दक्षिण के एक शहर में भगवान श्रीकृष्ण का एक मंदिर है । महन्त थे उस समय बाबा धरमदास जी । एक दिन एक अहीर का लड़का उनके पास आया और उनका चेला हो गया । वह माता - पिताहीन था । उसकी उम्र बारह साल की थी । वह अपने गांव में अपने काका के पास रहता था । मगर उस कौवे काका ने ऐसी कैं - कैं लगाई कि लड़के को भागना पड़ा ।
लेकिन यदि काका की कैं - कैं न होती तो न तो वह वहां से भागता और न विशाखापत्तनम के मंदिर का महंत ही बन सकता । शहर के समस्त रईस , समस्त अलंकार और समस्त भक्त नर - नारी उस मंदिर में आया करते थे और मूर्ति के साथ ही रात को भी प्रणाम करते थे ।
एक दिन आयी एकादशी । महन्तजी ने गरीबदास से कहा- आज दोपहर को यहां मत आना । मेरा व्रत है , इसलिए भोजन शाम को बनेगा । तुम आधा सेर आटा और बीस आलू लिये आओ । दोपहरी को स्नान करना और वन की कंडी बीनकर आग सुलगाना । पानी से उस जगह को पवित्र कर देना , समझे ? गरीबदास- ही हां । धरमदास जी- अपने अंगोछे पर आटा गूंथना , मैं तुमको एक लौकी का कमण्ड दूंगा , उससे पानी का काम करना । समझे ?
गरीबदास समझे । धरमदास- आध - आध पाव के चार टिक्कर बनाना । फिर आलू भूनना , आज नमक नहीं खाना चाहिए । इसलिए नमक नहीं खाऊंगा । समझे ? गरीब- समझे । तो अपने आलू भी अपने पास रखिए । समझे बाबा श्री धरमदास का तकिया में कलाम था चेला गरीबदास ने भी वही तकिया - कलाम स्वीकार कर लिया ।
इस हरकत पर बाबाजी नाराज नहीं हुए , किन्तु प्रमुदित हुए कि चेला ने एक बात तो सिखी । धरमदास- पागल है ! नमकहीन आलू और भी अच्छे लगते हैं सोंधापन मिलता है समझे ? गरीबदास- समझे । धरमदास- जब भोजन बन जाए तब अपने गले का हीरा उतारना । समझे ? गरीबदास- समझे । हीरा कैसी । समझे धरमदास- जिस दिन से तुझे चेला बनाया था
उस दिन तुम्हारे गले में एक शालिग्राम की मूर्ति , ताबीज बनाकर बांध दिया था, उसी को हीरा बोलते थे और ताबीज दिखाई नहीं दे रहा है वह कहां ? तेरा गला तो सूना है । समझे ? गरीबदास- समझे । उतारकर फेंक दिया । समझे ? धरमदास- बड़ा गधा है ? कहां फेंक दिया । समझे ? गरीबदास- छप्पर में खुसर दिया । समझे ? धरमदास पूरा का पूरा उल्लू मालूम पड़ते है । समझे ? अव उसे फेंक क्यों दिया ऐं समझे ? गरीबदास- गले में पत्थर बांधने से क्या फायदा ? समझे ? सोते वक्त कभी कभार उनके गले के नीचे आ जाया करता था तो पता चलता था की जान निकल गई बुझे ? मैं उसे नहीं पहनूंगा समझे ?
