सोनप्यारी के दो बेटे थे , शेखू और लेखू । दोनों अभी बहुत छोटे थे । सोनप्यारी मेहनत कर बेटों का पेट पाल रही थी । एक बार सोनप्यारी बहुत बीमार हो गई । उसका काम पर जाना बंद हो गया । दवाइयों की बात तो दूर रही , भूखों मरने की नौबत आ गई । शेखू और लेखू पर जिम्मेदारी आ गई । शेखू को भूख से अधिक माँ की चिंता थी ।
वह चाहता था कि उसे कहीं से कुछ रुपए उधार मिल जायें तो वह माँ का इलाज करवा ले । पर उसे किसी ने एक फूटी कौड़ी भी उधार नहीं दी । वह बहुत परेशान था कि आखिर क्या करे ? शेखू से माँ की हालत देखी नहीं जा रही थी । उधर लेखू का भूख के मारे बुरा हाल था । माँ का शरीर तवे की तरह तप रहा था । तेज बुखार में वह ऊल - जलूल बड़बड़ा रही थी ।
वह दौड़कर पड़ोसी रम्मत चाचा के घर गया । वहाँ जाकर दुःखी मन से उसने कहा- " चाचा , घर चलकर देखो , माँ की हालत ठीक नहीं है । " रम्मंत चाचा तुरन्त दौड़कर शेखू के घर आए । बोले- " बेटे , तेज बुखार है । ठण्डे पानी की पट्टियाँ सिर पर रखो । फिर किसी डाक्टर को दिखाओ । " दोनों भाइयों ने मिलकर ठण्डे पानी की पट्टियाँ चढ़ाई । बुखार तनिक हल्का हुआ तो माँ को होश आ गया ।
दोनों बेटे माँ से चिपटकर रोने लगे । उन्हें धीरज बँधाती माँ अपनी बेबसी पर रो रही थी । आखिर शेखू ने कहा- “ माँ चिंता न करो । मैं मेहनत - मजदूरी करूँगा और तुम्हारा इलाज करवाऊँगा । " तुम अभी बहुत हिम्मत जुटाते हुए सोनप्यारी बोली- " नहीं बेटे , छोटे हो । तुम्हें कौन काम देगा ?
शेखू ने हठ करते हुए कहा- " नहीं माँ , जब तक तुम ठीक नहीं हो जातीं , घर पर रहकर आराम करोगी । में कमाऊँगा और तुम्हारा इलाज करवाऊँगा । " बेटे की बात सुनकर माँ की आँखों में पानी भर आया । वह जानती थी कि शेखू की अभी उम्र ही क्या है ! उसे कौन काम देगा ? मन - ही - मन भगवान को याद कर वह बुदबुदाई- ' भगवान , मेरे बच्चों की रक्षा करना । ' घर में थोड़ा - सा आटा था । इतना नहीं कि उसकी रोटियाँ बन सकें ।
शेखू ने आटा पानी में घोला और उसे पका लिया । उसे लेखू को खिलाया । और समझाते हुए कहा- “ लेखू , में काम की तलाश में जा रहा हूँ । शाम को लौटकर तुम्हें खाना खिलाऊँगा । तब तक तुम माँ के पास रहना । यदि बुखार तेज हो जाए , तो पानी की पट्टी सिर पर रख देना । " शेखू सुखवीर बढ़ई के कारखाने पर गया ।
माँ की बीमारी की बात बताकर उसने काम माँगा । सुखवीर बोला बेटे अभी तुम बहुत छोटे हो हमारे पास तुम्हारे लायक कोई काम पर्याप्त नहीं है हाँ तुम कुछ मुझसे रुपये ले जाओ और जाकर अपनी माता का इलाज करवा लेना । शेखू ने कहा- बढ़ई दादा हमें केवल मजदूरी चाहिए भीख नहीं । आपके दिए हुए भीख से काम कैसे चलेगा हमें मेहनत तो करनी ही पड़ेगी । उसकी बातो को सुनकर सुखबीर बहुत प्रभाभित हुआ ।
शेखू को कुल्हाड़ी थमाते बोला- " बेटे , तुम्हारी माँ के इलाज का प्रबंध कर रहा हूँ । तुम निश्चित होकर जंगल में जाओ और लकड़ियाँ काटकर ले आओ उसने बढ़ई दादा को धन्यवाद दिया और जंगल की ओर चल पड़ा । सही पेड़ की तलाश में वह इधर - उधर घूम रहा था । चारों ओर हरे - भरे पेड़ नजर आ रहे थे । वह चाहता था कि कोई सूखा पेड़ मिल जाए तो उसे काटा जाए
आखिर दूर जाकर उसे एक सूखा पेड़ मिला । उसी पेड़ को काटना तय किया । उस पेड़ पर एक यक्ष रहता था । सबको इस बात का पता था । इसीलिए उस पेड़ को कोई नहीं काटता था । पर शेखू को यह मालूम नहीं था । उसने पेड़ को काटना शुरू कर दिया । ठक - ठक की आवाज सुनकर यक्ष ने इधर - उधर देखा । उसने पाया कि एक छोटा - सा लड़का पेड़ पर कुल्हाड़ी चला रहा है । उसे बहुत क्रोध आया । पर छोटा बच्चा जानकर यक्ष ने उसे समझाना ही ठीक समझा । यक्ष बोला- " बालक , यह पेड़ मेरा है । तुम इसे मत काटो । " आवाज सुनकर शेखू चौंका । इधर - उधर देखा । पर कोई भी दिखाई नहीं दिया ।
उसने इसे मन का भ्रम मानकर फिर अपना काम शुरू कर दिया । कुल्हाड़ी का वार करते ही फिर वही आवाज गूँजी ' सुना नहीं तुमने , मैं क्या कह रहा हूँ ? ' शेखू ने फिर इधर - उधर देखा । पर कहीं कुछ भी नजर नहीं आ रहा था । जिधर से आवाज आ रही थी , उधर मुँह करके वह जोर से बोला- " मैं उस आदमी की बात नहीं मानता , जो छिपकर बोले । तुम्हें जो कहना है , सामने आकर कहो । ” यक्ष उसे आसानी से सबक सिखा सकता था । पर बालक की हिम्मत पर उसे आश्चर्य हुआ ।
यक्ष ने उसके सामने आने का निश्चय किया । वह पेड़ से उतरा और उसके पास गया । उसने अपना परिचय देते हुए कहा- “ मैं यक्ष हूँ । इस पेड़ पर रहता हूँ । तुम यह पेड़ मत काटो । कोई दूसरा पेड़काट लो शेखू ने उससे विनम्रतापूर्वक कहा- " यह सच है कि आप यहाँ रहते हैं । पर मेरी विनती है कि आप इस पेड़ को छोड़कर किसी अन्य पेड़ पर चले जाएँ । मैं किसी अन्य पेड़ पर क्यों चला जाऊँ ? तुम क्यों नहीं दूसरा पेड़ काट लेते ?
