दो देविओ की कहानी | Story of two goddesses Priyamba and Pratishtha

 

विक्रम बेताल की दूसरी कहानी

शिलापुर राज्य की सीमा के निकटवर्ती वन में दो मंदिर थे । उनमें से एक मंदिर में प्रियाम्बा नाम की देवी की प्रतिष्ठा थी और दूसरे मंदिर में जगदम्बा की प्रियाम्बा देवी को यह शक्ति प्राप्त हुयी थी कि उनको पास आये हुए भक्तों में से दो आराधक की कामनाओ को पूरा किया करती थी , 

जबकि जगदाम्बा प्रतिदिन केवल एक भक्त की कामना को ही पूर्ण कर सकती थी । कामनाओं के अधिक फलीभूत होने के कारण ही प्रियाम्बदा का मंदिर सदा भक्तों से भरा रहता था । पर जगदाम्बा के मंदिर में भक्तों की भीड़ बहुत अधिक नहीं होती थी । 

इस कारण प्रियाम्बा के अन्दर अहंकार घर कर गया था । कभी रात्रि के समय यदि प्रियाम्बा की जगदाम्बा से भेंट हो जाती , तो वह बड़े गर्व के साथ कहती , " जगदाम्बा , हमारा चमत्कार देखो हम कितनी बड़ी महिमावाली हूँ । तुमको देखने पर मुझे बड़ी तरश आती है । 

मेरा मंदिर भक्तों से शोभायमान रहता है । पर तुम्हारा मंदिर तो कई बार सुनसान रहता है । तुम्हें कितना दुख होता होगा ? " प्रियाम्बा की बात के उत्तर में जगदाम्बा शांतिपूर्वक कहती , " प्रियाम्बा , इसमें दुखी होने की क्या बात है ? हम दोनों ही तो भक्तों का हित और कल्याण चाहती हैं । " 

जगदाम्बा का यह उत्तर प्रियाम्बा को अत्यन्त निराशाजनक प्रतीत होता । उसके अहंकार की तृप्ति न होती । वह तो चाहती थी कि जगदाम्बा उसकी प्रशंसा करे और अपने भाग्य का रोना रोये । पर यहाँ तो बात बहुत ही उलटी थी । एक दिन एक विशेष घटना घटी । शिलापुरी के राजा शरदचंद्र घोड़े पर सवार होकर अकेले ही प्रियाम्बा के मंदिर में आये । 

उन्होंने मंदिर के सामने अपना घोड़ा रोका और उतरकर मंदिर के अन्दर गये । राजा शरदचंद्र में प्रियाम्बा की प्रतिमा के सामने प्रणाम करके कहा , " देवी मै तुम्हारी महिमा से भलीभाँति परिचित हूँ । 

मेरी एक कामना है । मै पड़ोसी राजा सत्यपाल पर शीघ्र ही आक्रमण करुँगा । उस युद्ध में धन - जान की चाहे कितनी भी बड़ी हानि क्यों न हो पर, मुझे विजयश्री चाहिए | माता आप मुझे जीत का आशीर्वाद दो । " 

इस घटना के कुछ देर बार ब्रह्मरुद्र नाम का एक लुटेरा मंदिर में ' आया । उसने प्रियाम्बा देवी को भक्तिपूर्वक प्रणाम करके निवेदन किया , " हे महिमाशालिनी अम्बा , शिलापुरी के एक धनवान सेठ के घर में विवाह का उत्सव है । मैं वहाँ अपने अनुचरों के साथ जाऊँगा और वहाँ के सब लोगों को लूटूँगा । मुझे इस काम में सफलता मिले , यह वर देना ! " 

इस प्रकार अपनी कामना प्रकट करके लुटेरा ब्रह्मरुद्र भी चला गया । फिर कुछ देर रक्तभैरव नाम का एक राक्षस मंदिर में आया । वह पास के घने वन में रहता था । उसने प्रियाम्बा देवी से निवेदन किया , " देवी अम्बा , चार दिन से नरमाँस न पाने के कारण मैं तड़प रहा हूँ । 

इस नाते हम पर थोड़ा कृपा करे कि हमको चार पांच  ब्यक्ति तुरंत हमारे आहार के लिए प्राप्त हो जा सके और यह भी इसके बाद भी हररोज हमें नरमाँस खाने को मिलाता रहे । " इस प्रकार विनती करके वह राक्षस भी चला गया । देवी प्रियाम्बा ने राजा , डाकू और राक्षस तीनों की प्रार्थनाएँ क्रमशः सुनी । देवी ने समझ लिया कि इन तीनों की कामनाएँ ही अंधी और अन्यायपूर्ण हैं । 

