एक कुत्ता किसी घर में घुसा और वहां आधी रोटी पा गया । बस वह उसे मुंह में दबाकर घर से बाहर निकला और तेजी से नदी की ओर भागा । इस विचार से कि नदी के उस पार पहुंचूँगा तो आराम से किसी झाड़ी में बैठूंगा और स्वाद ले - लेकर यह आधी रोटी खाऊंगा । कुत्ता भागते - भागते नदी के किनारे पहुँचा , फिर नदी में घुसा और उसे जल्दी - जल्दी पार करने लगा ।
अचानक उसने नदी के साफ पानी में अपनी परछाई देखी । अपनी परछाई के मुंह में आधी रोटी दबी देखी । बस , उसने लोभ किया । उसके आनन्द की सीमा न रही । उसको समझ में एक ही बात आई । पानी के भीतर कोई दूसरा कुत्ता मुंह में आधी रोटी दबाए चला जा रहा है ।
यदि मैं उस पर हमला कर दूँ और उससे यह आधी रोटी छीन लूं कितने मजे में रहूँगा । आधी रोटी के बदले एक पूरी पा जाऊँ , फिर वह रोटी खूब मजे ले - लेकर चबाऊँ खाऊँगा । उसमें यह विचार आते ही कुत्ता अपनी परछाई पर झपट पड़ा और आँखें निकालकर गुर्रा उठा - भौं भौं ... भौं … ... । परन्तु यह क्या ? कुत्ते ने गुर्राने के लिए ज्योंहि अपना मुंह खोला , त्यों ही वह आधी रोटी भी उसके दाँतों की पकड़ से छूटकर नदी के पानी में जा गिरी और गिरते ही रोटी धारा में न जाने कहाँ गायब हो गयी ।
कुत्ता मुंह बाये कुछ देर तक घाट में बहती हुई रोटी को देखता रहा । फिर ठंडी सांस लेते - लेते बोला - बुरा हो इस लोभ का । इसके फंदे में क्या फंसा , अच्छा भला घाटा के रास्ते उतर गया । आधीरोटी बढ़ाकर एक रोटी कर नहीं सका , उल्टे उससे भी हाथ धो बैठा । सच है जो निश्चित को छोड़कर अनिश्चित को पाने की आशा में दौड़ता है , वह अनिश्चित तो पाता ही नहीं निश्चित भी खोकर गंवा दिया करता है । किसी ने क्या खूब कहा था - आधी को छोड़ चले पूरी को पाने , आधी मिली न सकी पूरी पावे -