बहुत पुरानी बात है । एक गांव में एक गरीब ब्राह्मण रहता था । वह इतना गरीब था कि अपनी बीबी और बच्चों के लिए दो जून लिए भी खाना नहीं जुटा पाता था । अगर उसे कोई काम मिल जाता तो उसकी गरीबी कुछ पल के लिए दूर हो सकती थी । मगर लाख कोशिश करने के बाद भी उसको कोई भी काम नहीं मिल रहा था ।
आखिरकार एक दिन उसने सोचा । मुझे इस गांव में कोई अच्छा काम नहीं मिलेगा । अगर मैं शहर चला जाऊँ तो शायद मुझे कोई काम मिल जाएगा । लेकिन मेरी बीबी और बच्चे मेरे शहर जाने में रोड़ा अटका देंगे । क्यों न मैं उन्हें सोते छोड़कर घर से निकल जाऊँ ? और एक ओर चल दिया जरूरत का सामान सब लेकर । चलते चलते वह एक जंगल में पहुंच गया ।
जंगल में भटकते-भटकते प्यास से उसका बुरा हालत हो गया । था उसे लग रहा था की अगर मुझे शीघ्र ही पानी नहीं मिल पाया तो प्यास से ब्याकुल इस जंगल एरिया में ही हमारे प्राण निकल जायेंगे । इस नाते उसने जाना की मुझे पानी की तलाश स्वयं ही करनी होगी । परन्तु काफी तलाश करने के बाद उसको एक कुआं दिखाई दिया ।
वह कुएं के पास गया और अन्दर झांककर देखा । अरे ! शेर , बन्दर , सांप और आदमी ये चारों इस कुएं में कैसे गिर पड़े हुए है ब्राह्मण पर नजर पड़ते ही शेर बोला । ओ भूखे आदमी । कृपाकर मुझे इस कुएं से बाहर खींच लो । उसने कहा अगर मैंने तुम्हें बाहर निकाल दिया तो क्या तुग मुझे मारकर खा नहीं जाओगे ? भले आदमी ! तुम मुझसे बेकारण ही डर रहे हो । मैं खुद मुसीबत का मारा हुआ हूँ ।
मैं तुम्हें भला क्यों नुकसान पहुँचाऊँगा ? शेर के विश्वास दिलाने पर । वह क्यों न इस शेर को कुएं से बाहर खींच लेता । परोपकार करना ही तो पुण्य का काम है । ब्राह्मण को सोच में पड़े देखकर शेर ने बोला । मुझ पर दया करो बन्धु ! मैं तुमसे वादा करता हूँ कि मैं तुम्हें किसी भी तरह का नुकसान नहीं पहुँचाऊँगा । ठीक है भाई ! मैं तुम्हें अभी कुएं से बाहर खींचता हूँ ।
अन्ततः ब्राह्मण शेर को बाहर निकालने को तैयार हो गया । फिर ब्राह्मण ने झोले से एक रस्सी निकाली और उसे कुएं में डाल शेर को बाहर खींच कर निकाल लिया । शेर ने कहा की मैं तुम्हारा वह उपकार कभी नहीं भूल पाऊंगा भले हम लोग पहाड़ी के उस पार रहते है। अगर तुम्हे कभी मुझसे मिलने जरूरत हो तो मुझे खुशी होगी । हो सकता है , मैं तुम्हारे कभी किसी काम आ पाउ ठीक है , अगर मुझे अवसर मिला तो मैं तुम्हारे घर अवश्य आऊँगा
वनराज उसी समय कुएं के अन्दर से बन्दर की आवाज आई । ओ भले आदमी ! मुझे भी कुएं से बाहर खींच लो । मुझ पर भी तुम्हारा बहुत बड़ा उपकार होगा । और ! मै तुम्हारी मदद भी अवश्य करूँगा भाई । और ब्राह्मण ने पुनः कुएं में रस्सी डाल दी । बन्दर रस्सी के सहारे कुएँ से बाहर आ गया ।
