स्वर्णपुरी की रानी की कहानी | Diviya Mein Kaun

 

तोता मैना और रानी

एक राजमहल उदास था । स्वर्णपुरी की रानी रात - दिन आँसू बहाती थी । राजा भी बहुत दुखी थे । अभी तक रानी की गोद नहीं भरी थी । इसी तरह काफी समय बीत गया । रानी से कष्ट सहन न हुआ , दिन वह महल के जलाशय में डूबने चली गई । रानी ने पानी में डुबकी लगाई । तभी एक लता उसके हाथ से लिपट गई । फिर एक आवाज सुनाई दी - ' महल वापस चली जाओ ।


इस लता को पीसकर खा लेना । ठीक समय पर पुत्र होगा ।। भविष्यवाणी सुन , रानी प्रसन्न हो गई । जलाशय से निकली तो हाथ में लता थी । राजा को बताया । लता को पीसकर खा लिया । राजा ने अन्न - वस्त्र के भंडार खोल दिए । चारों ओर उत्सव का वातावरण छा गया । स्वर्णपुरी के दक्षिण में बरगद का विशाल वृक्ष था । 

वहाँ एक तांत्रिक ने धूनी रमा दी । उसकी उम्र कितनी थी , कोई नहीं जानता था । दिन में किसी ने उसे आँखें खोलते नहीं देखा था । लोग कहते थे , वह रात के अंधेरे में घूमता था । बच्चों को उठाकर जाने कहाँ ले जाता था । उसके डर से हर माँ अपने बच्चे को संभाल कर रखती थी । 

स्वर्णपुरी की रानी ने बेटे को जन्म दिया । उस समय भी रात थी । कक्ष में रानी की नींद आ गई । कुछ क्षणों के लिए ऐसा हुआ कि रानी के कोई न रहा । तांत्रिक तो इसी मौके की ताक में था । वह माया से महल में घुस आया । उसने राजकुमार को उठाया और लोप हो गया । कोई कुछ न जान सका । बरगद के नीचे जा पहुँचा । तांत्रिक ने पेड़ के कोटर से एक डिबिया निकाली । फिर हाथ हिलाया तो शिशु एक भौंरा बन गया । 

तांत्रिक ने भौंरा बने शिशु को डिबिया में बंद किया , फिर डिबिया कोटर में रख दी । इसी बरगद पर तोता - मैना रहते थे । दोनों जाग रहे थे । उन्होंने तांत्रिक की करतूत देख ली । उधर स्वर्णपुरी के महल में हाहाकार मच गया । पुत्र जन्म की खुश गहरे दुःख में बदल गई । कोई नहीं जान सका कि नन्हा राजकुमार कहाँ गायब हो गया । 

रानी तो दुःख से अचेत हो गई । राजा क्रोधित थे । उन्हें लगा यह एक षड्यंत्र है । इसमें रानी स्वयं भी शामिल है । राजा ने रानी को महल से निकाल दिया । बोला मेरे बेटे को न खोज  सकते हो तो कभी वापस मत आना  बेचारी रानी ! उसका कोई दोष नहीं किया । लेकिन राजा का आदेश है । वह रोती - बिलखती महल से निकल गई ।

रानी ने घने जंगल में आश्रय लिया । धरती का बिछौना और पत्तों की छत । अब कंद - मूल ही उसका भोजन था । पुत्र के वियोग में वह रोती रहती थी । अनेक वर्ष इसी तरह बीत गए । वन के दूसरी ओर था रूपनगर । वहाँ की रानी ने एक कन्या को जन्म दिया । वह अमावस्या की रात थी । रानी को नींद आ गई , तो वही तांत्रिक अदृश्य होकर उसके कक्ष में आ गया । उसने नवजात कन्या को उठाया और बाहर निकल गया । बाहर आकर देखा तो अपनी गलती पता चली । तांत्रिक को अपनी साधना के लिए लड़की नहीं , लड़का चाहिए था । 

उसने राजकन्या को एक वन में एक पेड़ के नीचे छोड़ दिया और आगे चला गया । उस दुष्ट को जरा भी पछतावा नहीं था कि उसने बिना बात क्या कर्म कर डाला था । संयोग से स्वर्णपुरी की रानी की कुटिया पास में थी । उसने नवजात बच्ची का रोना सुना , तो बाहर निकली । कन्या को उठाकर हृदय से लगा लिया । अपना दुःख कुछ कम हुआ । वह सोच रही थी ' कौन छोड़ गया इसे ?

