बंदर राक्षस गोपाल की कहानी | बंदर के कारनामे

monster's treasure


उसका नाम था गोपाल । उसके पिता मामूली नौकरी करते थे । घर में माँ के अतिरिक्त दो छोटे भाई - बहन और थे । गोपाल एक पाठशाला में पढ़ता था । समय मिलता तो घर में माँ का हाथ बंटाता । गोपाल की उम्र थी कोई दस वर्ष । वह हंसमुख था । गली - मुहल्ले वाले कहते - ' बच्चा हो तो ऐसा , सदा मुसकराता रहता है । ' उसे देखकर दूसरों की उदासी भी भाग जाती थी । 

एक दिन गोपाल को उसकी माँ ने कहीं काम से भेजा । गोपाल चला जा रहा था , तभी उसकी नजर एक बंदर पर पड़ी । बंदर के गले में एक रस्सी बंधी थी । रस्सी का दूसरा सिरा एक खंभे से बंधा हुआ था । गोपाल के कदम रुक गए । उसे लगा कि बंदर को इस तरह बांधकर रखना गलत है । उसने इधर - उधर देखा , फिर आगे जाकर खंभे से बंधी रस्सी खोल दी । फिर उसके गले में बंधा सिरा भी निकाल दिया । 

बंदर मुक्त होते ही पेड़ पर चढ़ गया । इतने में ही बंदर वाला वहाँ आ गया । उसने बंदर को न देखा , तो चिल्लाने लगा- " मेरा बंदर कहाँ गया ? तभी उसी पेड़ पर बैठा बंदर खों खों चीखने लगा   जैसे लग रहा था उसे देखकर चिढ़ रहा हो । फिर वह आदमी उस बंदर को पकड़ने के लिए उसी पेड़ पर चढ़ने लगता है । तब तक बंदर एक पेड़ से दूसरे पेड़ पर कूद गया । यह देखकर  गोपाल खूब हंसा । और फिर वह आगे चल दिया । तभी एक बंदर पेड़ से उसके आगे कूदा । उसके अगले ही पल वह गोपाल के कंधे पर चढ़ गया यह सब देख गोपाल घबरा गया । 

तभी उसके कानों में एक आवाज आई- " घबराओ मत ! तुमने मुझे कैद से आजाद किया है । मैं और तुम दोस्त बन गए हैं । " गोपाल ने देखा , बंदर मनुष्य की आवाज में बोल रहा है । वह हैरान रह गया । कुछ समझ पाता , इससे पहले ही बंदर कूदकर फिर पेड़ पर चढ़ गया । अब तो बंदर रोज गोपाल के पास आने लगा । एक बार गोपाल के पिता बीमार हो गए । काम पर नहीं गए तो पैसे नहीं मिले । घर में खाना नहीं बना । सब परेशान हो गए । गोपाल उदास मुँह लिए घर के बाहर खड़ा था , तभी बंदर आया । उसने एक सेब गोपाल के हाथ में पकड़ा दिया । 

फिर दौड़ - दौड़ कर फल लाने लगा । थोड़ी देर में बंदर ने गोपाल के घर के बाहर फलों का ढेर लगा दिया । पर गोपाल ने फल नहीं उठाए । बंदर ने कहा- " गोपाल , फल खा लो । " पहले बताओ , ये चोरी के तो नहीं ? " - गोपाल ने पूछा । " नहीं , मैं चोरी नहीं करता । किसी से छीनकर नहीं लाया । मैं देख रहा हूँ , तुम्हारे पिता बीमार हैं । वह नौकरी पर नहीं जा सकते । इससे घर में परेशानी है । ठहरो , मैं कुछ करता हूँ । कहकर बंदर उछलता हुआ चला गया । गोपाल सोच रहा था - ' भला बंदर क्या करेगा ? ' बंदर वहाँ से जंगल में चला गया । 

वहाँ पहाड़ी में एक गुफा थी । गुफा में रहता था एक राक्षस । गुफा में सोने के सिक्कों से भरा एक मटका था । राक्षस थोड़ी - थोड़ी देर बाद उसका ढक्कन हटाकर चमचमाते सिक्के देखता , फिर कहता- " मैं दुनिया का सबसे अमीर हूँ । " राक्षस देखने में भयानक लगता था , पर उसने कभी किसी से कुछ नहीं कहा था । वह सदा गुफा में ही रहता था । बस , कभी - कभी रात को बाहर आता था - तब जब आसपास कोई नहीं होता था ।

