सम्राट का किस्सा-कहानी | महाकाल का चक्र



सम्राट विक्रमादित्य अन्य राजाओं की तरह विलासी नहीं थे । वे हर समय इसी चिन्ता में रहा करते थे कि प्रजा को किस - किस बात की तकलीफ है और वह किस प्रकार से दूर की जा सकती है । जिस शासक को प्रजा की चिन्ता नहीं अपनी ही चींता रहती है , वह प्रजा का रक्षक नहीं भक्षक होता है हम पहुंच एक दिन प्रातः चार बजे महाराज अपने महल से बाहर निकले । 

इस समय राजा किसान की वेशभूषा में थे । इसी वेश में .. किसी  तरह को चल दिए । चलते - चलते राजा विक्रमादित्य के पास गये । उन्होंने देखा कि एक तरफ से एक रीक्ष आया और उनके सामने वाली राह पर होकर आगे चलने लगा । उस रीछ ने महाराज को नहीं देखा था , परन्तु राजा ने देख लिया था । 

थोड़ी दूर चलकर वह रीछ जमीन पर लोटपोट हो गया और आला वाला सोलहा साल नवयुवती बनकर एक कुंए पर जा बैठी । सम्राट भी छिपकर यह निराला खेल देखने लगे । तब तक कुएं पर दो सिपाही आये । दोनों सगे भाई थे । छुट्टी लेकर घर जा रहे थे । उन्होंने मुस्कुराकर बड़े भाई से कहा- तुम्हारे पास कुछ खाने युवती को है ? बड़ा सिपाही बोला- जी नहीं । - युवती ने कटाक्ष मारकर कहा- मुझे भूख नहीं है । 

बड़ा सिपाही उस युवती पर मोहित हो गया था । वह बोला- यदि आपकी आज्ञा हो तो समीप के किसी गांव से ले आऊं । युवती- आपको तकलीफ होगी । बड़ा सिपाही- आपके लिए तकलीफ । आपके लिए तो जान तक दे सकता हूँ । युवती- क्यों ? बड़ी सुन्दरता के कारण । सुन्दरता भी ईश्वर में से आती है । सुन्दर चीज को देखने से मालूम होता है मानो ईश्वर का दर्शन हो रहा युवती- तो ले आओ । बड़ा भाई चला गांव । युवती ने छोटे भाई को कटाक्ष मारा और अपने पास बुलाया । वह आकर अदब से अलग बैठ गया । 

युवती- मैं तुम्हीं पर रीझ गई । छोटी- ऐसी बात मत कहिए । आपने बड़े भाई साहब पर कृपा कटाक्ष किया था । आप मेरी भाउज हैं । भाउज माता होती है । युवती- तुम बड़े मूर्ख मालूम पड़ते हो । छोटा- क्यों ? युवती- तुम्हारे बड़े भाई की क्या उम्र है ? छोटा- पचास साल । युवती- तुम्हारी उम्र क्या है ? छोटा- पैंतीस साल । युवती- और मेरी उम्र क्या है ? छोटा- आप ही जानें । युवती- अपनी बुद्धि से बताओ । छोटा- होगी पन्द्रह - सोलह की । युवती- अब तुम्हीं बाताओ कि एक पन्द्रह साल की लड़की पैंतीस साल के आदमी को पसन्द करेगी या पचास साल के बूढ़े को ? छोटा सिपाही कुछ भी जवाब न दे सका । 

युवती- जो मैं कहूं , वही करो । तुम मेरे साथ भाग चलो । छोटा- कदापि नहीं । आप मेरे बड़े भाई से सप्रेम बातीचत कर चुकी हैं । आप भाउज हैं और माता के समान हैं । युवती- अगर तुम मरी आज्ञा नहीं मानोगे तो मारे जाओगे । छोटा- चाहे कुछ भी हो इसकी परवाह नहीं । थोड़ी देर में बड़ा सिपाही ढाई सौ ग्राम पेड़ा लेकर आ गया । तब तक युवती ने अपनी साड़ी जहां - तहां से फाड़ डाली थी । उसी साड़ी से मुंह ढक्कर रोने लगी । बड़ा सिपाही- तुम रोती क्यों हो । यह लो पेड़ा खाओ । युवती- पेड़ा उधर डाल दो कुंए में और तुम भी उसी में पड़ो । बड़ा- क्यों ? यवती- तुम्हारा यह छोटा भाई बड़ा दुष्ट है । यदि तुम जल्दी न आ जाते तो इसने मेरा सतीत्व नष्ट कर दिया होता । 

यह देखो छीना - झपटी में मेरी रेशमी साड़ी तार - तार हो गई है । बड़ा- क्यों वे ? तूने ऐसी हरकत की ? छोटा- भाई साहब ! यह झूठ कहती है । बड़ा- क्यों वे ? वह झूठ कहती है और तू सच कहता है , जबकि प्रमाण सामने मौजूद है । छोटा- मैंने कुछ भी नहीं किया बड़े भाई साहब । बड़ा- अगर तूने कुछ भी नहीं किया तो क्या बिना कारण ही यह रोती है । 

अगर बिना कारण ही रोती है तो फिर साड़ी कैसे फटी । छोटा- मैं कुछ नहीं जानता भाई साहब । बड़ा- अबे साले ! तू तेज बनता है । तू पाजी है । छोटा- देखो गाली मत देना । गाली में विष बसता है । बड़ा- खबरदार ! चोरी और ऊपर से सीना जोरी । तू भाई नहीं है । दुश्मन इतना कहकर उसने अपने म्यान से तलवार को बाहर खींचा छोटा भाई सुशील था । 

