सेवाराम एक गाँव में रहता था । घर में वह और पत्नी श्यामा , बस , दो ही जने थे । फिर भी जीवन आराम से नहीं बीत रहा था । सेवाराम के पास न जमीन थी , न कुछ और साधन । गाँव में जो छोटा मोटा काम मिलता , उसी से जैसे - तैसे गुजर - बसर होती । श्यामा रोज मंदिर जाती , पति से कहती तो एक ही जवाब देता " तुम तो रोज मंदिर में जाती हो ! अब तक क्या मिल गया तुम्हें ? श्यामा हँसकर कहती- " मैं कुछ मांगने नहीं , भगवान की पूजा करने जाती हूँ । पूजा सच्ची मन से कर रही हु कभी सफल भी हो जाऊँगी ।
एक दिन सुबह होते ही निकल पड़ता है । तब श्यामा ने हाथ जोड़कर मन में बोला हे भगवान् इनकी भला करना चलते - चलते दोपहर से अधिक हो गई । शहर अभी काफी दूर था । श्यामा ने रास्ते में खाने के लिए दो तीन रोटि बाँध दिया था । उस जगह सेवाराम एक छायादार पेड़ के नीचे जा बैठा ।
चारों ओर सत्राटा - झाड़ - झंखाड़ । थोड़ी दूर पर नदी बह रही थी । सेवाराम ने खाने की पोटली खोली । फिर सोचा - ' पहले कहीं से पानी ले आऊँ । ' लोटा लेकर चला तो जमीन पर कुछ चमकता नजर आया । झुककर देखा , पीले रंग का सिक्का था । उसने उठा लिया । उलट - पलटकर देखता रहा । सोच रहा था - ' जाने किसका है ? आस पास कोई है भी नहीं जो पूछ लूँ । '
तभी श्यामा की बात ध्यान आई । लगा जैसे कह रही हो - ' साक्षात् लक्ष्मी है । ' सेवाराम चौंक पड़ा । अरे हाँ ! सच , ठीक ही तो है । दौड़ते कदमों से नदी तट पर पहुँचा । सिक्के को रगड़ - रगड़ कर धोया , फिर लोटा भरकर पेड़ के नीचे चला आया । सिक्के को वहाँ पड़े एक पत्थर पर रख दिया । फिर सोचा , पूजा में तो फूल भी होते हैं ।
इधर - उधर देखा , सामने एक झाड़ी पर नन्हे - नन्हे फूल नजर आए । फूल लाकर सिक्के पर चढ़ा दिए । फिर आँखें मूंदकर हाथ जोड़ लिए । अगले ही पल घोड़े की टापों का स्वर सुनाई दिया । एक घुड़सवार पेड़ के नीचे आकर रुका । वह भी छाया देखकर रुक गया था ।
घुड़सवार ने सेवाराम को यों बैठे देखा तो चौंका । पूछने लगे की इस वक्त यह किस देवता की पूजा कर रहे हो brother ! इस जगह तो कोई मंदिर भी नहीं दिखाई दे रहा है । मैं तो यहाँ से अक्सर गुजरता हूँ । मेरा नाम सूरज है । " सेवाराम ने अपना परिचय दिया , फिर पूरी घटना बता दी । सूरज ने बढ़िया कपड़े पहन रखे थे ।
उसे देखकर सेवाराम को अपने दीन - हीन वेश पर लज्जा आने लगी । सेवाराम की बात सुन , सूरज ने हैरानी से देखा - सोने का चमचमाता सिक्का और उस पर रखे फूल । उसने सिक्के को हाथ में उठा लिया , तभी सेवाराम की आवाज कान में पड़ी- " अच्छा भैया , मैं चलूँ , अभी काफी रास्ता पार करना है । " सूरज ने सिक्के को फिर से वहीं रख दिया ।
एक बार उसके मन में लालच जाग उठी उसने फिर फिर कहा जानते हो ये क्या है " क्या है ? " - सेवाराम ने पूछ पड़ा यह सोने का सिक्का है जोकि यह बड़ा कीमती है और तुम इसे छोड़कर चले जा रहे हो । ” " तो और क्या करूँ ! लक्ष्मी ने दर्शन दिए हैं । मेरी घरवाली कहती थी कि मैं पूजा नहीं करता । मैंने पूजा कर ली । अब शहर जाकर रोजगार ढूँढूंगा । " -
सेवाराम ने कहा । सूरज अचरज से सेवाराम को देखता रहा । बोला- " अगर सोने का सिक्का कोई और ले जाए तो ? उसने वहा जाने के बाद " सेवाराम ने जवाब देकर रास्ते की तरफ बढ़ा । फिर सूरज सोचा और बोल पड़ा की मैं अब शहर जा रहा हूँ तुम सब हमारे साथ में चलो अकेले कहाँ-कहा भटकोगे सेवाराम ने एक बार मना किया
लेकिन सूरज ने बाद में उसे राजी कर लेता है। वह सोने का सिक्का ठीक उसी तरह से कमल के फूलों के बीच में पड़ा रहा । घोड़ा को दोनों को लेकर चले गये। सूरज शहर में मशहूर व्यापारी दीनदयाल का विश्वासपात्र कारिंदा था । उसने उन्हें सब कुछ बता दिया ।
दीनदयाल कुछ पल सेवाराम की ओर देखते रहे । उस भोले और ईमानदार आदमी ने उनके मन पर गहरा प्रभाव छोड़ा । बोले- " सूरज बस हमें ऐसे ही एक आदमी की तलाश थी । सेवाराम को नौकरी मिल जाती है । उसने गाँव में जाकर श्यामा को भी शहर ले आ गया। आते समय दोनों ने ठीक उसी पेड़ के नीचे रुक गए ।
वहाँ पर चंद मुरझाए हुए फूल पड़े थे , लेकिन वहा पर सोने का सिक्का नहीं था । सेवाराम ने वहाँ ताजे फूल चढ़ाते हुए कहा- “ लक्ष्मी माँ दर्शन देने आई थीं । वरदान देकर चली गई । यह सब सुनकर श्यामा हँसने लगती है । फिर दोनों में इस बात को लेकर कोई चर्चा नहीं हुई कि वह सिक्का अब कहाँ गया उसको कौन ले गया होगा ।