प्राचीन समय में वज्रांग नाम का एक महाबली दैत्य था । दैत्य होते हुए भी वह शांतिप्रिय था । एक दिन वह अपनी पत्नी वरांगी के साथ तप करने वन में चला गया । वज्रांग जब तपस्या में लीन था , तो देवराज इंद्र ने वरांगी को अनेक यातनाएँ दीं । वज्रांग की समाधि टूटी , तो वरांगी ने पति को इंद्र की यातनाओं के बारे में बताया ।
वह प्रार्थना करने लगी- " नाथ , आप इंद्र से मेरे अपमान का बदला लीजिए । " वज्रांग बोला- " प्रिये , धैर्य रखो । समय पर सब ठीक हो जाएगा । " समय बीता । एक दिन वरांगी ने पुत्र को जन्म दिया । उसका नाम तारक रखा गया । वज्रांग ने पुत्र को अस्त्र - शस्त्र चलाने की विद्या सिखाई । तारक शक्तिशाली बन गया ।
सभी दैत्य उसकी शक्ति का लोहा मानने लगे । दैत्यों ने उसे अपना राजा बना लिया । एक दिन वरांगी ने तारक से कहा- " पुत्र , अब समय आ गया है कि तुम अपनी माँ का अपमान करने वाले से बदला लूंगा माता आपको अपमानित किसने किया हम उस दुराचारी आततायी का सिर काटकर आपके चरणों में डाल दूँगा । गुस्से से तारक बोला ।" बेटा , तुम्हारा शत्रु देवराज इंद्र है । उस पर विजय पाने के लिए तुम्हें तप करना होगा ।
वरांगी ने उत्तर दिया । “ माता जी , आप चिंता न करें । मैं इंद्र से बदला लेने के लिए कठोर तप करूँगा । ऐसा बोलकर तारक तप करने वन की तरफ में चला पड़ता है । तारक ने वन में उस वक्त कई वर्षों तक कठोर से कठोर तप किया । एक बार ऐसा भी हुआ जब उसकी तपस्या से खुश होकर श्री ब्रह्माजी प्रकट हुए । वह बोले- वर माँगो वत्स ! तारक ब्रह्माजी को सामने पाकर प्रसन्न हुआ ।
ब्रह्माजी को प्रणाम करते हुए बोला- " प्रभो , मैं कभी मृत्यु को प्राप्त न होऊँ । आप ऐसा बर प्रदान करें । " ब्रह्माजी ने कहा- " वत्स , जो संसार में पैदा होता है , एक दिन उसकी मृत्यु अवश्य होती है । मैं तुम्हें ऐसा वरदान नहीं दे सकता । तारक बोला- " प्रभो , आप ऐसा वर तो दे ही सकते हैं कि मैं छोटे बच्चे के अलावा किसी अन्य प्राणी द्वारा न मारा जाऊँ । " तथास्तु ! " - कहकर ब्रह्माजी अदृश्य हो गये ।
ब्रह्माजी से वरदान पाकर तारक उदंड हो गया । उसने दैत्य सेना का संगठन किया और एक दिन देवताओं पर धावा बोल दिया । भयंकर युद्ध हुआ । अनेक देवता घायल हो गए और कुछ इधर - उधर छिप गए । तारक ने कालनेमि नामक राक्षस को आदेश दिया- " छिपे हुए देवताओं को ढूँढ़कर हमारे सामने ले आओ । " यह सुन , कालनेमि देवताओं को पकड़ने चल दिया ।
कुछ ही देर में कालनेमि ने इंद्र सहित अनेक देवताओं को तारक के सामने ला खड़ा किया । तारक ने अपनी माँ को दरबार में बुलवाया । माँ के आने पर तारक बोला- " माता जी , आपका अपराधी आपके सामने खड़ा है । जैसा चाहें , वैसा इसे दंड दें ।
