चूहा और दो सन्यासी की प्रेरणादायक कहानी

chooha aur sanyaasee kahaanee


एक चूहा और और कछुआ मित्रतापूर्वक रह रहे थे । चूहा कछुए का मित्र बनकर अपने आपको बहुत भाग्यशाली समझ रहा था । उसने अपने मित्र को एक बार एक कहानी सुनाई दूर एक नगर में सन्यासियों का मठ था । उन सन्यासियों का गुरु चूड़कार्ण था । चूड़ाकर्ण जब भी भोजन करता तो उसे से कुछ भोजन बच जाता । 

सन्यासी होने के कारण चूड़ाकर्ण उस भोजन को भगवान के समान समझता था । इसलिए उस भोजन को फेंकने की बजाय वह उसे थैले में डालकर एक खूटी पर टांग दिया करता था । जब मुझे ( चूहे को ) सन्यासी के उस स्थान का पता चला तो चूहे ने हर रोज वहां पर जाकर उस थैले में भोजन खाना आरंभ कर दिया । 

सन्यासी को भी पता चल गया कि मैं उस थैले में से हर रोज भोजन करता हूँ । उसने मुझे भगाने के लिए एक लाठी का प्रबंध किया । मैं समझ गया कि वह सन्यासी अब मेरे पीछे पड़ गया है , किन्तु तुम यह तो जानते ही हो हमलोगों की जीभ सबसे अधिक निर्लज्ज है । हम खाने के मामले में अपनी जान पर खेलते आये हैं । 

उन्हीं दिनों उस सन्यासी का एक मित्र उससे मिलने आया । उन दोनों ने रात को बड़े आनन्द से भोजन किया । जो भोजन बच गया उसे थैले में डालकर ऊपर लटका दिया । फिर दोनों मित्र उसी खूंटी के नीचे आराम से लेटकर बातें करते रहे । चूड़ाकर्ण जानता था कि आज उस थैले में बहुत ही स्वादिष्ट भोजन बचा हुआ पड़ा है ,

इसलिए वह बार - बार अपनी लाठी को धरती पर मार - मारकर मुझे डराने का प्रयास कर रहा था । जब वे दोनों बातें कर रहे थे तो चूड़ाकर्ण का इस प्रकार धरती पर बार - बार लाठी मारना उसके मित्र को बहुत बुरा लगा । उसने पूछा- ' अरे भाई , यह बाप क्या कर रहे हैं , आप बार बार धरती पर लाठी मारते चले जा रहे हो ? क्या आप मेरी बातों में रूचि नहीं ले रहे । 

यह तो मेरा अपमान है । ' ' नहीं मित्र , ऐसी बात नहीं । वास्तव में मैं आपकी हर बात बड़े ही ध्यान से सुन रहा हूँ । मगर इस थैले में जो भोजन रखा है उसे चूहों से बचाने के लिए मुझे यह सब करना पड़ रहा है । ' चूड़ाकर्ण ने दीवार पर टंगे हुए उस थैले की ओर इशारा करके अपने मित्र को जब सारी बात समझाई तो उसके मित्र आश्चर्य से चूड़ाकर्ण की ओर देखकर कहा- ' अरे भाई , यह चूहा मुझे कोई साधारण चूहा नहीं लगता है । आखिर इतनी ऊंची खूटी पर कोई चूहा कैसे चढ़ जाएगा ? इसके पीछे तो अवश्य ही कोई न कोई भेद होगा । 

सन्यासी ने अपने मित्र की ओर देखते हुए कहा कि मित्र संसार में ऐसी भी घटनाएं होती हैं , मगर मैं तो यह कहता हूँ कि इस चूहे में इतनी शक्ति होने का अवश्य कोई कारण है । अपने मित्र की बात सुनकर सन्यासी बड़ी गम्भीरता से उस पर विचार करने लगा । आखिर वह इस परिणाम पर पहुंचा कि इसका मूल कारण धन ही हो सकता है ।

