गरीबा लोहार की कहानी | Gareeb Ka Sapana

 

Gareeb Ka Sapana

बड़ी - सी फूल - पौधों की नर्सरी थी । वहीं बड़ा आलीशान घर था । बड़े - बड़े कमरे , आंगन , नौकर - चाकर और सामने बड़ा खूबसूरत बगीचा । घर के निकट बस्ती थी । सड़क के एक ओर फूल भरी नर्सरी और हमारा घर था । बस्ती की तरफ खुलने वाली खिड़की खोल लेती और सामने ही रह रहे लुहार परिवार को देखा करती । पति - पत्नी और दो पुत्र । आठ - दस वर्ष का गरीब मेरे आकर्षण का केन्द्र रहता । 

वह दिन भर कभी अपने पिता की सहायता करता , कभी घर और आसपास की सफाई करता । कभी अपने छोटे भाई को खिलाता रहता । कच्ची बस्ती से अन्य लड़कों की भाँति वह लड़ते या गाली - गलौज करते कभी नजर नहीं आते थे । रोज सुबह जब मेरे बेटे को लेने स्कूल की बस आती , तो मैं गरीबा को बस के पास खड़ा पाती । धीरे - धीरे उसकी और मेरे बेटे की जान पहचान हो गई । 

मेरा बेटा स्कूल बस में जाता और गरीबा उसका स्कूल बैग पकड़ा देता । फिर दोनों ओर से जोरदार ' बाय - बाय ' होती और स्कूल बस चल देती । एक दिन गरीबा की माँ मेरे पास आई और बताया कि गरीबा कई दिनों से कह रहा था कि भैया की मम्मी से मिलकर आना । मैंने कहा भेजतीं  तुम्हारा गरीबा अधिक समझदार है । तुम उसको स्कूल क्यों नहीं भेज देती 'कहाँ से भेजें बहन जी , स्कूल की फीस और किताबों का खर्चा कैसे पूरा कर पाएंगे ? 

गरीबा की माँ बोली । कुछ दिनों बाद गरीबा भी अपनी माँ के साथ मेरे पास आया । उसने हाथ जोड़कर मुझे नमस्ते की । “ गरीबा , आज तो तुम नए कपडे में खूब अच्छे लग रहे हो । मैंने कहा फिर । गरीबा की माँ बोल पड़ी आज गरीबा का Birthday है । यह आपका आशीर्वाद प्राप्त करने आया हुआ है । " मैंने फिर गरीबा को आशीर्वाद देते हुए कहा- " गरीबा आज मैं तुम्हें कुछ उपहार देना चाहती हूँ । बोलो , क्या लोगे ? " - " कुछ नहीं मम्मीजी , आपका आशीर्वाद ही बहुत है । 

मैं भैया की तरह उसकी बस में एक दिन के लिए स्कूल जरूर जाना चाहता हूँ । " मैंने सोचा - गरीबा कमीज , खिलौना या टॉफी मांगेगा , पर यह तो भैया की तरह बस में एक दिन के लिए स्कूल जाना चाहता है । उसे स्कूल भेज ही देना चाहिए । मैंने इसकी हाँ कर दी । कुछ दिनों बाद में स्कूल गई और गरीबा की इच्छा प्रधानाचार्य के आगे रखी । उन्होंने कहा- " कल बाल सभा का दिन है । आप कल ही गरीबा को भेज दीजिएगा । " घर आते ही मैंने गरीबा को बुलवा भेजा । 

जब उसे पता चला कि कल ही स्कूल जाना है , तो वह घबरा कर बोला- " मम्मी जी , मेरे पास कपड़े , जूते कुछ भी नहीं हैं । " " तुम जन्मदिन वाली कमीज पहन लेना । मेरे पास खेल के दो जोड़ी जूते हैं , तुम उन्हें पहन लेना । " - मेरा बेटा बोला ।  अगले दिन सुबह होते ही गरीबा नए-नए जूते और कमीज पहनकर आ जाता है। हर दस पांच मिनट बाद वह समय पूछता रहता है। बस वह घड़ी आ ही गयी । दोनों बच्चे दौड़कर बस में चढ़ गए । गरीबा ने थोड़ा शरमाकर पास खड़ी माँ की तरफ हाथ हिलाकर बोला - " बाय - बाय माँ । " और बस चल दी

 बाल सभा में कई बच्चों ने भाग लिया । फिर प्रधानाचार्य ने गरीबा को बुलाया और कहा- " तुम , भी कुछ सुनाओ । " गरीबा ने राजस्थानी गीत गाकर सबका मन मोह लिया । तरह - तरह के पशु पक्षियों की बोलियाँ बोलीं और बच्चों से बोलियाँ पहचानने को कहा । सभी बच्चे और अध्यापक गरीबा पर मोहित हो गए । में प्रधानाचार्य ने उसे निःशुल्क अपने स्कूल में पढ़ने को कहा । पर गरीबा ने कहा- " नहीं , मैं रोज नहीं आ सकता - बाबा की मदद को भी तो कोई चाहिए । 

आपने मुझे एक दिन आने दिया । मैं आपका बहुत आभारी हूँ । मैं वास्तव में यह देखना चाहता था कि जब और बच्चे बस में स्कूल आते हैं तो उन्हें कैसा लगता होगा "बस की हार्न की आवाज जब मेरे कानों में पड़ी तब मैं घर से बाहर निकल पडी  । बस रुक गई , पहले तो मेरा बेटा उतरा फिर गरीबा उतरी । दोनों के चेहरे खिल उठे थे । दोनों ने पलटकर बस की ओर देखा और हाथ हिला दिया । सभी बच्चे चिल्लाए- “ गरीबा - गरीबा फिर स्कूल में आना । गरीबा ने केवल हाथ हिला दिया । बोला कुछ नहीं । उसने एक नजर मुझ पर डाली । फिर वह अपने झोंपड़ी की ओर चला गया - अपने पिता के काम में हाथ बँटाने के लिए ।



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