धरमदास- अरे राम - राम चेला है या छैला । समझे ? लेकर आ जा मेरे पास । समझे गरीबदास घबड़ा गया । कहीं वृद्ध साधु उसे एक पत्थर के लिए पिटने न लगे । यह सोचकर वह चटपट पानीज खोज लाया और गुरूजी को दे दिया । धरमदास- अच्छा देखा ! तुम अभी नादान हो । समझे ? इस कपड़े के भीतर शालिग्राम की मूर्ति है । समझे ? मूर्ति भीतर गुपाल जी रहते हैं । समझे ? गरीबदास- वही गुपालजी के जिन्होंने ' बिनदाबन ' में अवतार लिया था । समझे ? मेरी ही जाति के थे- अहीर थे । दिन भर गायें चराया करते थे और मुरली बजाया करते थे । समझे ? TO धरमदास- हां हां वही ! समझे ? जब भोजन बना लेना तब इस तबीज को गले से उतारकर आगे रख देना और कहना कि गोपालजी भोग लगाओ । समझे ? फिर तुम भोजन करना । समझे ? गरीबदास- समझे ।
धरमदास- अच्छा तो आ हीरा बांध दूं । समझे ? गरीबदास भई समझे ? धरमदास- किसी बात का कोई हरज भी नहीं है, समझे ? गरीबदास- उहूं | समझे ? धरमदास- हल नहीं करना चाहिए । समझे ? गरीबदास- गले में नहीं बाधूंगा । सोते समय कहीं गोपालजी ने मेरा गला टीप दिया तो ? चोर आदमी से दूर रहना चाहिए । समझे ? मेरी कमर में बांध दी जए समझे ? धरमदास- द्रुश ! कमर में नहीं , आओ बाजू में बांध दूं समझे ? हाथ जोड़कर आंखें बंद करके भोग लगाना । समझे ? गरीबदास ने अपना दाहिना हाथ आगे बढ़ा दिया ।
बाबाजी ने वह ताबीज बाजूबंद की तरह बांध दिया । इसके बाद आधा सेर आटा और बीस आलू दिए । आधा पाव गुड़ इसलिा दिया कि बाबाजी उसकी बातों पर खुश थे । इसके अलावा उसमें तकिया कलाम कण्ठ कर लिया था । फिर तूंबा देकर कहा- जाओ बच्चा हर एक एकादशी के दिन ऐसा ही करना होगा। समझे ? गायें लेकर गरीबदास ने नदी का रास्ता पकड़ा । जब दोपहरी हुई तब गुरूजी के बताये विधान के अनुसार गरीबदास ने चार टिक्कड़ बनाये । आलू भुनकर भुरता बनाया और चारों पर थोड़ा - थोड़ा रख दिया । ढाक के पत्तों से एक पत्तल भी बना ली थी । उसी पर चारों टिक्कर रख दिए और मूर्ति भी रख दी फिर कहा- गुपालजी ! भोग लगाओ ।
आंखें खोलकर गरीबदास ने देखा कि चारों रोटियां ज्यों - की - यों रखी है । एक भी कम नहीं हुई । यानि गोपालजी भोग नहीं लगाये वह सोच रहा था कि कम - से - कम एक रोटी तो गोपालजी खा ही लेंगे । उसने फिर नेत्र बंद किये । फिर वही प्रार्थना की । मगर टिक्करों में कमी न हुई गरीबदास ने प्रतिज्ञा की कि जब तक गुपालजी भोग न लगाएंगे , तब तक वह भोजन न करेगा । गुरूजी की आज्ञा भी ऐसी थी । ऐसा मुमकिन नहीं की भोग लग जाए और भोजन में कोई कमी न आये । , दोपहर के ग्यारह बजे से गरीबदास की यह हरकत शाम के चार बजे तक जारी रही ।
गुपालजी ने देखा कि गरीबदास बज्र मूर्ख है । गुपालजी प्रकट हो गए । वे या तो बज्र पंडित के सामने प्रकट होते हैं या मूर्ख के बीच । बीच वाले यों ही मुंह उठाये बैठे रहते हैं । अबकी बार गरीबदास ने जो नेत्र खोला तो देखता क्या है कि एक बारह साल का लड़का बैठा हुआ एक टिक्कर खा रहा है ।