इस संसार में धनवान मनुष्य सदा से ही बलवान रहता है । वे धन की प्रभुता का मूल है । राजाओं की प्रभुता का मूल कारण है तो धन ही है । धनहीन को कौन अपना राजा स्वीकार करता है । ' यह कहकर सन्यासी ने अपनी कुदाल उठाई और चूहे की  बिल को खोद डाला । बस , वहीं से उसे चूहे बिल के नीचे छिपा हुआ खजाना मिल गया । 

वह उस खजाने को पाकर बहुत खुश हो गया । वह धनवान बन गया और मैं अपना सब कुछ खोकर निर्धन बन गया । चूहे दिल बहुत उदास हो गया था । जीवन भर की कमाई पल भर में ही हाथों से निकल गई । चूहे का दिल बुरी तरह टूट गया था । तो उसकी यह हालत हो गई थी कि हर रोज उस थैले के पास जाता अवश्य किन्तु उसमे इतना भी शक्ति नहीं रह गई थी कि वह  छलांग लगाकर उसे थैले तक पहुंच सकता । वह शक्तिहीन हो गया था । 

एक दिन चूहे यह हालत देखकर उस सन्यासी ने अपने मित्र से कहा- देखा , इस चूहे का हाल । धन जाने से इसकी सारी शक्ति चली गई । हर प्राणी धन से ही बलवान होता है । कहा भी गया है कि जिसके पास धन है , वही गुणवान और पंडित कहलाता है । जिस प्राणी के पास धन न हो , जिसकी बुद्धि मंद हो , ऐसे लोगों द्वारा किया हुआ सब काम बेकार हो जाता है । 

जैसे कि गर्मी के दिनों में छोटी - छोटी नदियों का जल सूख जाता है । जिसके पास धन हो उसके हजारों मित्र अपने आप बन जाते हैं । उससे रिश्तेदारी गांठने के लिए राह चलते भी आ जाते हैं । धनवान के गुण गाने वाले सैकड़ों लोग होते हैं , जो उसकी बुराई को भी अच्छाई ही बताते हैं । ही सूना है जिस घर में बेटा न हो और जिसका कोई मित्र न हो , उस घर को सदा सूना ही माना जाता है । 

गरीब मनुष्य के लिए तो सारा संसार । मनुष्य की इंद्रियां तथा शरीर के अंग वही रहते हैं नाम वही रहता है । बुद्धि वही रहती हैं । उसकी वाणी भी वही रहती है । सब कुछ होने पर भी जब धन की गर्मी नहीं होती तो सब कुछ ही बदल जाता है । यह कितनी विचित्र बात है कि जिसके पास धन है , उसी के पास सब कुछ है । 

उन दोनों की बातों का मेरे मन पर बहुत प्रभाव पड़ा । मैं समझ गया था कि धन ही सबसे बड़ी शक्ति है । अब मेरा इस स्थान पर रहना उचित नहीं । अपने मन की बात किसी से कहना भी व्यर्थ था । क्योंकि बुद्धिमानी इसी में है कि अपने घर का नाश , मन का संताप , घर में होने वाला दुराचार , किसी के द्वारा ठगा जाना , किसी के द्वारा अपमानित होना , यह बातें किसी दूसरे को नहीं कहनी चाहिए । अपनी उम्र , अपने घर की कमजोरियां मंत्र , विद्या , मैथुन की बातें , दवाई , दान , तप , अपमान इन नौ बातों को सदा परदे में रखने से ही लाभ रहता है । 

क्योंकि ज्ञानियों का कहना है कि जिससे विद्याता रूठ गया हो । और जिसका परिश्रम और पुरुषार्थ भी काम न आता हो , ऐसे लोगों को केवल जंगलों में ही सुख मिल सकता है । स्वाभिमानी मनुष्य मर मिटता है , किन्तु किसी के सम्मुख ही नहीं बनता । ठीक उसी प्रकार जैसे बुझती हुई आग भी गर्म ही रहती है , ठंडी नहीं होती । 

