एक था तीरंदाज । उसका निशाना अचूक था । उसे अपनी निशानेबाजी पर बड़ा अभिमान था । यह साबित करने के लिए कि कितना बड़ा तीरंदाज है , हर रोज वह अपनी पत्नी की नथ में से निशाना लगाकर तीर छोड़ता था ।
परन्तु उसकी पत्नी को अब तक जरा - सी खरोंच भी नहीं आई थी । एक दिन तीरंदाज का साला अपनी बहन से मिलने आया तो देखा , उसकी बहन का चेहरा सफेद पड़ गया है । वह सूखकर कांटा हो गई है । उसने घबराकर अपनी बहन से इसका कारण पूछा । उसकी बहन बोली- " वैसे तो मुझे यहाँ कोई दुःख नहीं है , परन्तु तुम्हारे जीजाजी अपना स्किल दिखाने के लिए रोज मेरी नथ में से अपना तीर छोड़ते हैं ।
रोज मुझे यही डर सताता रहता है कि अगर निशाना जरा भी चूका , तो तीर सीधे मेरी आँख या मुँह में लग जाएगा । " भाई ने पूछा- " क्या जीजाजी तीर छोड़ने के बाद और भी कुछ कहते हैं ? " उसकी बहन ने कहा- " हाँ , आनंद और गर्व से मेरे पास आकर कहते हैं- ' मुझसे बढ़कर होशियार भी कोई और देखा है तुमने ? ' मैं कह देती हूँ - ' नहीं , मैंने तो अब तक ऐसे किसी दूसरे के बारे में नहीं सुना है ।
भाई ने बहन को समझाया- " अब अगर पूछे , तो कहना कि संसार में बहुत से लोग हैं जो तुमसे भी होशियार हैं । " अगले दिन सफल निशाना लगाने के बाद तीरंदाज ने जब फिर से अपना प्रश्न दोहराया , तो पत्नी ने अपने भाई के सिखाए अनुसार कह दिया । इस पर उत्तेजित होकर तीरंदाज बोला- “ ठीक है । अब जब मुझे ऐसा आदमी मिल जाएगा , तभी मै घर वापस आऊँगा ।
यह कहकर वह घर से चला गया । चलते - चलते वह एक नदी के किनारे पहुँचा , जहाँ पर एक आदमी बैठा हुआ कुछ निकाल निकल कर खा रहा था । उसके पास जाकर तीरंदाज ने पूछा- " भाई , तुम कौन हो और कहाँ जा रहे हो ? " उस आदमी ने कहा- " मैं एक पहलवान हूँ । कुश्ती लड़ने और वजन उठाने में मेरी बराबरी कोई नहीं है टक्कर में क्यों पड़ेहो हो चक्कर में ।
अब तक मैं समझता था कि मेरे समान चतुर और गुणवान कोई नहीं है । पर किसी ने मुझे बताया कि मुझसे भी अधिक होशियार एक तीरंदाज है । ऐसा अचूक निशाना लगाता है कि उसकी पत्नी की नथ में से तीर पार हो जाता है । पत्नी को जरा भी नुकसान नहीं पहुँचता ।
मैं उसी तीरंदाज को खोजने निकला हूँ । " तीरंदाज ने बताया मैं वह एक तीरंदाज हूँ । हम भी तुम्हारे जैसे अपने किसी समझदार इन्शान की खोज में निकला हु । आ जाओ आगे चलें हो सकता है इनसे भी कोई होशियार इन्शान मिल जाए । दोनों वहाँ से आगे चले
तो एक चौराहे पर उन्हें एक आदमी मिला । उसने इन दोनों को देखा , तो आवाज देकर पूछा- " मित्रो ! कौन हो तुम लोग और कहीं जा रहे हो ? " इन दोनों ने उत्तर दिया- " हम दोनों में से एक पहलवान है और दूसरा तीरंदाज | हम अपने ही समान किसी होशियार आदमी की तलाश में निकले हैं । तुम बताओ , तुम कौन हो ?