" वरांगी ने कहा- " बेटा , प्रसिद्ध व्यक्ति का अपमान उसके वध से भी अधिक दुःखद होता है । इसलिए इंद्र का मुंडन कर छोड़ दिया जाए । " जो आज्ञा माताजी । " - तारक बोला । तारक ने सैनिकों को वैसा ही करने के लिए कहा । सैनिकों ने इंद्र मुंडन कर , उन्हें छोड़ दिया । जब इंद्र देवलोक पहुँचे , तो देवता इंद्र की दशा देखकर बहुत दुखी हुए ।
इंद्र भी कम दुखी न थे । देवता इंद्र सहित ब्रह्माजी की शरण में गए । उन्होंने दैत्यों के अत्याचारों के बारे में ब्रह्माजी को बताया । ब्रह्माजी ने उन्हें धैर्य बंधाया । बोले- आप सभी देवलोक को लौट जाइए । मैं जल्दी ही कोई ना कोई रास्ता अवश्य निकालूँगा ।प्रभो ! हमें आखिर कब तक धैर्य धारण कर के रहना होगा ? इंद्र ने पूछा कुछ देर सोचकर ब्रह्माजी बोले- " आप लोगों को शंकरजी के पुत्र - जन्म तक प्रतीक्षा करनी होगी । केवल उनका पुत्र ही तारक का वध कर सकता है ।
ब्रह्माजी का कहा मान देवता लौट गए । देवताओं के जाते ही ब्रह्माजी ने रात्रि का स्मरण किया । कुछ देर बाद रात्रि उनके सामने खड़ी थी । ब्रह्मजी ने कहा- " निशा , तुम्हें पार्वती की कुछ समय के लिए सहायिका बनना होगा । " रात्रि ने कहा- " प्रभो ! आपका जैसा आदेश होगा , उसका मैं पालन करूँगी । " ब्रह्माजी ने उसे सारी बातें समझा दीं । रात्रि में ब्रह्माजी को प्रणाम किया और वहाँ से चली गई ।
ब्रह्माजी के आदेश से रात्रि ने हिमालय की पत्नी मेनका के घर पुत्री रूप में जन्म लिया । जब वह युवती बन गई तो इंद्र नारद से कहा नारद जी आप पर्वतराज हिमालय के पास चले जाइए । वहाँ आप हिमालय को अपनी बेटी का विवाह श्री हरी भगवान शंकर से करने के लिए प्रेरित करिये जो आज्ञा देवराज ! ऐसा कहकर नारदजी वहाँ से चलकर हिमालय के पास आए ।
पर्वतराज हिमालय नारद जी को अपने द्वार पर देखकर हैरान हो गए । उन्होंने उनका स्वागत - सत्कार किया । हिमालय की पत्नी मेनका और पुत्री पार्वती ने भी नारद जी को आकर प्रणाम किया । हिमालय नारद जी से बोले- " भगवन , आप बेटी पार्वती के भविष्य के बारे में कुछ बताइए । हमें इसकी बड़ी चिंता है । " नारदजी को मुँहमागी मुराद मिल गई । वह बोले- " पर्वतराज , पार्वती बहुत भाग्यशाली हैं । यह भगवान शंकर की पत्नी बनेंगी । " यह सुन , हिमालय बहुत प्रसन्न हुए । उन्होंने नारद जी को आदर पूर्वक विदा किया ।
उधर इंद्र ने कामदेव को भगवान शंकर के पास भेजा ताकि वह भगवान शंकर को विवाह के लिए राजी कर सके । कामदेव ने अपना प्रभाव दिखाया । भगवान शंकर की समाधि टूट गई । शंकर बहुत क्रोधित हुए । उन्होंने कामदेव का अंत कर दिया । पार्वती को इस बात का पता चला , तो उन्होंने भगवान शंकर को प्रसन्न करने का निश्चय किया । वह घोर तपस्या करने लगीं । कई वर्ष बीत गए ।