कुएं से बाहर आने के बाद बन्दर बोला - धन्यवाद भले आदमी ! मुझ पर तुम्हारा यह बहुत बड़ा एहसान इसमें एहसान की क्या बात है ? मुसीबत के मारों की मदद करना ही इंसान का फर्ज है । फिर मैं तो ब्राह्मण हूँ । तुम बहुत अच्छे हो ब्राह्मण देवता । वो जो पहाड़ी दिखाई दे रही है न ठीक उसके पीछे मेरा घर है । कभी जरूरत पड़े तो आप मेरे घर अवश्य पधारना । ठीक है ! कभी तुम्हारी जरूरत पड़ी तो मैं अवश्य आऊंगा बन्धु ।
तभी कुएं के अन्दर से सांप की आवाज सुनाई पड़ी । कृपाकर मुझे भी बचा लो ब्राह्मण देवता । तुम्हें तो , ना बाबा ना । तुम तो सांप हो । कहीं मुझे काट खा गए तो । साप ने बोला क्या कोई अपने मददगार को काट सकता है बन्धु ? ब्राह्मण कहा लेकिन मैं तुम पर यकीन नहीं कर सकता ।
फिर साप ने अपनी बूझी हुयी आभास से बोला मुझ पर यकीन करके तो देखो ब्राह्मण देवता । मैं आपको नहीं काटूंगा । हम पक्का वायदा करते है ? हाँ ब्राह्मण देवता । मैं तुम्हें नहीं काटूंगा । मेहरवानी करके हमें इस कुएं से बाहर खींच लो । तब जाकर ब्राह्मण बोला ठीक है । मैं तुम्हें अभी कुएं से बाहर खींचता हूँ ।
फिर ब्राह्मण कुएं में रस्सी डालकर सांप को भी कुएं से बाहर खींचने लगा । कुएं से बाहर आ सांप बोला । इस मेहरबानी के लिए धन्यवाद बन्धु + अगर तुम्हें कभी किसी मुसीबत का सामना करना पड़े तो मुझे पुकारना तुम जहाँ भी होंगे मैं चला आऊँगा । ओह ! ठीक है । ऐसा मौका आया तो मैं तुम्हें जरूर याद करूँगा । तभी कुएं के अन्दर से आदमी की याचना सुन ब्राह्मण कुएं में रस्सी डालने को हुआ तो शेर बोला । इस आदमी की जरा भी सहायता न करना भले आदमी । तुम्हारी बिरादरी का है , लेकिन बुरा आदमी है ।
बन्दर भी शेर की बात का समर्थन करते हुए बोला । सहायता करोगे तो खुद को बहुत बड़ी मुसीबत में फंसा लोगे । सांप ने भी दलील दी । यह बड़ा कृतघ्न आदमी है । जो उसकी मदद करेगा , उसी की जड़ काटेगा । ओह ! समझ में नहीं आता क्या करूँ । लेकिन शेर , बन्दर और सांप के विदा ले जाने के बाद । कृपाकर मेरी मदद करो बन्धु ! तुमने शेर , बन्दर और सांप की जान बचाई है । मेरे भी प्राण बचाओ । तुम्हारी बिरादरी का हूँ । माफ करना , तुम अच्छे आदमी नहीं हो । तुम्हारी कोई मदद नहीं करूँगा ।
उन जानवरों की बातों में न आओ बन्धु और मेरी मदद करो । मैं तुम्हारी मदद कदापि नहीं करूँगा । वह आदमी बहुत चिल्लाया , रोया और गिड़गिड़ाया तो ब्राह्मण को उस पर दया आ गई । उसने कुएं से उसे भी बाहर खींच लिया । बहुत - बहुत धन्यवाद बन्धु । तुमने मुझपर जो उपकार किया है , उसे में सात जन्मों तक भी नहीं भूलूंगा । इसमें उपकार जैसी कोई बात नहीं भद्र । इंसान ही इंसान के काम आता है । लेकिन तुम हो कौन ? तब वह आदमी ब्राह्मण को अपना परिचय देते हुए बोला । मैं एक गरीब सुनार हूँ । पास ही के शहर रतन नगर में रहता हूँ ।
