विभीषण की बेटी बनी सीता | Sita became Vibhishana's daughter

 सीता अयोध्यापति श्रीराम की पत्नी सीता को रावण चुरा ले गया । श्रीराम के दुख की सीमा न रही । वे ' हाय सीता कहाँ हो तुम ? ' कहते हुए अधीर होकर मूर्छित हो गये । लक्ष्मण ने इनकी मूर्छा तोड़ी और सेवक हनुमान ने सांत्वना दी कि मैं सीता मैया की खोज करता हूँ । 

हनुमान श्रीराम के सच्चे भक्त थे । इन्होंने अथक प्रयास करके पता लगा ही लिया कि सीताजी लंका के राजा रावण के कब्जे में है किन्तु लंका तक पहुँचना कोई हँसी - खेल न था । इस नगरी का निर्माण स्वयं शिव ने करवाया था और रावण को सब प्रकार से योग्य समझ कर सौंपा था । पूरी लंका सोने की भाँति चमचमाती थी । 

रावण साहसी और ज्ञानी पुरुष था । उसकी लंका रत्नद्वीप के नाम से विख्यात थी । सीता के सम्बन्ध में जानकारी पाकर श्रीराम समुद्र तट पर आ गये । यहीं इन्होंने वानर सेना सजायी और समुद्र पर सेतु बाँधने का काम चालू कराया । नल - नील नामक शिल्पी इस कार्य को बखूबी करने लगे । 

राम ने अपना शिविर भी तट के बिल्कुल समीप बनवाया किन्तु इन्हीं दिनों एक अनहोनी घटना घटी । रावण का भाई विभीषण रावण से बागी होकर राम से आ मिला । राम ने विभीषण को गले लगाया और अपने साथ शिविर में रख लिया । इस घटना से रावण परेशान हो उठा मगर उसने धैर्य नहीं खोया बल्कि नई तरकीब सोचने लगा ।

उसे एक तरकीब ही गयी । उसने विभीषण की पुत्री को बुलवाया और समझाया कि राम के साथ युद्ध होने वाला है , इस कठिन समय में क्या करना चाहिये ? ' अपनी धरती की रक्षा । " लड़की बोली । इस जवाब से रावण बहुत खुश हुआ । विभीषण की पुत्री युवा और खूबसूरत थी । 

उसने राक्षसी माया योग भी सीख रखा था । रावण ने उसे समझाया , " तुम सीता के समान भेष बनाकर समुद्र में शव की तरह बहती रहो , राम की नजर पड़ेगी तो वे समझेंगे कि सीता मर गयी और तब शिविर उखाड़ कर अयोध्या लौट जायेंगे । " लंड़की ने हामी भरी और सीता समान रूप धारण करके समुद्र में बहने लगी । सुबह का समय था । राम समुद्र में नहाने आये थे । 

उन्होंने सीता की लाश देख ली और भाई लक्ष्मण की ओर देखकर रो पड़े । फिर इशारे से समझाया कि लाश को रोको , अंत्येष्टि करनी होगी । लक्ष्मण भी रो पड़े । लाश आगे बढ़ने से रोक दी गयी और अंत्येष्टि के लिये इंतजाम होने लगा । बंदरों की भीड़ लग गयी । भक्त हनुमान भी आ पहुँचे । वे सीता के शव को ध्यान से देख रहे थे , जो समुद्र तट पर रोक रखी गयी थी । 

हनुमान सोचने लगे , ' समुद्र की लहरें यहाँ से लंका की ओर जाती हैं फिर लाश को भी उसी ओर बहना चाहिये था किन्तु यह इधर बह आयी । इसमें जरूर कोई रहस्य है । ' हनुमान रहस्य का पता लगाने उड़ चले । रत्नद्वीप जा  कर उन्होंने देखा कि वहाँ भी समुद्र तट पर भीड़ लगी है और लोग राम की प्रतिक्रिया जानने के लिये व्यग्र हैं । 

यहाँ श्रीराम ने सीता की चिता सजवा ली और आग लगा दी । चिता धू - धूकर जलने लगी । आग की गर्मी पाते ही लड़की घबरा गयी और उठकर बैठ गयी लेकिन इतने सारे बंदरों की भीड़ देखकर वह आकाश में उड़ गयी और परियों के समान डैने फैलाकर उड़ने लगी ।

विभीषण की बेटी बनी सीता

 

श्रीराम के अचरज का ठिकाना न रहा । वे कुछ समझ न पाये लेकिन वीर हनुमान ने भागती हुई सीता को पकड़ लिया और उसे खींचते हुए राम के समीप ले आये और सही शक्ल में आने के लिये चेतावनी दी । लड़की डरी हुई थी । वह तुरन्त अपने असली रूप में आ गयी । लड़की का चेहरा देखते ही विभीषण चिल्लाया , " यह तो मेरी पुत्री “ आपकी पुत्री ? ” 

श्रीराम ने चकित होकर पूछा । फिर लड़की से सच्ची - सच्ची बातें पूछने लगे । स्नेह भरी बातें सुनकर लड़की रो पड़ी और सुबकती हुई बोली , " मैं बड़े ताऊजी की बातें मानने को विवश थी । ” श्रीराम ने लड़की को क्षमा कर दिया । वह रत्नद्वीप सकुशल लौट गयी । श्रीराम विभीषण की ओर देखकर मुस्करा पड़े । विभीषण की आँखें लाज से झुक गयीं । इन आँखों में राम के प्रति कृतज्ञता का भाव था । बंदरों की टोली चिल्ला पड़ी , " जय श्रीराम ! "

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