उस आदमी ने बताया- " मैं एक पंडित हूँ । अपनी तीव्र स्मरणशक्ति तथा विद्वत्ता के लिए मेरा बड़ा नाम है । मैं समझता था कि संसार में केवल में ही एक होशियार हूँ और कोई दूसरा आदमी नहीं है । मगर मुझे पता चला है कि एक पहलवान और एक तीरंदाज हैं - मुझसे भी बहुत गुणवान और चतुर । उन्हीं की तलाश में निकला हूँ ।
इन्होंने बता दिया । पंडित ने आनंदपूर्वक उनके हाथ पकड़कर कहा- " आप दोनों आज से मेरे भाई हुए । मेरा घर यहाँ से अधिक दूर नहीं है । वहाँ चलकर खा - पीकर विश्राम करिए । " ये लोग पंडित के घर जाकर खा - पीकर सो गए । पंडित की रसोई में लोहे का एक बहुत बड़ा हंडा रखा रहता था , जिसे आठ - दस आदमी मिलकर भी बड़ी मुश्किल से उठा पाते थे ।
रात में पहलवान को अपनी शक्ति प्रदर्शन करने की लहर आई । उसने यहाँ हंडा उठाकर , पास वाली नदी में पानी के अंदर डुबाकर छिपा दिया । फिर दबे पांव आकर सो गया । मगर पंडित की पत्नी को आहट लग गई । उसने अपने पति को जगाया कि शायद घर में कोई चोर घुस आया है ।
पंडित और उसकी पत्नी ने चारों ओर देखा तो पाया कि घर की सभी वस्तुएँ अपनी - अपनी जगह हैं , केवल हंडा ही गायब है । पंडित ने सोचा कोई साधारण चोर तो यह काम कर नहीं सकता । उसका शक पहलवान पर गया । क्योंकि आंगन में भारी वजन लेकर जाने के कारण मिट्टी में पैरों के गहरे निशान थे
जो एक ही आदमी के थे । आते समय वजन नहीं था , इसलिए पैरों के निशान हल्के थे । पंडित ने पहलवान के पैर छूकर देखे , तो ठंडे थे । वह समझ गया कि इसी ने हंडा ले जाकर नदी में छुपाया है । पैरों के निशानों का अनुसरण करते हुए वह हंडे तक जा पहुँचा । हंडे का पता लगाकर पंडित भी घर आकर ऐसे सो गया मानो कुछ हुआ ही न हो । सुबह उठकर उसने दोनों अतिथियों से कहा- " चलिए नदी पर स्नान कर आएँ । घर में स्नान की व्यवस्था कर देता , पर मेरा हंडा किसी ने गायब कर दिया है ।
इस पर पहलवान आश्चर्य का नाटक करते हुए बोला- " इतना बड़ा हंडा कहाँ छिपाया होगा किसी ने ? " पंडित ने उन दोनों को लाकर उस स्थान पर खड़ा कर दिया , जहाँ हंडा छिपा था- " यहाँ छिपाया गया है हंडा । " अब पहलवान और भी आश्चर्य जताता हुआ दोला- " अरे । पर किसने छिपाया यह हंडा ? " इस पर पंडित ने कहा- " आपने । " अब तो पहलवान सच में ही चकित हो पूछने लगा- " आपने कैसे जाना कि हंडा मैंने ही छिपाया और यहाँ छिपाया है ।
पंडित ने सारी बात बता दी । दिन भर खाने - पीने , मौजमस्ती के बाद शाम को पहलवान जंगल में गया । उसे एक राक्षस ने देखा । सोचने लगा- " अगर यह और इसके मित्र मेरे शिकंजे में आ जाएँ , तो बड़ा मजा आए । " उसने एक मोट से बकरे का रूप धर लिया । पहलवान इस मोटे बकरे को पकड़ने दौड़ा | बड़ी मुश्किल से वह बकरे को पकड़ कर पंडित के पास ले आया ।
पहलवान के कंधे पर रखे बकरे की लाल दुष्ट आँखों को देखते ही पंडित समझ गया कि यह बकरा नहीं , कोई राक्षस है । उसने पहलवान से कहा- “ मैंने तुम्हें कोई हट्टा - कट्टा बकरा लाने भेजा था और तुम ले आए यह मरियल - सा राक्षस । अरे ! राक्षस ही लाने थे , तो बहुत सारे लाते । मेरे बच्चे एक - एक , मेरी पत्नी तीन और मैं बारह राक्षस खाता हूँ ।