कभी मेरे योग्य सेवा हो तो मेरे घर अवश्य पधारना । ठीक है । फिर सुनार से भी विदा ले एक दिशा में चल दिया । उस आदमी के जाने के बाद ब्राह्मण ने झोले से लोटा निकाला और कुएं से पानी खींचकर पानी पिया और अपनी राह पर चल पड़ा । फिर काफी देर तक चलने के बाद एक नगर में पहुंच गया । में शहर तो पहुंच गया अब मुझे नौकरी की तलाश शुरू कर देनी चाहिए ।
फिर वह एक सेठ की दुकान पर पहुंचा और उससे बिनती की क्या आप मुझे कोई काम दे सकते हैं सेठ जी ? मै पूरी मेहनत और ईमानदारी के साथ काम करूंगा । माफ करना ! मेरे पास कोई खाली जगह नहीं । कोई दूसरा दरवाजा देखो | ब्राह्मण निराश हो वहां से लौट गया ।
उसके बाद ब्राह्मण ने नौकरी के लिए दौड़ - धूप की , लेकिन उसकी तकदीर ने उसका साथ नहीं दिया । अब में अपने बीबी बच्चों के सामने क्या मुंह लेके जाऊंगा ? मुझ जैसे बदनसीव को आत्म हत्या कर लेनी चाहिए । इस तरह हताश होकर ब्राह्मण आत्महत्या करने को सोचने लगा । लेकिन तभी उसे शेर , बन्दर , सांप व सुनार के वचनों की याद आई और उसने सोचा क्यों न एक बार उन्हें भी आजमाकर देख लिया जाए ।
शायद वे ही मुझ गरीब की कुछ मदद कर दे । अतः वह आत्महत्या का विचार त्यागकर सबसे पहले बन्दर के पास पहुँचा । बन्दर ने दिल खोलकर उसका स्वागत किया । ब्राह्मण ने पेट भर भोजन करने के बाद विदा मांगी तो बन्दर बोला . आप कभी भी मेरे घर चले आना ब्राह्मण देव । यहाँ हमेंशा आपका ' स्वागत होगा । धन्यवाद बन्धु ! तब ब्राह्मण बन्दर से बोला । मैं वनराज से मिलना चाहता हूँ । क्या तुम मुझे सीधी राह बता सकते हो ? हां ! क्यों नहीं ! तुम पहाड़ी के नीचे चले जाओ । पहाड़ी के पार तुम्हें सबसे पहले वनराज की गुफा मिलेगी ।
अच्छा बन्धु ! अब मुझे चलने की इजाजत दो । भगवान आपकी यात्रा सफल करे ब्राह्मण देवता । फिर ब्राह्मण बन्दर के कथनानुसार शेर की गुफा की ओर चल पड़ा । जब ब्राह्मण शेर के पास पहुँचा तो शेर खुशी से उसका स्वागत करते हुए बोला । तुम्हें देखकर मुझे बहुत खुशी हुई मित्र । बोलो , मैं तुम्हारी क्या सेवा करूं । मैं बहुत गरीब हूँ मित्र । - फिर ब्राह्मण अपनी व्यथा सुनाकर बोला- अगर मुझे कहीं से कुछ धन मिल जाये तो अपने घर लौट जाऊँ । वरना मेरे लिए खुदकुशी करने के सिवा कोई रास्ता न रह जायेगा । इतने निराश न होऔं मित्र तुम यहीं ठहरो । मैं अभी आता हूँ ।
इतना कहकर शेर अपनी गुफा में चला गया । जब शेर गुफा से बाहर निकला तो उसके मुंह में सोने का सुन्दर रत्न जड़ित हार दबा थी । हार ब्राह्मण के सामने रखते हुए शेर बोला । लो मित्र ! इस हार को बेचकर तुम्हें अच्छे दाम मिल जायेंगे ।
