चमत्कारी नाग की पूरी कहानी | सतरंगी बाँसुरी

story of vinayak flute


 विनायक बांसुरी बजा रहा था । शांत वातावरण में सुर गूंज रहे थे । टीले पर बने प्राचीन मंदिर में एक शिला पर बैठा था विनायक । चारों ओर सन्नाटा पसरा था । टीले को छूती हुई नदी , चुपचाप बही जा रही थी । पश्चिम में सूरज डूब चुका था । विनायक को जब भी समय मिलता , वह मंदिर में चला आता और देर तक बांसुरी बजाता रहता । उसे यह स्थान पसंद था । उसकी साधना चलती रहती और समय बीतता जाता । 

अद्भुत मिठास थी उसकी बांसुरी में । विनायक के पिता परदेस में नौकरी करते थे । घरे में वह , छोटी बहन अलका और माँ , बस यही तीन जने थे । दिन आराम से बीत रहे थे । विनायक को भी कुछ दिन पहले नौकरी मिली थी । एकाएक विनायक का ध्यान भंग हुआ । उसने झाड़ियों में सरसराहट सुनी । धंधलका , पसरने लगा था । 

उसने बांसुरी बजाना बंद कर दिया । घर जाने के लिए उठ खड़ा हुआ । तभी आवाज आई " विनायक ! " विनायक के बढ़ते कदम थम गए । वह हैरानी से इधर - उधर देखने लगा । कहीं कोई नहीं था । " कौन पुकार रहा है मुझे ? " विनायक के मुँह से निकला ।

मैं पुकार रहा हूँ । इधर देखो । ” विनायक आवाज की दिशा में घूम गया । उसने देखा , जमीन पर पड़े शिलाखंड के पास एक है । उसमें से प्रकाश फूट रहा है । यह अद्भुत दृश्य देखकर विनायक घबरा गया । आवाज फिर आई- " विनायक डरो मत । तुमको कुछ भी नहीं होगा तब जाकर विनायक अपने फटी - फटी आँखों से जमीन से निकलते हुए रोशनी को देख रह जाता है । और आवाज भी उसी जगह से आ रही थी । उसको सगमा हो गया था उसका सिर घूमने लगा । ' न जाने क्या मुसीबत आने वाली है । ' मन ने कहा , निकल । ' पर पैर तो जैसे धरती से चिपक गये थे । ' 

भाग  आप ... कौन हैं ? " - विनायक ने डरते - डैरते पूछा । - " मैं स्वर्णमुख नाग हूँ । धरती में रहता हूँ । मुझे संगीत अच्छा लगता है । तुम्हारी बांसुरी की टेर मुझे यहाँ तक खींच लाती है । सचमुच बहुत अच्छे बांसुरी वादक हो तुम । " विनायक की समझ में न आया , कि क्या कहे । आकाश में कालिमा छा गई थी , पर विचित्र प्रकाश के कारण उस जगह खूब उजाला था ।

 आखिर विनायक ने साहस से स्थिति का मुकाबला करने का निश्चय किया । कहा - " आप हमारा सरनेम कैसे जानते हो ? " - " मैं तो और भी बहुत कुछ जानता हूँ । पर दुःख की बात यही है कि मैं तुम्हारे सामने नहीं आ सकता । " - स्वर्णमुख नाग ने कहा । " क्यों नहीं आ सकते । " - " यह भी बता दूँगा । पर क्या तुम मेरा एक काम करोगे विनायक जी उलझनो में फँस गये । इसका  क्या रहस्य होता है ? 

स्वर्णमुख नाग , जो मनुष्य की बोली में बोलता आखिर क्या चाहता है तब जाकर बोला आप तो एक चमत्कारी नाग लगते हैं । फिर भी बाहर क्यों नहीं आना चाहते है ? या इसमें कोई और बात है  उसने बताया । की हम झूठ नहीं बोलते है । तुम्हारी ही बांसुरी की आवाज सुनकर ही मुझे तुम पर भरोसा हो सका है । अच्छा तो ठीक है तुम अपनी बांसुरी दरार के करीब रख दो । विनायक जी ने सहमते हुए उस बांसुरी को दरार के पास रख दिया जहाँ से प्रकाश फूट फुट कर निकल रहा था । उसके बाद फिर ध्यान से देखने में जुड़ गया उसके बाद ही एक फुफकार सुनाई देने लगी ।