फिर तुम दोनों भी तो हो । इससे क्या होगा । " पंडित की बात सुन पहलवान ने राक्षस रूपी बकरे को धम्म से नीचे पटक दिया । अब राक्षस अपने असली रूप में आकर गिड़गिड़ाने लगा- " मुझे छोड़ दो । मुझे मत मारो । मैं तुम लोगों को बहुत - सा धन ला दूँगा ।
अन्त में बहुत रोने - गिड़गिड़ाने पर पंडित ने उसे जल्दी धन लेकर वापस आने का वायदा करके जाने दिया । राक्षस अपने राज्य में आकर बहुत - सा धन लेकर जब जाने लगा , तो उसके साथियों ने उसे रोका । ( 4 राक्षसों के राजा ने भी कहा कि मानव हमारा कुछ नहीं बिगाड़ सकते । पर वह राक्षस इन तीनों से इतना डर गया था कि कहने लगा '
आप उन्हें नहीं जानते । वे लोग महान शक्तिशाली और आपको भी खा जायेंगे । " राजा ने गुस्से से कहा- " अच्छा , आज रात दरबार में तुझे सजा दी जाएगी । हमारा हुक्म नहीं मानता । " मगर राक्षस ने ढेर सारा धन लाकर पंडित के हवाले कर दिया । कहा अब राजा तुमको सजा देंगे । पंडित ने कहने लगा चलो हमको भी उसी जगह ले चलो । अगर हमारे राजा ने हमारा कहना नहीं माना तो हम उसको सजा सूना देंगे ।
राक्षस डर गया । तीनों को लाकर दरबार की जगह , सिंहासन के ऊपर वाले पेड़ पर बिठा दिया । रात में राक्षस को राजा के सामने पेश किया गया । राजा ने डांटकर उससे पूछा- “ हमारे मना करने पर भी तूने उन लोगों को धन दिया । बता तुझे क्या सजा दी जाए ?
राक्षस हाथ जोड़कर बोला- " वे साधारण मानव नहीं हैं । वे आपको भी नहीं छोड़ेंगे । " आगे राजा कुछ कहता , इससे पहले ही वह डाल जिस पर तीनों बैठे थे , टूट गई और ये तीनों एक के बाद एक सीधे राजा के सिर गिरे । राक्षस समझे ये लोग आकाश से उतरे हैं । अब तो राक्षसों का राजा भी घबरा गया । उधर ये तीनों भी मन ही मन घबरा गए । पर जानते थे अगर जरा भी घबराहट दिखाई , तो राक्षस में कच्चा चबा जायेंगे ।
उन्होंने मुकाबला करना ही उचित समझा और नीचे दबे राजा को मारना पीटना , नोचना शुरू किया । उसकी यह हालत देखकर सभी राक्षस भाग खड़े हुए । अब राजा हाथ जोड़कर चीखने - चिल्लाना लगा- " मुझे माफ करो । मुझे मत मारो । मैं तुम्हें और बहुत सा धन दूँगा ।
पंडित ने उसको खूब डराया तुम्हरा जंगल में रखा हुआ धन हमारे किस काम का होगा उसे हमारे घर पहुँचाने का इंतजाम कर , नहीं तो हम तुझे छोड़ेंगे नहीं । " राक्षसों के राजा ने डरते - डरते दूर खड़े राक्षसों को बुलाया उन्हें बहुत - सा धन पंडित के घर पहुँचा देने के लिए कहा । राक्षसों ने तीन मित्रों के लिए ढेर सारा धन पंडित के घर पहुँचा दिया ।
पंडित ने सारे धन के तीन भाग किये और प्रसन्नता पूर्वक दोनों मित्रों को विदा दिया । तीरंदाज ने घर आकर पत्नी को सारा धन सौंपते हुए कहा " तुमने ठीक कहा था । मुझसे भी होशियार लोग इस दुनिया में हैं । अब मैं कभी अपने आप पर घमंड नहीं करूँगा ।