तुम्हारी सारी गरीबी दूर हो जायेगी । धन्यवाद बन्धु ! सचमुच तुमने अपना वचन निभाया है । इतना कह ब्राह्मण ने हार उठाया । शेर से विदा ली और रतन नगर की और लौट पड़ा । वापस लौटते हुए ब्राह्मण का मन खुशी से फूला न समा रहा था । आखिरकार मेरी यात्रा सफल हो गई । इस हार को अच्छे दामों में बेचकर घर लौट जाऊंगा मुझे वापस घर आया देख मेरी बीबी और बच्चे बहुत खुश होंगे । हार की बिक्री से खूब धन मिलेगा । ' से अब हम सुख से दिन बितायेंगे ।
ब्राह्मण सोचता हुआ चला जा रहा था । तभी इस हार को कहां बेचा जाए ताकि मुझे इसकी अच्छी कीमत मिल सके । इसी विचार के दिमाग में आते ही ब्राह्मण सोच में पड़ गया । अचानक उसे सुनार की याद आई । उसने सोचा - मैंने सुनार की जान बचाई थी ।
वह इस मामले में मेरी सहायता अवश्य करेगा । रतन नगर पहुँचते में सुनार से मिलूँगा और ब्राह्मण ने मन ही मन सुनार की मदद लेने का निश्चय कर लिया , और रतन नगर पहुंचते ही वह सीधा सुनार के पास पहुंच गया । आओ मित्र ! तुम्हें देखकर दिल बाग - बाग हो गया है । कहो बन्धु कैसे आना हुआ । में तुम्हारे पास एक जरूरी काम से आया हूँ । कहो , अगर मैं तुम्हारे किसी काम आ सका तो अपने को धन्य समझूँगा ।
मेरे पास एक हार है , मैं चाहता हूँ कि तुम उसे अच्छे दामों पर बिकवा दो । इतना कह ब्राह्मण ने अपनी जेब से हार निकालकर सुनार के हाथ में थमा दिया । हार देख ...... ओह ! यह हार इस ब्राह्मण के पास कहाँ से आया । यह हार तो राजकुमार का है , जो शिकार पर जाने के बाद आज तक वापिस नहीं लौटा । सोचते हुए सुनार ने मन में महाराज द्वारा घोषित इनाम का लोभ जाग उठा ।
अगले ही पल वह अपनत्व जताता हुआ बोला इसमें कष्ट की क्या बात है । मैं तुम्हारी सहायता अवश्य करूंगा । धन्यवाद बन्धु ! लेकिन इस बारे में मैं किसी अच्छे जौहरी से राय लेना उचित समझता हूँ ताकि तुम्हें अच्छे दाम मिल सकें । कहकर सुनार ने हार अपनी जेब में रख लिया फिर बाहर जाने के लिए तैयार होकर बोला - तुम कुछ देर यहीं आराम करो बन्धु ! मै जौहरी से सलाह लेकर अभी आता हूँ । ठीक है मित्र में यहीं बैठता हूँ ।
फिर सुनार अपनी पत्नी को बुलाकर बोला- ब्राह्मण देवता हमारे मेहमान हैं । तुम इन्हें भोजन कराओ । मैं जरा बाहर होकर आता हूँ । जैसी आपकी आज्ञा स्वामी । उसके बाद सुनार घर से निकलकर सीधा राजदरबार में जा पहुँचा । प्रणाम महाराज ! मैं आपसे एक विशेष काम से मिलने आया हूँ । तब सुनार राजा को हार सौंपते हुए बोला - यह वही हार है महाराज , जिसे राजकुमार के लिए स्वयं मैने बनाया था ।
एक आदमी बेचने की नीयत से इसे मेरे पास लाया है । क्या ? महाराज ! मैं उस आदमी को अपने घर बिठाकर आया हूँ । राजा बोले कौन है वह शैतान , जिसने मेरे बेटे की हत्या कर उसका यह हार छीना है ? वह एक गरीब ब्राह्मण है महाराज अभी तक वह मेरे घर में बैठा है ।
