जर्मन की सैनिक और खोया बेटा | lost son

  


दूसरा विश्व युद्ध हुआ । लोग संकट में पड़ गए । एक माँ - बाप ने अपने बच्चे को सुरक्षा की दृष्टि से दूर गाँव में रहने भेज दिया । वहाँ मार्ता नामक बुढ़िया उसका पालन - पोषण करने लगी । फिर एक दिन मार्ता की मृत्यु हो गई । बच्चा अकेला भटकने लगा । वह नहीं जानता था कि उसे कहाँ जाना है । उसके माता - पिता के बारे में भी कुछ पता नहीं था । वह  मार्ता की झोंपड़ी में रहता था । वह सोचता था कि मेरे माता - पिता मुझे किसी भी क्षण वापस लेने आ सकते हैं । 

मेरे रोने - चिल्लाने का उस बुढ़िया पर कुछ असर नहीं होता था । वह चाहती थी कि मैं घर के आँगन में खेलूँ और पालतू जानवरों से दोस्ती करूँ । झोंपड़ी में कभी - कभी एक गिलहरी घुस आती । आँगन में नाचती , पूँछ हिलाती , मुँह से आवाजें करती , चूजों और कबूतरों को डराती रहती । कभी - कभी शाम को मुझे अपने मात् - पिता की याद सताती । अपने खिलौने याद आते । 

माँ प्यानो बजाती नजर आती । उसके गाने की आवाज मुझे सुनाई देती । सोचता , शायद अब वे मुझे ढूँढ़ भी पायेंगे कि नहीं एक सुबह जब मैं उठा तब मार्ता संसार से जा चुकी थी । वह काफी बीमार जो रहने लगी थी । शाम को जब मैंने घर में लैम्प जलाने की कोशिश की , तो कुछ मिट्टी का तेल जमीन पर गिरा पड़ा । बड़ी मुश्किल से माचिस की एक तीली जलाई । उसका जलता हुआ एक टुकड़ा तेल पर गिरा , आग जल उठी । धीरे - धीरे आग झोंपड़ी में फैलने लगी । 

उठती लपटें देखकर गाँव वाले इस ओर भागने लगे । कुत्तों के भौंकने की आवाजें आने लगीं । मुझे डर था कि लोग मुझे देखते ही मार डालेंगे । मैं वहाँ से भागा । एक जंगल में छिप गया । प्रातः ठण्ड से ठिठुरता और घबराया हुआ मैं एक दूसरे गाँव में पहुँचा । वहाँ स्त्री - पुरुषों की भीड़ मेरे चारों ओर इकट्ठी हो गई । उनकी भाषा में मेरे लिए अनजान थी । उनकी संदेह भरी आँखों से मुझे डर लग रहा था । 

एक किसान मुझे बोरे में बंद कर , अपने कंधे पर उठाकर घर ले आया । वह मुझे खानाबदोश जिप्सी समझ रहा था । जिनके लिए वहाँ के लोगों में नफरत थी । उस व्यक्ति ने मुझे खाने को रोटियाँ दीं । घर की एक कोठरी में बंद कर दिया । उस गाँव की एक स्त्री ओल्गा ने मुझे उस व्यक्ति से खरीद लिया । वह गाँव के बीमार लोगों का इलाज करती थी । उसके साथ रहते हुए मुझे किसी का भय नहीं था । 

उन्हीं दिनों गाँव में प्लेग फैल गया । लोग डर गए । उन्होंने समझाया कि यह अभिशाप मेरे कारण है । उन्होंने मुझे गाँव के पास की नदी में हवा से भरे एक थैले के साथ फेंक दिया । मैं पानी में बहने लगा । बहाव कुछ कम हुआ , तो मैं धीरे - धीरे किनारे पहुँच गया । ऊँचे - ऊँचे सरकंडों से गुजरता मैं नदी से दूर जा निकला । तभी मुझे कुछ चरवाहों की अपनी ओर आने की आवाजें सुनाई दीं । मैं पेड़ों के पीछे छिप गया । कुछ दिन भटकने के बाद मैं एक गाँव में पहुँचा । वहाँ एक चक्की वाले ने मुझे अपने पास रख लिया । वह निर्दयी था । 

वह अपनी पत्नी को मारता - पीटता था । मौका पाकर एक दिन अँधेरे में मैं वहाँ से भाग निकला । अब मैं लेख नामक शिकारी के पास रहता था । मैं उसके लिए चिड़ियाँ पकड़ने के लिए जाल बिछाता था । वह आसमान के गाँवों में चिड़ियाँ बेचता था । उसका घर तरह - तरह की चिड़ियों से भरा रहता । लोग लेख को चिड़ियों के बदले खाने का सामान देते । 

