जीवित होने का समाचार मिल गया था । उन्होंने उन्हें बुलाने के लिए सैनिक भेज दिए । सैनिक आए तो चंदनदास ने कहलवा दिया- " अभी नहीं , बाद में आऊँगा । " वह अपने शिष्यों के साथ वहीं खुले में बैठकर भजन गाने लगे । उसी समय जैसे जमीन के नीचे गा रहे थे । मन ही मन दोहरा रहे थे- ' हम लोगों की जीवन रक्षा करने वाले आप कौन हैं
मैं आपके दर्शन करना चाहता हुए अंधेरा हो गया , बारिश फिर होने लगी । आस - पास खड़े लोग एक - एक करके चले गए , पर चंदनदास अपनी जगह से न हिले । वह मन ही मन प्रार्थना दोहरा रहे थे । एकाएक अँधेरे में प्रकाश फूटा । हवेली का खंडहर जगमगा उठा । आवाज आई- " चंदनदास , मैं मणिधर हूँ । तुम्हारी हवेली के नीचे एक हजार वर्षों से रह रहा हूँ । अगर भूकंप न आता , तो शायद तुम लोग मेरे निकट कभी न आ पाते
मुझे देखने की जिद न करो । मैं तुम्हें अमूल्य हीरे - मोती देता हूँ । हवेली के नीचे धरती में अकूत धन गड़ा हुआ है । " इसके बाद उस प्रकाश में अनेक रंग के हीरे - मोती उछलते दिखाई दिये । चंदनदास अपने स्थान पर अचल बैठे रहे । उन्होंने बताया की मुझे ख़ास अमूल्य रत्न आपसे मिल चुका है । हमारे और मेरे तीनों शिष्यों के जान आपने बचा लिए हैं । अब और कुछ हमको नहीं चाहिए । मैं आपको बारम्बार धन्यवाद देता हूँ । यह कहकर उन्होंने दोनों हाथ जोड़कर आँखें बंद कर लीं ।
अजय , दीपक और राजसिंह भी उस अद्भुत प्रकाश में उछलते हीरे - मोती देख रहे थे । दीपक ने अजय से कहा- “ चुप रहो । गुरुजी को चाहे धन की आवश्यकता न हो , पर हमें है । आओ , हम अंदर चलकर खजाना निकाल लें । " और फिर दीपक उस गड्ढे में कूद पड़ा , जहाँ से कुछ देर पहले वह बाहर आया था । एकाएक जोर से गड़गड़ाहट हुई । धरती काँप उठी । भूकम्प ने तीसरी बार झटका दिया था कीरतपुर को । धरती फट गई । चंदनदास डरी - डरी आँखों से देखते रह गए । उनके दोनों शिष्य मूर्तिवत खड़े थे । दीपक के गड्ढे में गिरते ही फटी हुई धरती जुड़ गई थी । " दीपक , यह तूने क्या किया ! चंदनदास के होठ से निकला किन्तु अब कुछ शेष नहीं बचा था । विचित्र रोशनी उछलते हुए हीरे - मोती एक साथ में सबके सब गायब होने लगे ।