एक दिन सप्त ऋषियों ने उन्हें आशीर्वाद दिया- " पुत्री , तुम जिनके लिए इतना कठोर तप कर रही हो , वह तुम्हें वर रूप में अवश्य प्राप्त होगी । " पार्वती की खुशी का ठिकाना न रहा । सप्त ऋषि भगवान शंकर के पास पहुँचे । उन्होंने शंकरजी को पार्वती के कठोर तप के बारे में बताया । सप्त ऋषियों के समझाने पर भगवान शंकर पार्वती से विवाह करने को तैयार हो गए ।
एक दिन दोनों का विवाह हो गया वे मंदरगिरि पर रहने लगे । कुछ वर्ष बाद पार्वती ने पुत्र को जन्म दिया । उसका नाम कार्तिकेय रखा गया । बालक अत्यंत शक्तिशाली और पराक्रमी था । एक बार शंकर और पार्वती चौपड़ खेल रहे थे । पार्वती खेल में पारंगत थीं । उन्होंने शंकर को हरा दिया । शंकरजी ने कार्तिकेय को अपनी तरफ मिला लिया और विष्णुजी का नाम लेकर पासा पैका । शंकरजी जीत गए । पार्वती शंकरजी की चाल समझ गई । उन्होंने कार्तिकेय को शाप दे दिया । तुम कभी जवान नहीं होगे , सदा बालक बने रहोगे ।
यह सुन कार्तिकेय ने क्षमा माँगी । फिर पार्वती ने कहा- " मेरा शाप तो व्यर्थ नहीं जा सकता लेकिन तुम छोटे होते हुए भी वह काम कर दिखाओगे जो बड़े - बड़े नहीं कर पायेंगे । " एक दिन देवताओं ने अग्निदेव को शंकर और पार्वती के विवाह का परिणाम जानने को भेजा । अग्निदेव ने मंदरगिरि से लौटकर देवताओं को बताया शंकरजी के यहाँ पुत्र उत्पन्न हुआ है ओ । वह पराक्रमी है ।
यह सुन देवलोक में आनंद छा गया । सभी देवता कार्तिकेय के पास पहुँचे । इंद्र ने कार्तिकेय से कहा " कुमार , आप अत्यंत शूरवीर और तेजस्वी हैं । आप हमारे सेनापति बनें और असुरों का विनाश करें । " कुमार ने इंद्र की प्रार्थना स्वीकार कर ली । देवता बहुत प्रसन्न हुए । उन्होंने आक्रमण की खूब तैयारी की । एक दिन कुमार कार्तिकेय की देखरेख में देवताओं ने असुरों पर धावा बोल दिया । तारक भी सेना लेकर युद्धक्षेत्र में आ गया ।
वह छोटे बालक कार्तिकेय को सेनापति के रूप में देखकर हँसने लगा । बोला- " बालक ! लगता है तुम्हें अपने प्राणों से मोह नहीं है । जाओ , घर लौट जाओ । " कुमार बोला- " दैत्यराज , घमंड करना अच्छा नहीं होता । वीर की आयु नहीं , उसके काम देखे जाते हैं । मुझसे लड़ने के लिए तैयार हो जाओ । " सेनापति कार्तिकेय का इशारा पाते ही देवताओं की सेना असुरों पर टूट पड़ी ।
तारक ने कुमार पर मुदगर से वार किया । कुमार ने बीच में ही मुदगर को काट गिराया । अब तारक का क्रोध आसमान छूने लगा । वह गदा लेकर रथ से नीचे उतरा । उसने गदा का एक जोरदार प्रहार कुमार पर किया । कुमार ने गर्दन घुमाकर अपनी गदा उसके सिर पर दे मारी । कुमार एक ही प्रहार से तारक धराशायी हो गया । तारक के मरते ही दैत्य भाग खड़े हुए । यह देख , देवों ने कुमार को कंधों पर उठा लिया । चारों तरफ कुमार का ' जय - जयकार ' होने लगा ।