गरीबदास- गुपालजी ! तुम बड़े सुधरे हो । जी चाहता है कि मैं चिपट के रह जाऊं । मगर , हो कठोर भी बहुत । समझे ? मार डाला मुझे भूख से , तब प्रकट हुए । समझे ? पहले ही बुलाने में आ जाते तो क्या जात घट जाती । समझे ? मुस्कुराकर गुपालजी ने कहा- अब पहले बुलावे में आ जाया करूंगा । चटपट एक टिक्कर खत्म करके गुपालजी खड़े हो गए और बोले- तुम भूखे तो नहीं रह जाओगे ? गरीबदास- नहीं ! एक टिककर ज्यादा था । समझे ? गुपालजी लेकिन अबकी बार मेरे साथ राधा जी भी आएंगी । तुम्हारे लिए दो ही टिक्कर बचेंगे । समझे ? गुपालजी अन्तर्ध्यान हो गए ।
गरीबदास ने भोजन किया और अपना काम करने लगा । उसकी खुराक आधी सेर की थी आज वह कुछ भूखा रहा था । फिर एकादशी आई । बाबाजी ने आटा दिया । तब गरीबदास ने कहा- पहली एकादशी में अकेले ठाकुरजी आये थे । अबकी बार ठकुरानी भी साथ आयेगी । पाव भर आटा और दीजिए । समझे ? बाबाजी ने सोचा कि भूखा रह गया होगा , इसलिए बकवास कर रहा है । बेपरवाही के साथ तीन पाव आटा तौलकर दे दिए । बाबाजी ने उसकी बात समझी नहीं सुनी नहीं । सुनी तो दिल्लगी मानी । दोपहर को फिर वही लीला हुई ।
छः टिक्कर थे सब घर नमकीन आलू का भूरता रखा हुआ था । ज्योंही ठाकुरजी को बुलाया गया त्योंही ठकुरानी सहित आ गये । दो टिक्कर भोग में ही चले गए । गुपालजी- भूखो तो नहीं रहोगे गरीबदास । गरीबदास- उस दिन तो तीन ही टिक्कर बचे थे और आज चार बचे हैं । भूखा नहीं रहूंगा समझे ?
तो गुपालजी- परन्तु अबकी एकादशी में सेर भर आटा लाना । नहीं भूखे रह जाओगे । समझे ? गुपालजी चले गए । गरीबदास भोजन करने लगा । उसने गुपालजी की बात याद नहीं रखी , क्योंकि वह इस बात को समझ नहीं सका था कि । दिल्लगी समझी थी । फिर एकादशी आई । गरीबदास ने तीन पाव आटा लिया था । इसलिए छः टिक्कर बने थे । भोग लगाया गया । ठाकुरजी और ठकुरानी के साथ में दो मूर्तियां और भी पधारी । सत्यभामा और रूक्मिणीजी सहित चारों ने चार टिक्कर उठा लिए । अपने लिए दो ही टिक्कर देख गरीबदास मसोस कर रह गया ।
उसने यह सोचा की ठाकुर जी और ठकुराइन का कभी अंत नहीं है क्या ? जब सब लोग खा - पी चुके तब हंसकर गुपालजी ने कहा- कहो गरीबदास मैंने कहा नहीं था कि आटा सेर भर लाना । समझे ? गरीबदास- सो क्यों , समझे ? गुपालजी- मेरे दो सखा भी आना चाहते हैं- मनसुखा और सुदामा । वे तो अभी आ रहे थे , कहते थे कि गरीबदास को देखेंगे कि कैसे भोग लगाता है समझे ? गरीबदास- उनको लाने की जरूरत नहीं । मैं ठाकुरजी को भोग लगाता हूँ या ठाकुरजी के खानदान भर की । समझे ?
गुपालजी- समझो चाहे न समझे ! अबकी बार आटा ज्यादा लाना । समझे ? इस लीला द्वारा भगवान महन्त धरमदास की आँख खोलना चाहते थे । इस मर्म को गरीबदास कैसे समझ सकता था । वह चुपचाप भोजन करने लगा । ठाकुरजी अपनी पार्टी के सहित गोलोक चले गए । धरमदास- बेटा गरीब ! आज फिर एकादशी है । समझे ?