राजा ने गुस्से से पागल हो सेनापति को आदेश दिया । इस सुनार के घर में जो आदमी है , उसे इसी वक्त गिरफ्तार कर हमारे सामने पेश किया जाए । जैसी आपकी आज्ञा महाराज । सेनापति ने तुरन्त कुछ सैनिक सुनार के घर भेज दिये । सैनिक ब्राह्मण को पकड़कर दरबार में ले आए । ब्राह्मण को देखते ही राजा ने आदेश दिया । यह दरिन्दा हमारे राजकुमार का कातिल है सेनापति । इसे कारावास में डाल दिया जाए ।
जो आज्ञा महाराज ! फिर सैनिकों ने ब्राह्मण को ले जाकर कारावास में डाल दिया । -जब सैनिक जाने लगे तो ब्राह्मण कातर स्वर में बोल पड़ा। आखिर मुझे राजकुमार का कातिल क्यों ठहराया जा रहा है । मैं निर्दोष हूँ । अगर तुमने राजकुमार की हत्या नहीं की तो राजकुमार का हार तुम्हारे पास कैसे आया ? जिस सुनार को तुम हार बेचना चाहते थे , वह हार उसी सुनार ने राजकुमार के लिए बनाया था ।
इसलिए तुम पकड़ में आ गए । अब तुम बच नहीं सकते । राजा तुम्हें मौत की सजा देंगे । यह कहकर सैनिक वहां से चले गए । सैनिकों के जाने के बाद । सुनार ने तो मुझे बहुत बड़ी मुश्किल में फंसा दिया है । अब मैं क्या करूँ ? इस नगर में तो मेरा कोई मददगार भी नहीं है । हे प्रभु मेरी रक्षा करो । अगर मुझे फांसी हो गई तो मेरे बीबी - बच्चों का क्या हाल होगा ।
तभी अचानक ब्राह्मण को सांप के बचन का ख्याल आया । अगले ही पल सांप को याद किया और सांप उसके सामने प्रकट हो गया । कहो मित्र ! मुझे कैसे याद किया ? में बहुत बड़ी मुसीबत में फंस गया हूँ राजा ने मुझे जबर्दस्ती जेल में ठूंस दिया है और एक ऐसे अपराध की सजा देने वाले हैं जो मैंने किया ही नहीं है ।
ओह ! लेकिन ऐसा क्यों ? तब ब्राह्मण ने शेर से हार प्राप्त करने से लेकर गिरफ्तार होने तक का सारा किस्सा सांप को सुना डाला और करुण स्वर में बोला । मुझे बचा लो बन्धु ! तुमने मुझसे कहा था कि मुसीबत के समय तुम मेरे काम आओगे । मेरी जान का सवाल है । मेरे लिए इससे बड़ी मुसीबत और क्या होगी ? मुझे कुछ सोचने दो मित्र ! जो सोचना हो शीघ्र सोचो और मुझे इस जेल से छुटकारा दिलाओ ।
मुझे एक उपाय सूझा है मित्र , मैं चुपके से महारानी के कमरे में जाकर उसे काट लेता हूँ । इससे क्या होगा ? मेरे जहर से महारानी बेहोश हो जाएगी । फिर चाहे कोई कितना ही प्रयत्न कर ले वह होश में नहीं आएगी । फिर क्या होगा ? उसके होश में न आने से मैं तो नहीं बच जाऊंगा । पहले मेरी बात पूरी सुनो । मेरे जहर का असर तब तक रहेगा , जब तक तुम अपने हाथ से उसके माथे को नहीं छुओगे । और ! तुम जैसे ही महारानी का माथा छुओगे , वह होश में आ जाएगी और राजा खुश होकर तुम्हें छोड़ देगा । अगर ऐसा नहीं हुआ तो ? राजा अपनी महारानी से बहुत प्यार करता है । वह उसे जिन्दा रखने के लिए कुछ भी कर सकता है ।