देवी प्रियाम्बा ने निश्चय कर लिया कि इन तीनों की कामनाओं को पूर्ण नहीं किया जायेगा । देवी अपने मंदिर में पूरे दिन प्रतीक्षा करती रही कि कुछ और भक्त आयें और अपनी कामना का निवेदन करें । पर अत्यन्त आश्चर्य की बात यह हुई कि उस दिन उन तीनों के अलावा अन्य कोई भक्त नहीं आया । 

देवी प्रियाम्बा के सामन जटिल समस्या उत्पन्न हो गयी । देवी में विद्यमान शक्ति का यह नियम था कि प्रतिदिन दो भक्तों की कामनाओं की पूर्ति अवश्य करनी है । ऐसा न होने पर देवी की शक्ति का लोप हो जायेगी । राजा , डाकू और राक्षस की कामनाओं को पूर्ण करना अधर्म है और अन्याय था । 

देवी नहीं चाहती थी कि उससे ऐसा अधर्म काम हो , पर वह अपनी शक्ति से भी वंचित नहीं होना चाहती थी । प्रियाम्बा समस्या को सुलझाने का जितना अधिक प्रयत्न करती , समस्या उतनी ही जटिल हो जाती । ऐसी स्थिति में उसे जगदाम्बा का स्मरण आया । उस रात वह जगदाम्बा से मिलकर बोली , " जगदा , मेरे सामने एक जटिल समस्या उत्पन्न हो गयी है । 

इसे सुलझाने का कोई उपाय बताओ , इसीलिए मै तुम्हारे पास आयी हूँ । " " कैसी जटिल समस्या ? " जगदाम्बा ने उससे पूछने लगी तो प्रियाम्बा ने अपने शरण में आये हुए   राक्षस, राजा और डाकू की कामनाओ जानकर उन्होंने बोला , " जगदा , इन तीनों की कामनाएँ ठीक नहीं अन्य ब्यक्ति के लिए भी। मैं इन्हें पूरा करना नहीं चाहती ।

तुम जानती ही हो , यदि मैं प्रतिदिन दो भक्तों की कामनाओं को पूराण न करूं , तो मेरी शक्ति का लोप हो जायेगा । पर आज सबसे बड़े दुख और हैरानी वाली बात तो यह हो रही है कि हमारे पास आज के दिन इन तीनों के अलावा हमारे दरबार में और कोई नहीं आया है । 

अब स्थिति यह है कि या तो मैं उनकी कामनाओं को पूर्ण करूं या अपनी शक्ति खो दूँ ! मेरी समझ में नहीं आता कि मैं क्या करूँ सारा वृत्तान्त सुनकर जगदाम्बा बोली , " प्रिवा , तुम चिंता न करो ! जैसा मैं कहती हूँ वैसा करो ! तुम्हें उन तीनों की कामनाओं की पूर्ति करने की कोई आवश्यकता नहीं है । 

फिर भी , तुम्हारी महिमाओं का , और तुम्हारी शक्ति का नाश नहीं होगा । " जगदाग्बा की बात सुनकर प्रियाम्बा विस्मित हो उठी । उसने पूछा , " जगदा , परन्तु यह कैसे मुमकिन है " सुनो प्रिया तुम उनकी wishes की पूर्ति नहीं करना है इस तरह से तुम्हारी शक्ति का समाप्ति हो जायेगा । 

तदुपरान्त तुम मेरे पास आकर मुझसे कामना करना कि तुम्हारी शक्ति तुम्हें पुनः प्राप्त हो जाये | तुम मेरी शक्ति के विषय में जानती ही हो कि में प्रतिदिन एक व्यक्ति की कामना पूर्ति कर सकती हूँ । मै तुम्हारी खोयी हुई शक्ति को तुम्हें पुनः वापस दिला दूँगी । " 

जगदाम्बा ने समझाया । जगदाम्बा का उत्तर सुनकर प्रियाम्बा को एक नई चिंता ने आ घेरा । उसने अनेक अवसरों पर जगदाम्बा के सामने अपने गड़प्पन की प्रशंसा की थी और उसे छोटा दिखाने का प्रयत्न किया था । इस समय यदि वह उन तीन में से दो व्यक्तियों की कामना की पूर्ति नहीं करती है तो वह शक्तिहीन हो जायेगी । 