परन्तु समयानुसार वह भी गर्मी में आ गया । खिर यह भी तो सिपाही ही था । छोटे के मन में एक ही बात खटक रही थी कि बेकसूर होने पर भी अनजान और बदचलन औरत के कहने पर अपने सगे भाई को धर्म - भ्रष्ट समझ रहा है । छोटे ने भी अपनी म्यान से तलवार को खींच लिया । 

दोनों ने अपने अपने पैंतरे बदले और तलवार युद्ध शुरू हो गया । एक तरफ तलवार की टक्कर आग उगल रही थी , तो दूसरी ओर सिपाहीयाना खून की गर्मी उबल रही थी । पांच मिनट में दोनों मर कर जमीन पर लेट गये । इस दृश्य को देखकर युवती हंसी । जमीन पर लेट गई और लोट - पोटकर काला सांप बन गई । अब वह सांप आगे को चल दी । 

सम्राट ने प्रण कर लिया कि इस विचित्र जीवन की पूरी कारगुजारी वे अवश्य देखेंगे । आगे चलकर एक नदी मिली । उसी नदी में एक बड़ी नाव आ रही थी । उसमें करीब तीन सौ आदमी बैठे थे । जब वह नाव बीच धारा में पहुंची , तभी काला सांप नदीं में कूद पड़ा और नाव की सीध में तैर चला । तैरते - तैरते सांप नाव के पास पहुंच गया और कूदकर नाव में जा गिरा । सारे लोग डर के मारे सांप की ओर से हटकर दूसरी ओर भागे । एक तरफ वजन के कारण नाव पलटी खा गई । सभी डूबकर मर गये । 

वह सांप पुनः किनारे लौट गया और लोट मारने लगा । सम्राट ने सोचा- अजब लीला है । लोट मारते - मारते अबकी बार वह एक वृद्ध ज्योतिष बन गया । सफेद दाढ़ी शोभा दे रही थी । हाथ में पंचांग | ललाट पर चंदन । सम्राट ने आगे दौड़कर उसके चरण पकड़ लिये । 

ज्योतिष- तुम कौन हो ? सम्राट- मैं एक राजा हूँ ? ज्योतिषी- तुम कौन हो , ये तुमने बता दिया परन्तु तुम चाहते क्या हो ? सम्राट- मैं सुबह से आपके पीछे लगा हूँ तब आप रीछ के रूप में थे । आपने युवती बनकर और सांप बनकर जो काम किये वह सब मैंने देखे हैं । यह आपका चौथा रूप है । ज्योतिषी- अच्छा , तो आप पूछना क्या चाहते हैं ? सम्राट- मैं केवल यह जानना चाहता हूँ कि आप कौन हो ? 

ज्योतिषी- राजन ! तुम इस झंझट में मत पड़ो । अपने रास्ते जाओ । सम्राट- नहीं स्वामी ! जब तक आपका परिचय प्राप्त न कर लूंगा तब तक आगे डेग न धरूंगा । ज्योतिषीं- तो सुनो राजन ! मेरा नाम है महाकाल । लोगों के विनाश के काम में लगा रहता हूँ । सम्राट- तो क्या आप जिसे चाहते हैं , उसे साफ कर डालते हैं ? 

महाकाल- नहीं राजन् ! इसके लिए मैं स्वतंत्र नहीं हूँ । परमात्मा का एक तुच्छ सेवक हूँ । परमात्मा की आज्ञा से मैं मारने योग्य व्यक्ति को पहचानता हूँ । सम्राट- अच्छा महाकाल जी । मेरी मौत कब आएगी ? महाकाल- यह बताने की सरकारी आज्ञा नहीं है । तुम अभी बहुतों दिनों तक जीवित रहोगे ! तुम्हारे द्वारा परम पिता परमेश्वर अनेकों परोपकार के काम करायेंगे । 

सम्राट- फिर भी इतना तो बतला ही दीजिए कि मेरी मौत कैसे होगी ? महाकाल- कोठे पर से गिरकर । सम्राट- अब आप किसकी घात में हैं ? महाकाल- ये तो तुम्हारे अधिकार से बाहर का प्रश्न है । सम्राट- आपने रीछ बनकर क्या किया था ?

महाकाल- एक आदमी एक पेड़ पर चढ़ा लकड़ी काट रहा था । उसको पेड़ से गिराने के लिए मैंने रीछ बन गया था और पेड़ पर चढ़ गया था , उसे गिराकर मारा था । सम्राट- आप विविध प्रकार से रूप क्यों बनाते हैं ? महाकाल- जिसकी मौत जिस रूप में लिखी होती है उसे मैं उसी बहाने से मारता हूँ । सम्राट- क्या कोई आपके काल चक्र से बचा भी है ? महाकाल कोई कोई जोगी बच गये , पारब्रह्म की ओट । चक्र चलती काल की पड़ी सर पर चोट । सम्राट- क्या करने से मौत नहीं आती ? 

महाकाल- परमात्मा की शरणगति से । परमात्मा अपने भक्त का  , काल अपने हाथ में ले लेते हैं । फिर उस पर मेरा कोई अधिकार नहीं रह जाता । सम्राट- आपका यह आज का किस्सा यदि किसी को सुनाऊं तो क्या वह सुनेगा ? - महाकाल- राजन , लोग प्रेम के किस्से लिखते - पढ़ते हैं । दिल बहलाव की कहानियां सुनते हैं । जिन कहानियों से दिमाग को मिलती है उन कहानियों को ये नहीं सुनते । खुराक सम्राट- सुनेंगे भी तो उसे गप्प मानेंगे ।

महाकाल- कहेंगे , ऐसा हो नहीं हो सकता । यह उनकी विचित्रता ही समझो । सम्राट- मैं आपको प्रणाम करता हूँ । आपके दर्शन से यह उपदेश मिला कि काल और ईश्वर को कभी नहीं भूलना चाहिए ।


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