भद्र पुरुष के लिए तो संसार में दो ही मार्ग रह जाते हैं , या तो फूलों के गुच्छे के समान वह मनुष्य के सिर पर रहता है और या फिर वन में ही खिलता है । अर्थात् बुद्धिजीवी या तो समाज में सबसे ऊंचा रहेगा या फिर सन्यासी बन जाएगा । मैंने सोचा कि भिक्षा मांगर जीवन व्यतीत करना या किसी की दया का पात्र बनना तो सबसे बुरी बात है , क्योंकि धनहीन हो जाने पर यदि प्राणी स्वयं को अग्नि के हवाले कर दे तो वह अच्छा है किन्तु गरीब न करके मांगना उचित नहीं । मनुष्य जब दरिद्र हो जाता है तो उसको शर्म आने लगती है । 

मनुष्य को जब शर्म का अहसास होने लगे तो उसका पुरुषार्थ भी नष्ट हो जाता है । जब मनुष्य में पुरुषार्थ नहीं रहता तो वह सब जगह अपमानित होने लगता हे । उसी अपमान के कारण उसके मन में घृणा उत्पन्न होने लगती है । घृणा से उसका शरीर अंदर ही अंदर जलने लगती है । यह जलन उसकी बुद्धि नष्ट कर देती है । 

जिस प्राणी की बुद्धि नष्ट हो जाए तो वह स्वयं ही नष्ट हो जाता है । मानव भले ही मौन रहे , किन्तु उसे झूठ नहीं बोलना चाहिए । मनुष्य भले ही अपने आपको नपुंसक कहलाना पसंद कर ले , मगर इसका पराई स्त्री के साथ भोग - विलास करना उचित नहीं है । मनुष्य मर भले ही जाए किन्तु उसे चुगलखोरों की बातों में नहीं आना चाहिए । भले ही इंसान को भिक्षा मांगकर जीना पड़े , पर उसे दूसरों की कमाई पर मौज नहीं मारनी चाहिए । 

अपनी गौशाला भले ही खाली रहे , किन्तु उसमें मरकने बैल का रखना किसी तरह से भी उचित नहीं । वेश्या स्त्री अच्छी परन्तु बहु व्याभिचारिणी अच्छी नहीं । नागरिक को भले ही बन में रहना पड़े मगर उसे बुद्धिहीन , मूर्ख राजा के राज्य में नहीं रहना चाहिए । मनुष्य भले ही मित्रहीन रहे , किन्तु उसकी अज्ञानी और दुर्जनों की संगत अच्छी नहीं । जिस तरह से सेवा मान को , खिली चंद्रिका अंधेरे को , बुढ़ापा सौन्दर्य को और विष्णु तथा शिव को हर लेती है 

सी प्रकार से याचकता मनुष्य के सैकड़ों गुणों को हर लेती है । इस सब चीजों को सोचकर मैं विचार करने लगा कि क्या मै दूसरों के टुकड़ों पर अपना जीवन व्यतीत करूं । यह तो बहुत बुरी बात होगी । इस जीवन से तो मौत अच्छी । क्योंकि बड़े लोगों ने कहा है थोड़ी शिक्षा से पंडताई , धन देकर किया गया संभोग , चाकरी या भिक्षा मांगकर भोजन करना , अच्छे पुरुषों के लिए यह तीन महान विडम्बनायें हैं । 

बहुत समय तक परदेस में रहने वाला , दूसरों के सहारे जीने वाला , दूसरों के घर पर सोने वाला मनुष्य यदि जीता है तो उसकी मृत्यु और जीवन में कोई अंतर नहीं होता । उसकी मृत्यु ही उसे गति देती है । यह सब कुछ सोचकर मैंने उस धन को दुबारा से पाने की चेष्टा नहीं की । क्योंकि लोभ में बुद्धि चंचल हो जाती है । लोभ के कारण ही मन में तृष्णा बढ़ जाती है । लोभी प्राणी लोक - परलोक दोनों में ही दुःखी रहते हैं । 

