| Siyar ki kahani in Hindi |
शिकारी ने फंदा लगाया और अचानक एक सियार उसमें फंस गया अब तो सियार बहुत घबड़ाया उठा और फंदे से छूटने के लिए उछल - कूद मचाने लगा, परन्तु उसकी उछल - कूद ने कुछ काम न दिया वह फंदे से न छूट सका । इतने में शिकारी आ पहुँचा और सियार को मारने के लिए तैयार हुआ । सियार ने रो - रोकर उससे प्रार्थना की । भला मेरे प्राण लेने से आपको क्या फायदा होगा ? कृपा कर मुझे छोड़ दीजिए । मैं जिन्दा रहूँगा तो आपका उपकार मानूँगा ।
सियार के रोने - गिड़गिड़ाने पर शिकारी को दया आ गई । उसने सियार को छोड़ तो दिया परन्तु उस सियार की पूंछ काट ली । सियार पूंछ खोकर वहां से भागा और दुःखी होकर मन में सोचने लगा । पूंछ कट जाने से मेरी सारी सुन्दरता नष्ट हो गई । अब मैं कैसे अपने जाति भाईयों के सामने जाऊंगा और कैसे उन्हें मैं अपना मुख दिखाऊंगा ।
जब वह मुझसे पूछेंगे कि अरे तेरी पूंछ कहां गई तो मैं उनको क्या उत्तर दूंगा । हाय हाय ! इससे तो यही अच्छा था कि शिकारी मुझे जान से मार डालता । आखिर सियार की समझ में एक आइडिया सूझी। यदि मेरे साथ जाति भाई अपनी - अपनी पूंछ कटवा लो तो कैसा रहेगा ? वाह , तब तो सबकी सुन्दरता नष्ट हो जायेगी और वे मेरे ही समान दीखने लगेंगे ।
फिर मुझे उनके बीच रहते शर्म कैसी । बस , पूंछ कटा सियार जंगल में घुसा और हुआं-हुआ की आवाजें लगाने लगा । उधर से दूसरे सियारों ने भी हुआ - हुआँ की आवाज लगाई और वे उसकी ओर दौड़ पड़े । जब सब सियार इकट्ठे हो गए तो पूंछ कटे सियार ने अकड़कर फटकारना शुरू किया । - भाईयो ! जरा मेरी पूंछ की ओर देखिये बताईये वह कहाँ गई वह मैंने कटवाकर ही फेंक दी । आप पूछेंगे क्यों ?
अच्छा सुनिये - बात यह है कि पूंछ एक बेकार बोझ के समान हमारे पीछे लटकी हुई है । फिर इससे हमारी सुन्दरता भी नष्ट होती है । आदमी को देखिये । आदमी कभी पूंछ नहीं रखता और सदा पूंछ की हंसी उड़ाता है । पूंछ न रखने से ही आदमी इतना सुन्दर दिखता है ।
इसलिए मैंने अपनी पूंछ कटवाकर फेंक दी है । अब मैं सुन्दर तो दिखता ही हूँ । बड़े आराम से भी रहता हूँ । बस , आप लोग भी अपनी अपनी पूंछ कटवाकर वह बेकार का बोझ शरीर से दूर कीजिए । मेरे समान सुन्दर बनिये और आराम से रहिये ।
पूंछ कटे सियार का वह व्याख्यान सुनते - सुनते एक बूढ़ा सियार जोर से हंसा और बोला - भाईयों ! यह पूंछ कटा बिल्कुल झूठा है , उसका व्याख्यान बिल्कुल झूठ है । - किसी तरह उसकी पूंछ कट गई है , और उसे शर्म मालूम होती है । इसलिए यह ये बातें बना रहा है और हमलोगों को बुद्धू बना रहा है । मेरा कहना मानो - उसकी बातों में आने की आवश्यकता नहीं है ।
भला काना कब चाहेगा कि किसी के दो आँखें हों । वह तो यही चाहेगा कि मेरी तरह सभी एक आँख वाले हों । यदि उसकी पूंछ फिर से निकल आए तो यह उस तरह की नसीहतें झूठ भूल जाये ।
उसके बाद बूढ़े सियार ने लाल - लाल आँखें दिखाते हुए पूंछ कटे सियार से कहा - अबे पूंछ कटे ! तू यहाँ से जायेगा भी या व्याख्यान ही फटकारता रहेगा ? चल हट , मुख काला कर ! यह सुनते ही पूंछ कटे सियार ने शर्म से सिर झुकाकर अपनी राह ली ।