गरीबदास- रोज - रोज एकादशी खड़ी रहती है । समझे ? धरमदास- तुम्हें क्या तकलीफ होती है । समझे ? गरीबदास- जिस पर बितता है वही जानता है । समझे ? धरमदास- क्या तुम भूखे रहते हो ? तीन पाव खा जाते हो ? यहां तो दोपहरी में आधा सेर ही खाते हो । वन में तीन पाव में भी भूखे रहते हो ! समझे ? क्या आटा बेचने लगे हो समझे ? तब जाकर गरीबदास बोले मैं ही सब कुछ खा जाया करता हूँ क्या ? ठाकुरजी के भोग में कुछ खर्च नहीं होता । समझे ? कभी दो जने आते हैं , कभी चार आ जाते हैं । अबकी बार छः प्राणी आयेंगे । डेढ़ सेर आटा दीजिए नहीं तो में गाय चराने नहीं जाऊंगा ।
आपकी चें - चें से तो कक्का की कैं - कें ही भली थी । समझे ? धरमदास ने डेढ़ सेर आटा दे दिया और मन में सोचे कि आज खुद दोपहरी में छिपकर देखेंगे कि वह आटे को फेंकता है या बेचता है , या क्या माजरा है ? भुनभुनाता हुआ गरीबदास जंगल की तरफ चला गया । दोपहरी हुई । महन्त धरमदास छिपकर वहां आ पहुंचे , जहां गरीबदास टिक्कर बना रहा था । एक झाड़ी में पीछे की तरफ बैठ गए ।
गरीबदास ने बारह टिक्कर बनाये थे । आटा बचाया नहीं था । सब रोटियों पर थोड़ा - थोड़ा आलू का भूरता रखा था । जरा - जरा सी मिठाई भी सबके साथ रख दी गई थी । दोनों हाथ जोड़कर ज्योंही गरीबदास ने भोग लगाया त्योंही यह क्या आठ धरमदास भी देखा कि सोलह हजार रानियां सहित , महारानियों सहित , तीन सखाओं सहित मुरलीधर प्रकट हुए । सामने सब रोटियां टुकड़े - टुकड़े कर खा डाली । उस दिन गरीबदास को कुछ भी न बचा । सोलह आना एकादशी को सामने देख वह बेचारा अकबका गया ।
धरमदास का शरीर पसीना - पसीना हो गया । भोग का सर्वस भोग लगाकर नटवर तो रासलीला करने लगे । सब लोग नाचने लगे और गाने लगे । गरीबदास ने कहा- मैंने पहले ही कहा था कि चोर आदमी से दूर ही रहना चाहिए । समझे ? थोड़ी देर बाद यह दृश्य गायब हो गया ।
कहीं कुछ नहीं मन मारे बैठे हुए गरीबदास के पैर पकड़कर धरमदास रोने लगे । यह नहीं आफत देख बेचारा गरीबदास और भी घबरा गया और उछलकर दूर जा खड़ा हुआ । धरमदास- धन्य हो महाराज ! जो तुमको साक्षात् दर्शन होते रहे और साक्षात भोग लगाता रहा ! हाय , मुझे तो जीवन भर पूजा करते हो गया । कभी सपने में भी अपने गोपालजी को नहीं देखा । आज से मैं चेला और आप गुरू । समझे ?
गरीबदास- आप कहते क्या हैं ? समझे ? आप तो कहते थे कि मैं आटे को बेचता हूँ । समझे ? धरमदास- समझे ? मैं पापी अभागा हूँ । मैं अपने प्रभु नाथ के द्वारा त्यागा जा चुका हूँ । समझे ? मुझसे कहीं ज्यादा पहुँच तुम्हारा है । जब मंदिर पर चलो । आज से तुम महन्त हुए और कल से मैं गायें चराया करूंगा । गरीबदास और गायों को साथ लेकर धरमदास जी के मंदिर पर गये ।
गरीबदास के बहुत रोकने पर भी उसे महन्ती दे दी गयी । दूसरे दिन से धरमदास जी गायें चराने लगे । शहर वालों को यह घटना मालूम हुई तो उनके हृदय में भगवान श्रीकृष्ण का विश्वास कहीं ज्यादा बढ़ गया । इस घटना पर पब्लिक ने कहा- ' गुरू गुड़ ही रहे , चेला चीनी हो गया ।