एक दिन चिड़ियों की तलाश में न जाने वह कहाँ खो गया ? मैंने कई दिनों तक उसकी राह देखी । अंत में जब वह नहीं लौटा , तो मैंने वहाँ से जाने का फैसला कर लिया । इसी बीच एक बढ़ई ने मुझे काम पर रख लिया । दोनों पति - पत्नी सोचते कि मेरे सिर के काले बाल इस गाँव और खेतों में बिजली गिरा सकते हैं । गाँव में अक्सर तूफान आने और बिजली गिरने से आग लग जाती । रात में आकाश बादलों से घिर जाता । लोग भयभीत हो जाते थे । 

एक दिन घास की कोठरी में आग लग गई । आग घर के चारों ओर फैलने लगी । मैं वहाँ से भाग निकला । जंगल में रेल की पटरी थी जिस पर धीमी गति से चलने वाली रेलगाड़ी के आखिरी डिब्बे में मैं चढ़ गया । उस स्थान से काफी दूर निकल गया । अब मैं जिस गाँव में पहुँचा , वह रेलवे लाइन और नदी से दूर बसा था । मैंने गाँव के मुखिया के पास काम करना शुरू कर दिया । 

लोग सोचते- अगर जर्मन सैनिकों ने मुझे वहाँ रहते देख लिया , तो वे मेरे कारण पूरे गाँव को सजा दे सकते थे । मुझे पशुओं को खेतों में चराने के लिए ले जाना पड़ता था । गाँव में जर्मन सैनिकों के खिलाफ युद्ध कर रहे छापामार आते रहते । मुखिया जर्मन सैनिकों को रसद आदि देता था । एक दिन छापामारों ने मुखिया को भारी सजा दी । वह बुरी तरह जख्मी हो गया । गाँव के लोग मुझे पास की जर्मन चौकी पर छोड़ आए । 

वहाँ एक सैनिक को मुझे जंगल में लेजाकर गोली मारने का हुक्म दिया । जंगल के पास पहुँचकर उसने मुझे भागने के लिए कहा । मैं जैसे ही भागा , पीछे से गोली चलने की आवाज आई । पता नहीं उसके मन में क्या आया , उसने सीधा निशाना नहीं लगाया । मैं बच निकला । अब मैं जिस जगह रहता था , वहाँ जर्मन सैनिक छापामारों की तलाश में आते रहते थे । एक रात मेरे मालिक ने मुझे जगाकर भाग जाने को कहा । जर्मन सैनिक इस गाँव में धावा बोलने आ रहे थे । मैं झाड़ी में छिप गया । सैनिकों ने मुझे देख लिया । उन्हें शक था कि या तो मैं यहूदी हूँ या कोई जिप्सी । गाँव में ले जाकर उन्होंने मुझे एक कोठरी में बंद कर दिया । 

वहाँ एक और व्यक्ति भी था । उसके हाथ पीछे की ओर बंधे थे । चेहरे पर संगीन के घाव थे । मैं उसे देखकर डर गया । बाहर गाड़ियों के इंजन का शोर होने लगा । तभी कोठरी का दरवाजा खुला । उन्होंने जख्मी आदमी को बाहर घसीट लिया । वे हमें गाड़ी में बिठाकर पास वाले पुलिस स्टेशन ले जा रहे थे । रास्ते में एक पादरी ने हमें देख लिया । गाड़ी ने पुलिस की इमारत में प्रवेश किया । पादरी बाहर ही खड़ा हो गया । जर्मन अफसर ने मुझे देखा , तो मुझे छोड़ देने का हुक्म जारी कर दिया । 

एक सैनिक मुझे घसीटता हुआ दरवाजे के बाहर ले आया , जहाँ पादरी मेरी प्रतीक्षा में खड़ा था । पादरी मुझे एक फार्म पर ले गया । फार्म के मालिक को पादरी ने मुझे अपने पास रखने के लिए रहा । वह व्यक्ति मुझे देखकर परेशान हो गया । कारण मुझ जैसा जिप्सी लड़का उसके लिए मुसीबतें खड़ी कर सकता था । 

लेकिन अन्त में उसने मुझे अपने पास रख लिया । फार्म के मालिक गाबोंस को बात - बात पर गुस्सा आ जाता । छोटी - सी गलती हो जाने पर मेरी टांगों पर कोड़े बरसाने लगता । मेरे कान ऐंठता । मालिक का कुत्ता मुझे देखकर गुर्राता । तंग आकर मैंने वह जगह छोड़ दी ।