 बंदर को राक्षस की गुफा का रहस्य मालूम था । वह गुफा में गया तो राक्षस सोने के सिक्के हवा में उछालता हुआ कह रहा था ।- " में दुनिया में सबसे अमीर हूँ । " बंदर ने देखा और उसी समय एक योजना बना ली । राक्षस के पास जाकर बोला- " मामा , प्रणाम ! " राक्षस ने चौककर देखा , तो सामने बंदर था । बोला- " बोलने वाला बंदर अपने को मेरा भांजा बता रहा है । मैं किसी का मामा नहीं बंदर ने कहा- " मामा जी , आप भूल गए । आपने मुझे मामी की खोज में भेजा था । मैं पता लगाकर आ रहा हूँ । " हाँ , मेरी शादी नहीं हुई है अब तक । मैंने कई साथियों से कहा है कि वे मेरे लिए कोई लड़की ढूँढ़ दें । शायद कभी तुझसे भी कह दिया हो । 

राक्षस ने कहा । बंदर समझ गया - ' बड़े डीलडोल वाला और खजाने से मालामाल यह राक्षस कुछ मूर्ख है । अगर मेरी चाल सफल हो गई तो गोपाल के माता - पिता की गरीबी दूर हो जाएगी । मेरा दोस्त आराम से रहेगा ।  

बंदर बोला- " मामाजी , आप दुनिया में सबसे धनवान राक्षस हैं । आपकी शादी तो धूमधाम से होनी चाहिए । " राक्षस खुश होकर बोला- " बता , लड़की कहाँ है । मुझे क्या करना होगा ? " बंदर ने देखा , मामला बन रहा है । उसने कहा- " मामाजी , लड़की वाले गरीब हैं । वह लड़की के लिए गहने - कपड़े नहीं बनवा सकते । अगर आप कुछ मदद कर देते चिंता राक्षस ने झट कुछ सिक्के बंदर को दिए । बोला- " तुम कुछ न करो । तुम गहने - कपड़े बनवाना शुरू करो । शादी का मुहूर्त निकलवाओ । " अगले दिन आने का वादा करके बंदर गोपाल के पास पहुँचा 

उसे सिक्के देकर कहा- " ये अपने पिता जी को दे दो । उनसे कहो , बाजार जाकर अच्छे कपड़े और जरूरी सामान ले आएँ । कोई चिंता न करें । " गोपाल ने सिक्के लेने से मना किया तो बंदर घर में चला गया । जैसे ही गोपाल के पिता ने बंदर को देखा , वह सकपका गए । बंदर ने उन्हें सारी बात समझा दी । कहा- " राक्षस मूर्ख है । अब आपकी गरीबी दूर हो जायेगी । " राक्षस का नाम सुनकर गोपाल के माँ - बाप घबरा गये । बंदर ने कहा- " मुझे साधारण बंदर न समझें । राक्षस आपका बाल भी बांका नहीं कर सकेगा । मैं सब संभाल लूँगा । 

उस दिन के बाद से गोपाल के परिवार के दिन फिर गए । अब उन्हें कोई परेशानी न रही । बंदर रोज राक्षस के पास जाता और उसे भावी पत्नी के बारे में समझा - बुझाकर सोने के सिक्के ले आता । एक दिन राक्षस ने कहा- " भांजे , शादी की बात चलते हुए बहुत दिन हो गए । अब तो विवाह हो जाना चाहिए । मैं और प्रतीक्षा नहीं कर सकता है 

मैं बंदर तो पूरी योजना पहले ही बता चुका था । उसने कहा- " ठीक दुल्हन को यहाँ ले आऊँगा , लेकिन आपको कुछ सावधानी बरतनी होगी । " " कैसी सावधानी ? " - राक्षस ने पूछा । बंदर बोला- " मामा , आपकी सूरत भयानक है । मेरे अलावा कोई दूसरा आपको देखकर तुरन्त बेहोश हो जायेगा । हो सकता है उसके प्राण ही निकल जाएँ । मैं यही सोच रहा हूँ 

