राजा विचित्रसेन की कहानी | Munh Maanga Enaam

 


एक था राजा विचित्रसेन । था भी वह बहुत विचित्र । ऊटपटांग बातें सोचता और आदेश दे डालता । उसकी सनक की कोई थाह न थी । एक बार उसने ढिंढोरा पिटवाया- " जो आदमी राज्य के सबसे बड़े मूर्ख को दरबार में लाएगा , उसे मुँहमाँगा इनाम मिलेगा । " यह सुनकर लोगों में होड़ लग गई । लोगों का मूखों को लेकर दरबार में आना शुरू हो गया । 

राजा उनकी कारगुजारी सुनता  हँसता लोटपोट होता । लेकिन रटा हुआ निर्णय सुनाता- यह तो सामान्य सी मूर्खता हुई । भाग जाओ यहाँ से  लोग मन मसोस कर लौट जाते थे । एक दिन एक साधु दरबार में आया । राजा उसे देखकर हँसा बोला- क्या तुम्हीं मूर्ख हो और खुद अपनी कारगुजारी सुनाओगे नहीं महाराज  मैं तो कारगुजारी सुनाने आया हूँ ।  मूर्ख को साथ क्यों नहीं लाए  राजा बोला । साधु ने उत्तर दिया वह मूर्ख यहीं है महाराज  उसका नाम आपको एक शर्त पर बताऊँगा । 

क्या शर्त है तुम्हारी  मूर्ख की कारगुजारियाँ सुनने के बाद ही आप कोई निर्णय लेंगे  मुझे मंजूर है । बताओ कौन है वह मूर्ख और सुनाओ उसके कारनामे । साधु बोला-  वह मूर्ख कोई और नहीं  स्वयं आप हैं  मैं ! तुमने मुझे मूर्ख कहा  राजा की आँखों से चिंगारियाँ फूट पड़ीं । साधु बोला- महाराज आप वचन दे चुके हैं कि मूर्ख की कारगुजारियाँ सुनने के बाद ही आप कोई निर्णय लेंगे !  राजा क्रोध का घूंट पीकर रह गया । बोला जल्दी सुनाओ  साधु ने कहा महाराज  आप अपना राज - काज भूलकर बेकार के तमाशों में खुद को उलझाए हुए हैं । लोग मूर्खता के मनदंत किस्से आपको सुनाते हैं । 

खेतों की फसलें सूख रही हैं । चोर - उचक्के मौके का फायदा उठा रहे हैं । पड़ोसी राजा ने हमारे राज्य पर आक्रमण करने का पूरा मन बना लिया है ।  यह कहकर साधु चुप हो गया । राजा का क्रोध उतर गया था । उसने गंभीर होकर कहा हाँ , वास्तव में मुझसे बड़ा मूर्ख कोई और नहीं । माँगो , अपना मुँहमाँगा इनाम माँगो । मैं आपसे राज्य माँगता हूँ  साधु बोला । यह सुन , दरबार में घबरा गया । भारी मन से राजा ने कहा मैं अपना राज्य आपको सोता हूँ साधु ठहाका मारकर हँस पड़ा । बोला- महाराज , आपने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि मुँहमाँगे इनाम के रूप में कोई आपसे आपका राज्य भी माँग सकता है ।

यह सब आपके बिना सोचे - विचारे लिए गए निर्णयों का फल है । मुझे राज्य नहीं चाहिए । राज्य आपका है , आपकाही रहेगा । यह कहकर साधु चल दिया । यह देख , राजा हक्का - बक्का रह गया । उसने साधु के चरण पकड़ लिए । कहा- आपने मेरी आँखें खोल दीं । मैं आपको नहीं जाने दूँगा । आप यहीं , मेरे साथ रहें । यदि आप मेरी बात मान लें तो में समझँगा कि आपने मेरी गलतियों को माफ कर दिया है । यह सुनते ही साधु के कदम वहीं रुक गए ।

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