मैंने निश्चय कर लिया कि अब मैं यहां पर नहीं रहूंगा । बस , उसी समय मैं वहां से निकल पड़ा । अभी मैं चलने ही लगा था कि उस सन्यासी ने मुझे देख लिया । बस फिर क्या था , उसने मेरे सिर पर लाठी से वार कर दिया । उसकी यह कठोरता देखकर चूहा सोचने लगा कि अब मुझे एक पल के लिए भी यहां पर नहीं रहना चाहिए । न ही मुझे किसी को अपना दुःखड़ा सुनाना चाहिए । जो धन का लोभी होता है , जो असन्तोषी होता है , जिसका मन चंचल होता है , जिसकी इन्द्रियां अपने बस में नहीं होती , 

वैसे लोगों को मुसीबतें सदा घेर लेती है इसके विपरीत जिसका मन संतुष्ट रहता है , जो धन के लोभ में अंधा नहीं होता , उसके पास सब सम्पदाएं सदा विद्यमान रहती हैं । जिस प्रकार जूता पहने आदमी को मानो सारी पृथ्वी की चमड़े से ढकी लगती है । शांत चित्त और संतोषी प्राणियों को जो शांति मिलती । वह धन के लोभी प्राणियों को स्वप्न में नहीं मिल सकती । जिसने कभी किसी स्वामी की सेवा नहीं की , जिसने कभी वियोग का दुःख सहन नहीं किया , जिसने दीन वचन कभी मुख से नहीं कहे , वैसे पुरुष का ही जीवन धन्य होता है । किन्तु ऐसे भाग्यशाली प्राणी तो इस संसार में बहुत कम ही होते हैं । 

मैंने त्याग का मार्ग अपना लिया था , मैं जानता था कि यदि किसी पर मुसीबत आ ही जाए तो उसका विचारपूर्वक समाधान करना ही शोभा देता है । जो लोग बिना सोच - विचार के काम शुरू कर देते हैं , वे सदा ही धोखा खाते हैं । यह सब सोच - विचार कर मैं इस जंगल में आ गया , क्योंकि कहा भी गया है- अपने बन्धु - बाधंवों में धनहीन होकर जीवन व्यतीत करने की अपेक्षा भयंकर बाधा और जंगल में रहना औरपेड़ पर रहकर पके हुए फल खाकर पेट भरना अधिक है । और यह तो सौभाग्य है कि इस जंगल में ही मुझे लघुपतनक कौआ तुम मित्र के रूप में मिले । 

तुम्हारा आश्रय स्वर्ग के समान है । क्योंकि संसाररूपी विष वृक्ष के दो ही रसीले फल हैं । एक तो काव्यरूपी अमृत के रस का स्वाद और दूसरे सज्जनों का संग । तब कछुआ बोला कमाये धन का उचित स्थान पर त्याग कर देना ही उसकी रक्षा करना है । जैसे कि जब तक पानी बहता है , तब तक ही वह पीने योग्य रहता है । 

जब वह सागर में मिल जाता है तो उसे लोग नहीं पीते । जो लोग धन का समुचित उपयोग न करके उसे धरती के नीचे दबा देता है , तो समझ लो उसने स्वयं ही अपनी सुध खो दी । जो प्राणी अपने सुखों को त्यागकर धन जमा करता है । उसकी हालत तो उस गधे जैसी है जो दूसरों का बोझा ढोते - ढोते मर जाता कंजूस आदमी का धन उसके अपने उपयोग में आता ही नहीं । फिर सिकी को यह पता भी नहीं चल सकता कि उसके पास इतना धन था भी नहीं । किन्तु जब उसका धन नष्ट हो जाता है अथवा चुरा लिया जाता है 

वह फिर उसी के गम में रोगी हो जाता है । यह तो ठीक है कि संचय करना चाहिए किन्तु अधिक संचय वाले का हाल कभी अच्छा नहीं होता ।

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