 अगले ही पल बांसुरी में से अपने आप सुर निकलने लगे । जैसे कोई अदृश्य व्यक्ति बांसुरी बजा रहा हो । - " तुम बांसुरी उठा लो । इसके सुरों में और भी मिठास भर दी है मैंने । तुम जब - जब इसे बजाओगे , सुनने वाले मुग्ध हो जायेंगे । पूरे देश में तुम्हारा नाम हो जाएगा । बताओ , अब करोगे मेरा काम ? ” विनायक ने बांसुरी उठा ली । वह चकित भाव से बोला " बताइए , क्या काम है ?  

तुमने मनफूल बीन - वादक का नाम जरूर सुना होगा । दूर - दूर तक मशहूर है उसका नाम । मैं उसकी बीन सुनना चाहता हूँ । बहुत दिन से यहाँ नहीं आया वह । तुम उसे ले आओ । " - स्वर्णमुख नाग की आवाज आई । मनफूल बहुत अच्छी बीन बजाता था । यह विनायक को मालूम था । वह दूर के किसी गाँव में रहता था । पर आजकल बहुत बीमार था । लेकिन यह विचित्र नाग उसे यहाँ क्यों बुलाना चाहता है । विनायक ने ऐसी अनेक कथाएँ सुनी थीं 

जब नाग मनुष्य से बदला लेते हैं । क्या स्वर्णमुख भी मनफूल के साथ ऐसा ही व्यवहार करना चाहता है ! ' अगर ऐसी बात है तो मैं उसे यहाँ कभी नहीं लाऊँगा , चाहे जो भी हो ।'- यही सब सोचता हुआ विनायक चुपचाप खड़ा रह गया । दरार में से आवाज आई - ' क्या सोचने लगे विनायक ? मैं तुम्हारे मन के भाव खूब समझ रहा हूँ । मुझसे कुछ भी नहीं छिपा है , तुम्हारा ऐसा सोचना गलत नहीं है । 

भलां एक साँप और मनुष्य में कैसा सम्बन्ध ! लेकिन मेरा विश्वास करो , मैं बहुत दिनों से मनफूल से मिलना चाहता हूँ । तुम चाहो तो उससे पूछ लेना- " जब वह इस शहर में होता था तो रोज आकर बीन बजाया करता था । पर फिर बीमारी के कारण वह गाँव चला गया । और मेरे बाहर निकलने पर बंधन लग गया ! नहीं तो मैं स्वयं उसके गाँव चला जाता । ” ' क्या वह जानता है आपका रहस्य ? " - विनायक ने पूछा " नहीं , मैंने कभी बताना जरूरी नहीं समझा । शायद वह डर जाता और यहाँ फिर कभी न आता । तुम्हें बताना इसलिए जरूरी था कि मैं बिल से बाहर नहीं आ सकता । " - दरार में से स्वर्णमुख की आवाज आई । “ आखिर ऐसी क्या बात है ? " - विनायक ने पूछा । " बात ऐसी है कि बताने में लज्जा लगती है । 

एक बार मेरे मन में आया कि मैं तो स्वर्णमुख नाग हूँ । बहुत सी शक्तियाँ हैं मेरे पास , तो मैं ही नागों का राजा क्यों न बन जाऊँ ! बस , मैंने नागराज पर ही हमला कर दिया । उन्हें मेरे षड्यंत्र की जानकारी थी । उन्होंने क्षमा माँगने पर मुझे प्राण दंड तो नहीं दिया , पर मेरे बाहर घूमने की शक्ति छीन ली । तब से मैं बिल से बाहर आने की शक्ति खो बैठा हूँ । क्या अब भी तुम मेरा काम नहीं करोगे ? अब तो तुमने मेरे जीवन का वह रहस्य भी जान लिया , जिसके कारण मुझे लज्जित होना पड़ा । " 

स्वर्णमुख ने कहा । सोच - विचार में डूबा विनायक घर लौट आया । पूरी रात उसे नींद न आई- उसी विचित्र घटना के बारे में सोचता रहा । सुबह उठकर वह मनफूल की खोज में चल दिया । उसके गाँव का पता लग गया , वहाँ तक पहुँचते - पहुँचते शाम हो गई । छोटा - सा गाँव ढाकली । चौपाल पर पूछा तो एक आदमी , उसे मनफूल के घर तक छोड़ आया । अंदर अँधेरा था , लेकिन कराहने की आवाजें आ रही थीं । 