स्वर्णपुरी की रानी की गोद में रूपनगर की राजकन्या का बचपन बीता । उसका नाम रानी ने रखा रूपमाला । राजकन्या रानी को माँ कहकर पुकारती और वन के हिरनों के साथ चौकड़ी भरती । रूपमाला को पल भर न देखती तो रानी व्याकुल हो उठती । रूपमाला को पाकर वह अपना दुःख कुछ भूल गई थी । पर कभी - कभी पुरानी बातें याद करके उसकी आँखें झर - झर आँसू बरसातीं । 

राजा ने उसकी बात का जरा भी विश्वास नहीं किया था । उसे महल से भिखारिन की तरह निकाल दिया । पर इसका रानी को इतना दुःख नहीं था । दुःख तो इस बात का कि ईश्वर ने यदि पुत्र दिया , तो उसे इस प्रकार छीन क्यों लिया ? एक रात रूपमाला रानी के पास लेटी थी । रोने की आवाज से उसकी नींद टूट गई । वह बोली- " माँ , तुम क्यों रो रही हो और फिर खुद भी रोने लगती है । 

पहले रानी ने बहुत टाल - मटोल किया, पर रूपमाला की जिद के आगे उसकी एक न चली । हारकर उसने अपनी आपबीती रूपमाला को कह सुनाई । कहते - कहते रानी की हिचकी बँध गई । सारी बातें सुन रूपमाला हैरान रह गई । फिर दृढ़ स्वर में बोली  मत्वा तुमने हमें इससे पहले बात की जानकारी क्यों नहीं बताईं हम आज ही राजकुमार को खोजने निकलती हूँ ।  रानी ने कितना मनाया पर रूपमाला अपनी बात पर अड़ी रही । 

एक दिन ऋषि कुमार का वेश बना , कमर में तलवार बाँध , निकल पड़ी राजकुमार को खोजने । रानी रोकती ही रह गई - कहीं पुत्र की तरह यह भी न खो जाए । रूपमाला चली नदी - नाले पारकर राजकुमार को खोजने । आखिर थककर उसी बरगद के नीचे बैठ गई । बैठी तो वहीं सो गई । अचानक पक्षियों के कलरव से उसकी नींद टूट गई । देखा , एक विशाल अजगर उस बरगद पर चढ़ रहा है । 

उसे चढ़ते देख , घोंसलों में बैठे बच्चे चीं - चीं कर चिल्ला रहे हैं । उसी क्षण रूपमाला का हाथ तलवार पर गया । तलवार के एक ही वार से उसने अजगर को समाप्त कर दिया । शाम को चुग्गा लेकर तोता - मैना घोंसले के करीब आए । मैना बोली- “ आज बच्चों का शोर नहीं सुनाई पड़ रहा है । " चिंतित हो , वे घोंसले के भीतर पहुँचे । बच्चे बोल पड़े की इस पेड़ के नीचे जो सुंदर राज कुमार शो रहा है उसने आज हमारे जाना बचाए है। तोता बोला- धन्य है इस राज कुमार । यदि मै इस कुमार के किसी काम आ सकूँ तो अपने को धन्य समझँगा । उस समय  रूपमाला गहरी नींद में थी । 