मैं दस वर्ष का हो चुका था । मेरी आवाज को न जाने क्या हो गया था ? अब मैं बोलने में असमर्थ था । जाड़ा शुरू होने पर बर्फ ने धरती को ढक लिया था । मैंने स्केट्स का एक जोड़ा अपने लिए तैयार किया और अपने बूटों से बाँध लिया । पाल की तरह एक कपड़े को अपने सिर के ऊपर फैला दिया । हवा मुझे अनजाने रास्तों पर ले जा रही थी । 

गाँव की एक स्त्री लवीना ने मेरी दयनीय दशा देखी । वह मुझे अपने घर ले आई । उसने बहुत कोशिश की कि मैं कुछ बोल सकूँ , परन्तु मैं बोलने में असमर्थ था । गाँव वालों की राय थी कि मुझे जर्मन सैनिकों को सौंप दिया जाए । परन्तु लवीना ने इसका विरोध किया । लवीना के पति की मृत्यु हो चुकी थी । वह घर में अकेली रहती थी । लोगों के घरों में काम करके गुजारा करती । 

गाँव के लोग अक्सर उस पर अपने पति को मार डालने का आरोप लगाते , जिसे सुनकर वह क्रोध से पागल हो उठती । लोगों से झगड़ती । एक झगड़े ने उसके प्राण ले लिये । मैं फिर अकेला हो गया था । मैंने इस गाँव से भी कहीं दूर निकल जाने में ही अपनी भलाई समझी । गर्मी खत्म होने को थी । गेहूँ के और फूलों का खेतों में चढेर लगा था । पास ही नदी के पुल की जर्मन सैनिक , दिन - रात चौकसी कर रहे थे । एक दिन घोड़ों पर सवार बहुत से लुटेरे गोलियाँ चलाते गाँव में घुस आए । लोग डर से अपने - अपने घरों में छिप गए । 

एक लुटेरे ने मुझे झाड़ियों में छिपते देख लिया । मैं वहाँ से भागने लगा । तभी उसने राइफल के कुंदे से मुझे जख्मी कर दिया । मैं बेहोश होकर जमीन पर गिर पड़ा । इसी बीच रूसी सैनिक गाँव में आ गए । उन्होंने सभी लुटेरों को पकड़ लिया और घायल गाँव वालों की मरहम - पट्टी की । यह 1944 का पतझड़ था । सेना के अस्पताल में इलाज के बाद मुझे जाने दिया गया । 

यहाँ से युद्ध भूमि व मोर्चाबंदी काफी दूर थी । मुझे सैनिकों के साथ ही ठहरने की इजाजत मिल गई । दो सैनिक गवरीला और मिल्का मेरी देखभाल करते । अब मैं ग्यारह वर्ष का हो चुका था । पुस्तकों में मेरी रुचि बढ़ गई थी । एक दिन गवरीला ने मुझे बताया कि युद्ध अब समाप्त हो चुका है । नियमों के अनुसार खोए हुए बच्चों को विशेष केन्द्रों में भेजा जाएगा । वहाँ से उनके माता - पिता की खोज - खबर ली जाएगी । उसने मुझसे वायदा किया कि अगर मेरे माता - पिता नहीं मिले , तो वह मुझे अपने पास रख लेगा । 

मुझे बहुत से उपहार देकर एक सैनिक के साथ शहर के अस्पताल में भेज दिया गया । गवरीला ने मेरे बारे में सभी जानकारी लिखकर साथ भेज दी । एक सुबह मुझे प्रिंसिपल के कमरे में बुलाया गया । उनके साथ एक व्यक्ति था । शायद वह मेरे माता - पिता को युद्ध से पहले जानता था । प्रिंसिपल ने मुझे बैठने के लिए कहा । तभी वह व्यक्ति उठकर साथ वाले कमरे में गया । 

वहाँ उसने किसी से बातचीत की । जब वह हमारे कमरे में लौटा , तो उसके साथ एक स्त्री और पुरुष था । वे मुझे कुछ पहचानने से लगे । मेरा दिल धड़कने लगा । मैंने उनकी तरफ गौर से देखा । वे मेरे निकट आ गए थे । स्त्री मेरे ऊपर झुकी । उसका चेहरा आँसुओं से भीगा था । व्यक्ति घबराया हुआ था । वह अपना चश्मा बार - बार ठीक कर रहा था । 

उसके चेहरे पर पीड़ा के भाव थे । मेरे कंधे पर बाईं तरफ जन्म से ही एक निशान था जो कमीज हटाने पर साफ दिखाई दे रहा था । निशान देखते ही वे दोनों सिसकियाँ भरने लगे । उन्होंने मुझे अपने गले से लगा लिया क्योंकि वर्षों बाद उनको अपना खोया बेटा मिल गया था ।




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