बूढ़ा नौकर कैसे बुद्धि के बल से सपरिवार का चहेता बना | चतुर नौकर



पुराने समय की बात है संतोषगढ़ नामक राज्य था । उस राज्य के राजा का नाम नेकचन्द था । वह रोज अपने यहां बाजार लगवाता था । शाम को बाजार उठते समय वह जाकर दुकानदारों का सारा बचा हुआ सामान खरीद लेता । 

एक शाम राजा ने बाजार में एक बूढ़े आदमी को देखा । उन्होंने उससे पूछा- बूढ़े बाबा , यहां क्या बेचने आये हो और क्यों बैठे हो । तो बूढ़ा निराश होकर बोला- ' इसका मतलब यह कि आप मुझे नहीं खरीदेंगे । ' राजा बोला- हां , मैं भी तुम्हें नहीं खरीदूंगा , पर तुम चाहोगे तो मेरे यहां नौकरी कर सकते हो । 

बूढ़े ने राजा के पैर पकड़ लिए । राजा उसे अपने साथ महल में ले गया और अच्छा भोजन कराया । राजा ने उसकी वृद्धवस्था पर दयापूर्वक विचार करते हुए कहा ‘ अच्छा तुम नन्हें राजकुमार को बग्घी में बैठाकर टहलाया करो । उसकी देखभाल करना ही तुम्हार काम है । ' बूढ़े ने हांमी भर दी । राजकुमार मात्र दो - तीन वर्ष का था । रानी सुबह राजकुमार को खिलाने के लिए अच्छा - अच्छा भोजन भी बूढ़ कर देती थी । 

एक दिन बगीचे में बग्घी रोककर बग्धीवान पेड़ के पास सुस्ताने लगा । उधर , बूढ़ा फूलों की बगिया में नन्हें राजकुमार को नाश्ता करा रहा था । बग्घीवान की निगाह उधर गई तो देखता रहा । बूढ़ा राजकुमार को नाश्ता कराते समय स्वयं भी खाता था । बग्धीवान को बहुत बुरा लगा तो उसने लौटकर रानी को कहा । रानी ने सारी बात राजा को बताते हुए कहा- इस बूढ़े की बात ठीक नहीं है । यह तो राजकुमार को जूठा नाश्ता कराता है । बूढ़े को और कहा नौकरी से निकाल दो । 

राजा ने बूढ़े को दरबार में . बुलाया तुम राजकुमार का नाश्ता भी खा जाते हो । तुम राजकुमार जूठा नाश्ता कराते हो ? बूढ़ा गिड़गिड़ाकर बोला- हुजूर , इतना बढ़िया नाश्ता मैंने जीवन में कभी नहीं किया , इसलिए चखने का मन हो आता है पर राजकुमार को जूठा नाश्ता नहीं कराता हूँ । राजा को उस बूढ़े आदमी पर दया आ गई । 

उन्होंने अगले दिन से नन्हें राजकुमार के नाश्ते के साथ बूढ़े के लिए भी एक डिब्बे में नाश्ता रखवाने का हुक्म दे दिया । अब क्या था । बूढ़े के तो ठाठ हो गये । देशी घी का हलवा खाकर वह काफी मजबूत हो गया । एक दिन रसोइए को उस बूढ़े पर शक हो गया । उसने सोचा उस बूढ़े का पेट है या चौड़ । रोटियां सेंकते सेंकते वह परेशान हो जाता है पर बूढ़े का पेट ही नहीं भरता । 

एक दिन रसोइया चुपके से वहीं छिप गया । एक अन्य बावर्ची बूढ़े को खाना परोसा । दाल , भात , तरकारी , रायता , चटनी , अचार , रोटी । बूढ़ा खाने लगा । उस नौकर से कहा- जरा नमक तो देना । नौकर जब नमक लेने आया तो चारों रोटियाँ साफ । बूढ़े ने कहा- चार रोटियां देना । नौकरी जब रोटियां लेकर आया तो देखा चावल साफ । बूढ़े ने कहा- ' जरा चावल और ले आना । ' नौकर जब चावल लेकर आया तो देखा कि रोटियाँ भी साथ - साथ सूखी तरकारी भी खत्म । बूढ़े ने कहा- चार रोटियां और सूखी तरकारी ले आना । 

इस तरह बार - बार रसोईघर की ओर दौड़ते - दौड़ते उसे भोजन परोसते - परोसते नौकर परेशान हो गया । अंत में उसने लम्बी डकार ली और पानी मांगा । तभी रसोइया बाल्टी में पानी लेकर आया । बूढ़े ने पानी पिया और उठ खड़ा हुआ । वह उसके पीछे रखा हुआ थैला उठाकर चलने लगा , पर रसोइए ने उससे थैला छीन लिया । 

उसने कहा- बाबा लाओ हम देखें तुम्हारे थैले में क्या है ? बूढ़ा एकदम सकपका गया । झोले में पन्द्रह रोटियाँ , चावल और तरकारी थी । उसने बूढ़े को रंगे हाथों पकड़कर राजा के सामने पेश कर दिया । राजा ने नाराज होते हुए पूछा- ' क्यों बाबा तुमने खाना चुराया ? तभी बूढ़े बाबा ने गिड़गिड़ाकर बोला- ' हुजूर हमारी गलती माफ करें मै क्या बताऊं ? ' राजा ने हामी भर दी । बूढ़े ने कहा- हुजूर मैं यह खाना अपनी बुढ़िया के आसपास के अपाहिज गरीबों के लिए ले जाता हूँ । 

अगर नहीं जाता तो वे सब भूखे मर जाते । राजा को उस बूढ़े पर दया भी आ रही थी और गुस भी राजा ने कहा- अच्छा भाई तुम अपनी बुढ़िया को लेकर यहां रहना । अपाहिज लोगों के भोजन का इंतजाम मैं मंत्री से कहलवाकर कर दूंगा बूढ़ा खाने का थैला लेकर घर चला गया । 

अगले दिन वह बुढ़िया को लेकर राजमहल में आ गया । राजा ने उसके लिए राजमहल के पास ही एक कोठरी दे दी । बुढ़िया रसोईघर में रसोईए की मदद करने लगी । इस प्रकार वह चतुर बूढ़ा नौकर अपनी बुद्धि के बल से सपरिवार का चहेता बन गया । बुढ़िया और बुड्ढा दोनों आराम से रहने लगे । हम सबको भी सच्चाई और सूझ - बूझ से काम लेना चाहिए ।

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