एकाएक लगा जैसे कोई पुकार रहा हो । आँखें खोलते ही देखा , तोता मैना का जोड़ा सामने है । तोता मनुष्य स्वर में बोला- “ तुमने आज अजगर को मारकर हम पक्षियों पर बहुत उपकार किया है । इसके बदले में हम भी कुछ करना चाहते हैं । " रूपमाला ने अपने इस तरह घूमने का कारण बताया । वह बोली- " मैंने प्रतिज्ञा की है । जैसे भी होगा , स्वर्णपुरी के राजकुमार को खोजकर अपने साथ ले जाऊँगी । 

तोता बोला- " यह एक तांत्रिक की करतूत हैं । वही चुरा लाया था कुमार को । आज रात वह पर्वत की गुफा में कुमार की बलि देगा । तुम को चाहो , तो हम तुम्हें वहाँ तक ले चलें इससे पहले वह राजकुमार में मनुष्य रूप लाएगा " तोता - मैना रूपमाला को पर्वत पर ले गए । रास्ते में उन्होंने तांत्रिक के बारे में उसे सब कुछ बता दिया । गुफा में तांत्रिक मौजूद था । 

वह सचमुच बलि की तैयारी कर रहा था । रूपमाला चट्टान के पीछे छिपकर देखती रही । उसका हाथ अपनी तलवार की मूठ पर ही था । देखते - देखते तांत्रिक ने डिबिया में कैद राजकुमार को मनुष्य रूप में बदल दिया । वह उसकी बलि देने की तैयारी में जुट गया । भौरे को मनुष्य बनते देख रूपमाला चकित रह गई । 

उसे तांत्रिक की शक्ति से कुछ डर भी लगा , पर फिर उसने अपने को संभाला । तांत्रिक आँखें बन्द कर मंत्र पढ़ रहा था । तभी रूपमाला ने तलवार चला दी । तांत्रिक वहीं ढेर हो गया । उसका कोई तंत्र - मंत्र काम न आया । तांत्रिक के मरते ही उसका जादू नष्ट हो गया । तोता - मैना सभी को जंगल का  रास्ता दिखाते हुए उस पर्वत किनारे पर पहुंच गए । रूपमाला ने स्वर्णपुरी के कुमार को पूछने लगे कि तांत्रिक ने क्या क्या कैसे किया था ! 

तभी तोते ने रूपमाला को उसके अपने जीवन की घटना भी बता दी । दुष्ट तांत्रिक के कारण राजकुमार को ही नहीं , उसे स्वयं भी अपने परिवार से बिछुड़ना पड़ा था , यह जानकर रूपमाली फूट - फूटकर रो पंड़ी । स्वर्णपुरी के राजकुमार ने उसे दिलासा दी । कहा- ' - " तुम्हारे कारण ही तांत्रिक का नाश हुआ है । अब कैसा भय सब लोग मिल जुल कर स्वर्णपुरी की रानी के पास पहुँच गए। 

वे सभी रूपमाला के साथ एक नए युवक को देखकर हैरान रह गए । रूपमाला ने राजकुमार को संकेत किया । वह माँ - माँ कहता हुआ रानी से लिपट गया । फिर तोते ने पूरी घटना रानी को कह सुनाई । राजकुमार रूपमाला को उसके नगर में छोड़ने गया । फिर अपनी माँ को लेकर स्वर्णपुरी पहुँचा । सारी घटना जानकर स्वर्णपुरी के राजा गहरे अचरज से बेटे को देखते रह गए । उन्होंने रानी से क्षमा माँगी । 

फिर बताने लगे राजकुमार पर रूपमाला का ही अधिक अधिकार बनता है । इन दोनों का शादी तत्त्काल हो जाना  चाहिए । यह सब  सुनकर रानी ने बताया- अगर रूपमाला न होती  तो हमारे जीवन में सुख के दिन कभी न आते । एक दिन शुभ मुहूर्त में स्वर्णपुरी के राजकुमार और रूपमाला का शादी  सम्पन्न हुआ उस सभी मेहमानों के बीच तोता और  मैना भी महजूद रहे थे । वही दोनों ने ही तो रूपमाला को तांत्रिक के विनाश का तजुर्बा बताया था ।








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