विनायक अन्दर चला गया । मनफूल को आवाज दी । किसी ने बड़ी धीमी आवाज में उत्तर दिया , फिर दीपक का काँपता हुआ प्रकाश फैल गया । विनायक ने देखा , एक बूढ़ा आदमी टूटी चारपाई पर लेटा है । मनफूल की हालत देखकर वह अचकचा गया , फिर अपना परिचय दिया । अब .... मनफूल ने कहा- " आओ भैया ! अब तो मेरे पास कोई नहीं आता ! मुझे रोग ने घेर रखा है । घर में और कोई है नहीं । जब मैं ठीक था तो नगर - नगर बीन बजाता घूमता था । सब तारीफ करते थे , लेकिन " - वह आंसू पोंछने लगा । 

विनायक ने उसी समय फैसला कर लिया । बोला- " आप चिंता न करें , मैं आपको शहर ले चलूँगा । आपका इलाज करवाऊँगा । आप कुछ ही दिन में ठीक हो जायेंगे । " - " भैया , तुम क्या देवदूत हो , जो मुझ अपाहिज बूढ़े के लिए इतना कुछ करोगे ? " " ऐसी कोई बात नहीं है । बस , आप अपने साथ अपनी बीन जरूर ले लें । " -विनायक ने कहा । उसने उसी समय बैलगाड़ी का प्रबंध किया और थोड़ी देर बाद ही मनफूल को लेकर चल दिया । गाँव वाले हैरान थे कि वह कौन था , जो मनफूल को इस तरह अपने साथ ले जा रहा था । रास्ते में विनायक ने मनफूल को स्वर्णमुख नाग की पूरी कहानी बता दी । 

वह अचरज से देखता रह गया । शहर पहुँचकर विनायक ने बैलगाड़ी को उसी टीले के पास रुकवा दिया । फिर मनफूल के कंपकंपाते शरीर को सहारा देकर जैसे - तैसे ऊपर ले गया । आसपास कोई नहीं था । विनायक ने मनफूल को उसी दरार के पास बैठा दिया और बाँसुरी बजाने लगा । कुछ देर बाद दरार से आवाज आई- " विनायक , मनफूल कहाँ है ? उससे कहो , अपना हाथ दसर के पास ले आए । "

विनायक ने मनफूल की ओर देखा । वह बोला- " जब मैं यहाँ तक आ गया हूँ तो पीछे नहीं हटूंगा । मैं भी पूरी बात का भेद जानना चाहता हूँ । " कहते - कहते मनफूल अपना हाथ दरार के पास ले गया । एक फुफकार सुनाई दी । मनफूल का बदन काँपने लगा - उसे महसूस हुआ जैसे पूरे शरीर में बिजली दौड़ गई हो । वह उठ खड़ा हुआ । शरीर की पीड़ा समाप्त हो गई थी । मनफूल अपने को एकदम स्वस्थ और चुस्त महसूस कर रहा था । 

उसने हाथ जोड़कर सिर झुका लिया । कहा " यह मेरा नया जन्म हुआ । " स्वर्णमुख नाग की आवाज आई- “ मनफूल , अब तुम बीन बजाओ । ” अगले ही पल मनफूल बीन बजाने लगा । एक मीठी धुन हवा में फैल गई । बहुत देर तक बीन बजाता रहा मनफूल । फिर स्वर्णमुख की आवाज आई- " मनफूल , अब तुम जाओ । तुम्हारा कल्याण हो । ” “ मैं अब नहीं जाऊँगा । रोज यहाँ बैठकर बीन बजाया करूँगा । " मनफूल ने उत्साह से कहा । स्वर्णमुख की आवाज बंद हो गई । उसके बाद दोनों लौट आए । मनफूल विनायक के घर के पास ही रहने लगा । अब वह फिर पहले जैसा मनफूल हो गया था । और विनायक - वह तो रोज टीले पर जाकर - अपनी बांसुरी के सुर छेड़ता ही था ।



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