यक्ष ने पूछा अन्य पेड़ हरे - भरे हैं । यह पेड़ सूखा है । इसीलिए आप यह पेड़ मेरे छोड़ दें । " - शेखू ने कहा । यक्ष शेखू की बात से संतुष्ट था , फिर भी वह उसे दूसरा पेड़ काटने के लिए समझाता रहा । पर शेखू नहीं माना । वह बोला- " हरा भरा पेड़ काटना पाप है जबकि सूखा पेड़ मरे हुए की तरह होता है । अब आप ही बताओ यक्षजी , मैं यह पाप कैसे कर सकता हूँ ? " छोटे - से बालक की समझदारी और दृढ़ता से यक्ष बहुत प्रभावित हुआ । उसने कहा- “ बेटे , तुम बहुत छोटे हो । तुम्हारी इतनी उम्र नहीं है कि तुम लकड़ी काटने जैसा कठिन काम करो यह कुछ भी मुश्किल नहीं है । घर में मेरी माँ बीमार है । वह मौत से लड़ रही है ।
मुझे लकड़ियाँ काटकर बढ़ई दादा से मजदूरी लेनी है , ताकि माँ का इलाज करवा सकूँ । प्रार्थना है कि आप मुझे मेरा काम करने दें । शेखू बोला । यक्ष ने पूछा- " यदि मैं तुम्हारी माँ को ठीक कर दूँ , तो तुम्हें लकड़ी काटने की जरूरत नहीं होगी ? मेरी माँ को स्वस्थ कर दें तो यह आपकी कृपा होगी । पर लकड़ियाँ तो फिर भी काटनी होंगी । घर में खाने के लिए अन्न का एक दाना नहीं है । छोटा भाई भूख से तड़प रहा है , में भी भूखा हूँ ।
मेहनत नहीं करूंगा तो कैसे काम चलेगा ? " - उसने कहा । यक्ष ने लालच देते हुए कहा- " यदि में तुमको इतना धन दे दूँ तुम आराम से गुजारा कर सको , तब तो इस पेड़ को नहीं काटोगे ? " लालच ठुकराते हुए शेखू बोला- " बस करो यक्ष बाबा , बस करो । जाओ , अपना काम करो और मुझे भी काम करने दो । मुफ्त का माल मुझे न हीं चाहिए । मैं मेहनत करना अधिक पसंद करता हूँ
यक्ष को एक बालक के मुँह से इस तरह के जवाब की आशा नहीं थी । वह उसकी ईमानदारी एवं मेहनती स्वभाव के कारण बहुत खुश हुआ । उसने शेखू से कहा- " बेटे , जब घर लौटोगे , तब तुम्हारी माँ एकदम स्वस्थ मिलेगी । मैं आपकी बात पर विश्वास कैसे कर लूँ ? - शेखू ने कुछ संकोच से कहा । भोले शेखू की बात सुनकर यक्ष हंस दिया । बोला- " अचल्छा , तुम एक पल के लिए अपनी आँखें बन्द करो । फिर खोलकर देखो , तो तुम्हें मेरी बात पर विश्वास हो जाएगा ।
शेखू ने आँखें मूँद लीं , फिर तुरन्त खोलकर देखा , तो चौंक पड़ा । वह अपने घर के बाहर खड़ा था । अंदर से माँ की आवाज आ रही थी । शेखू दौड़कर माँ से लिपट गया । उसके कानों में लेखू की आवाज आई " भैया , घबराने की कोई बात नहीं , माँ की तवीयत तो जैसे जादू से ठीक हो गई है । " शेखू ने माँ को पूरी बात बताई तो वह भी हैरान रह गई । उसने कहा- " बेटा , तू जो कुछ बता रहा है , उसमें सच्चाई लगती है मुझे । कुछ देर पहले तक मुझे तेज बुखार था ।
लेकिन फिर जैसे जादू हो गया । बुखार और दर्द जाते रहे । मेरे अन्दर जैसे नई ताजगी भर गई है । जैसे मैं कभी बीमार हुई ही न थी । " अगले दिन शेखू माँ और लेखू को जंगल में ले गया , जहाँ सूखा पेड़ था । सब तरफ सन्नाटा था । तीनों ने आँखें मूंदकर हाथ जोड़ लिये । उस दिन के बाद से तीनों का जीवन सुख से बीतने लगा ।