ऐसी स्थिति में यह भी संभव है कि जगदाम्बा के हृदय में प्रतिशोध की भावना जग जाये और वह ईर्ष्यावश उसकी कामना की पूर्ति न करे । तब उसकी क्या दशा होगी ? जिस वक्त भक्त उनके शक्ति एवं महिमा - विहीन हो जायेंगे तो वे उसके पास आना छोड़ देंगे उसके बाद  जगदाम्बा को ही अपना मुख्यदेवी मान लेंगे । 

तब उसे कितनी व्यथा होगी वह खुद के वैभव को याद करके कितना तड़प उठेगी ? प्रियाम्बा कुछ देर तक इसी प्रकार के सोच - विचार में डूबी रही । इसके बाद उसने अपने मन में कोई निर्णय किया और दृढ़तापूर्वक मन ही मन बोली , " मेरी शक्ति रहे या जाये , किन्तु मेरे पास आये राजा , डाकू और राक्षस की कामनाएँ निष्फल हो जायें ! " 

दूसरे ही क्षण प्रियाम्बा के शरीर से शक्ति तिरोहित हो गयी । उसका मुखमंडल तेजविहीन हो गया , शरीर की शोभा मलिन हो गयी । प्रियाम्बा ने समझ लिया कि अब वह पूरी तरह शक्तिविहीन है । उसने हाथ जोड़कर बड़े विनम्र भाव से जगदाम्बा से कहा , " जगदाम्ब्रा देवी , मुझे मेरी खोयी हुई शक्ति प्रदान करो ! "

" तथास्तु ! " जगदाम्बा ने आशीर्वाद दिया । दूसरे ही क्षण प्रियाम्बा का मुख - मंडल दिव्य तेज से दमक उठा । बेताल ने यह कहानी सुनाकर कहा , " राजन , प्रियाम्बा में जगदाम्बा से अधिक शक्ति अवश्य थी , पर जगदाम्बा के प्रति उसका व्यवहार अत्यन्त अहंकारपूर्ण एवं क्षुद्र था । जगदम्बा ने पुनः उसे शक्तिसंपन्न बना दिया । 

ऐसा उसने किस प्रभाव के कारण किया , यदि इस संदेह का समाधान आप जानकर भी न करेंगे तो आपका सिर फूटकर टुकड़े - टुकड़े हो जायेगा । " तब विक्रमादित्य ने उत्तर दिया , " यह सत्य है कि प्रियाम्बा में पहले अहंकार था और वह जगदाम्बा के साथ क्षुद्र व्यवहार भी करती थी । पर जब उसने अनुभव किया कि तीन दुष्ट और स्वार्थी लोगों ने उसके सामने जो कामनाएँ रखी हैं , वे दूसरों की विपदा और विनाश का कारण हैं , तो उसका हृदय परिवर्तित हो गया । 

वह अहंकारिणी अवश्य थी , पर उसमें सद् - असद् का विवेक भी था । उन तीनों में से किन्हीं दो की कामनाओं की पूर्ति न करने पर उसकी शक्ति का नाश हो जायेगा , वह अच्छी तरह जानती थी । फिर भी वह इस बलिदान के लिए तत्पर हो गयी । 

यह त्याग का कोई निस्वार्थी एवं विशाल हृदय व्यक्ति ही कर सकता है । इस घटना से प्रियाम्बा के गुणों को प्रकाश मिल गया । उधर जगदाम्बा स्वभाव से ही नम्र , मधुर और प्रेममयी थी । अपनी ही श्रेणी की एक देवी की सहायता करने में उसकी कोई हानि नहीं थी । 

जगदाम्बा का कार्य त्याग की भावना से प्रेरित नहीं , उसके हृदय की उदारता का परिचायक है । यहाँ परस्पर के प्रभाव का प्रश्न नहीं है , सद्भावना का प्रश्न है । प्रियाम्बा ने जो कुछ किया , वह निश्चय ही प्रशंसनीय है । " राजा विक्रमादित्य के इस प्रकार मौन होते ही बेताल शब के साथ अदृश्य होकर पेड़ पर जा बैठा ।

और नया पुराने