अगर आपकी सूरत देखकर मामी जी को कुछ हो गया तो, बंदर की बातो को सुनकर राक्षस सोच में पड़ जाता है । लेकिन यह वह भी जानता था कि हमारी सूरत देखने में बहुत भयानक है  तब जाकर राक्षस बोला अब मुझे क्या करना चाहिए ? ऐसे में  तो मेरी शादी कभी नहीं हो पायेगी । तब बंदर ने परेशान स्वर में बोला है कि आप राक्षस हैं , लेकिन मन के बहुत अच्छे हैं । 

इसीलिए वह शादी  बंदर बोला- " मैंने लड़की को आपके बारे में इतना तो बता दिया करने को तैयार हो गई है । " राक्षस ध्यान से चतुर भांजे की बात सुन रहा था । बंदर ने आगे कहा- " आप गुफा की सफाई कराइए , फिर मैं दुल्हन को ले आऊँगा । ओट से देखते रहना । मैं कहे देता हूँ अगर आपने हड़बड़ी मचाई और आप एकदम सामने मत आना । एक दिन इंतजार करना । दरवाजे की तुरन्त सामने आ गए तो हो सकता है हमारी होने वाली मामी डर जाए । कहीं उसके प्राण ही न निकल जाएँ । ” 

राक्षस ने कहा- " मैं वैसा ही करूँगा जैसा तुम कह रहे हो । एकदम दुल्हन के सामने नहीं आऊँगा । बस , तुम दुल्हन को कल गुफा में ले आओ । " बंदर तुरन्त गोपाल के पिता के पास गया । बोला- “ अब राक्षस का सारा खजाना प्राप्त करने का समय आ गया है । " फिर उसने समझा दिया कि कैसे क्या करना है । 

गोपाल के पिता एक स्त्री की काष्ठ प्रतिमा खरीद कर लाए । उसे सुंदर वस्त्र - आभूषण पहना दिये गये फिर ये लोग प्रतिमा को राक्षस की गुफा की तरफ ले गए । इन लोगों को पीछे रोककर बंदर राक्षस के पास गया । बोला- " मामा , बधाई हो , दुल्हन आ रही है । आप छिप जाइए । " राक्षस दूसरी जगह जाकर छिप गया । गोपाल के पिता ने लकड़ी की सजी - धजी प्रतिमा गुफा में एक जगह रख दी । दूर से देखने पर वह जीती - जागती औरत लगती थी ।

 राक्षस आया और गुफा की दीवार के एक छेद से अंदर देखने लगा । दूर से लकड़ी की प्रतिमा को उसने भी सचमुच की दुल्हन समझा । वह कुछ देर तो प्रतीक्षा करता रहा , पर जब अधिक सब्र न हुआ तो गुफा में चला आया । जैसे ही राक्षस ने हाथ लगाया , लकड़ी की प्रतिमा जमीन पर गिर पड़ी । बंदर तो एक तरफ छिपा यह सारा दृश्य देख ही रहा था । उसने चिल्लाकर कहा- " मामा , यह क्या कर डाला आपने ? आपकी शक्ल देखते ही डर के मारे मामी के तो प्राण ही निकल गए । " अपनी होने वाली दुल्हन को यों जमीन पर पड़ी देख , मूर्ख राक्षस दुखी हो गया । 

बोला-भांजे  अब हमको क्या करना ठीक रहेगा बंदर झट बोल पड़ा यह जगह छोड़कर कहीं और चले जाओ । वरना इस लड़की का भूत तुम्हें परेशान करता रहेगा । " बंदर की बात सुनकर मूर्ख राक्षस बुरी तरह घबरा गया । उसने बंदर से कहा- " भांजे , इस घटना के बारे में किसी को कुछ मत बताना । मैं सदा के लिए यह जगह छोड़कर जा रहा हूँ । " कहकर राक्षस वहाँ से चला गया , फिर कभी नहीं आया । 

उसका खजाना गोपाल के पिता को मिल गया । अब वे लोग बड़े ठाठ से रहने लगे । बंदर बीच - बीच में आकर उनके हालचाल पूछ जाता था और राक्षस के बारे में पूछने पर कहता था- " वह मूर्ख राक्षस अब कभी लौटकर नहीं आएगा । " और सचमुच फिर कभी नहीं आया ।


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