फिर सांप जेल की कोठरी से निकल महारानी के कक्ष में पहुँच गया और अगले ही पल रानी को काट डाला । रानी तुरन्त उठ बैठी और चिल्ला उठी । उई माँ ! मुझे सांप ने काट लिया और सांप खिड़की के रास्ते से होता हुआ चला गया । महारानी की चीख सुनकर कई सेविकाएँ दौड़ती हुई उनके शरण कक्ष में आ पहुँची । क्या हुआ महारानी जी ? मुझे सांप ने काट लिया है ? इतना कहने के साथ ही महारानी बेहोश हो गई ।
महारानी को बेहोश होते देखी । हमें तुरन्त महाराज को खबर करनी चाहिए । तब तीसरी सेविका पहली सेविका से बोली । तुम जाओ चन्दा । हम महारानी के पास ही हैं । इतना कह चन्दा दौड़ती हुई बाहर चली गई । कुछ ही क्षणों बाद चन्दा महाराज के कक्ष में पहुंची ।
गजब हो गया महाराज ! महारानी को जहरीले सांप ने काट लिया है । और महारानी जी बेहोश हो गई हैं । जल्दी ही उनके उपचार की व्यवस्था कीजिए महाराज | राजा ने तुरन्त एक सेवक को बुलाकर महामंत्री और सेनापति को आदेश दिया और फिर स्वयं चन्दा के साथ महारानी के कक्ष की ओर चल दिए । महारानी के कक्ष में पहुंचते ही राजा व्याकुल हो उठे । हे भगवान ! महारानी को क्या हो गया ?
हम महारानी की चीख सुनकर अन्दर आए तो महारानी सिर्फ इतना ही कह पाई कि उन्हें सांप ने काटा है और फिर महारानी बेहोश हो गई और मैं आपको खबर देने चली आई लगता है जहर का असर दिख रहा है । महारानी का जिस्म नीला पड़ता जा रहा है । सेविकाओं की बात सुन राजा गम्भीर स्वर में बोले । नहीं नहीं ! अगर महारानी को कुछ हो गया तो हम भी जीवित नहीं रहूंगा। होश में आओ महारानी ! आँखें खोलो । आँखों खोलो प्रिये ! ठीक उसी समय महामंत्री और सेनापति राजवैद्य को लेकर वहां पहुंच गए । वैद्यराज तुरन्त महारानी का निरीक्षण करने लगे । क्या महारानी ठीक हो जाएगी वैद्यराज जी ? अभी कुछ भी नहीं कहा जा सकता महाराज ! मैं कोशिश कर रहा हूँ । आप शीघ्र ही महारानी की बेहोशी दूर करें वैद्यराज जी । हम आपको मुंह मांगा इनाम दे देंगे ।
जी महाराज ! फिर वैद्यराज ने महारानी को कई तरह की औषधियां दीं , लेकिन उनकी बेहोशी नहीं टूटी । तब वैद्यराज ने निराश होकर कहा- महारानी जी का उपचार मुझसे संभव नहीं हो सकेगा । महाराज जिस सांप ने इन्हें काटा है वह बहुत ही जहरीला है । मेरी कोई औषधि काम नहीं कर पा रही है । - आह ! तब वैद्यराज ने राजा को दिलासा देते हुए कहा - निराश न होइये महाराज ! अभी वक्त है । आप किसी अन्य वैद्य हकीम को बुलवा लें ।
शायद उसके पास अधिक तेज और बढ़िया औषधि हो । अगले ही पल महाराज ने महामंत्री को आदेश दिया - महामंत्री जी ! फौरन एक एलान करवा दीजिए । जो भी महारानी का उपचार कर उन्हें होश में लायेगा । उसे मुंहमांगा इनाम दिया जायेगा । जो आज्ञा महाराज ! महाराज से आज्ञा ले महामंत्री फौरन बाहर चले गए । राजा के आदेश का एलान होते ही देश - विदेश के वैद्य हकिम आए । महारानी को तरह - तरह की औषधियां दी गई , लेकिन कोई लाभ नहीं हुआ ।
महारानी की बेहोशी पूर्ववत बनी रही । हमलोग महारानी का उपचार करने में असमर्थ हैं राजन ! सभी तरह की औषधियां देकर हार चुके हैं । अब तो भगवान ही महारानी जी का मालिक है । वैद्य - हकीमों का निराशपूर्ण उत्तर सुन राजा का दिल टूट गया । वे मन - ही - मन गम में घुलने लगे । हे भगवान ! महारानी पर यह कैसी बेहोशी छाई है । उधर जेल की कोठरी में कैद ब्राह्मण ने राजा का एलान सुना तो उसने पहरेदार से कहा- मुझे महाराज के पास ले चलो । मैं महारानी जी की बेहोशी दूर कर सकता हूँ ।
जब अच्छे - अच्छे वैद्य - हकीम भी उनकी बेहोशी दूर नहीं कर सके तो तुम एक हत्यारे होकर उनकी बेहोशी क्या दूर करोगे ? ब्राह्मण ने विनती की - आप एक बार मुझे महाराज के पास ले चलो । मैं अपने कथन को सत्य सिद्ध कर दिखा दूँगा । ले चलने में क्या हर्ज है ? इसे भी अपनी किस्मत आजमा लेने दो । ऐसा सोचकर पहरेदार बोला- ठीक है ।
मैं पहले महाराज से पूछ लूँगा । जैसी तुम्हारी इच्छा । तब पहरेदार राजा के पास आकर बोला - महाराज की जय हो ! जेल में कैद ब्राह्मण - महारानी जी की बेहोशी दूर करने का दावा कर रहा है । अगर आपकी इजाजत हो तो उसे यहां ले आऊं महाराज | उसे शीघ्र लेकर आओ पहरेदार । पहरेदार तुरन्त वापस लौट गया ।
फिर कुछ समय पश्चात् पहरेदार ने ब्राह्मण को राजा के सामने पेश कर दिया । तुम ? प्रणाम महाराज ! मेरी विनती है कि मुझे महारानी जी की बेहोशी दूर करने का अवसर दिया जाय । तुम्हें अवसर अवश्य दिया जायेगा ब्राह्मण परन्तु यदि तुम महारानी को होश में न ला सके तो हम तत्काल ही तुम्हारा सिर धड़ से अलग कर देंगे ।
मुझे मंजूर है महाराज ! ब्राह्मण के विश्वास दिलाने पर , तो फिर आओ मेरे साथ । चलिए महाराज ! फिर राजा ब्राह्मण को महारानी के शयन - कक्ष में ले गए । ब्राह्मण ने आहिस्ता से अपना हाथ महारानी के माथे पर रख दिया । अगले ही पल महारानी बिस्तर पर उठ बैठी । उनके वदन का नीलापन गायब हो गया तथा चेहरा पहले की तरह दमकने लगा । वह चकित स्वर में बोली - महाराज ! आप मुझे तो सांप ने काट लिया था फिर मैं जीवित कैसे हूँ । -
महारानी आप इस ब्राह्मण की कृपा से जीवित हुई हैं । फिर महाराज ने रानी के जीवित होने की खुशी में ब्राह्मण को क्षमा कर दिया और उससे उसकी असलियत पूछी । ब्राह्मण ने सभी बातें स्पष्ट रूप से बता दी । राजा ने ब्राह्मण को पुरस्कार देकर अपने यहाँ से विदा किया और उस सुनार को कैद में डलवा दिया ।